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Chandigarh: बचपन में माता-पिता खोए, मिला सीसीपीसीआर का सहारा...अब कोई शेफ तो कोई पहुंचा फीफा
Mon, 09 Jan 2023 04:31 PM IST
निवेदिता वर्मा
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Mon, 09 Jan 2023 04:31 PM IST
सार
22 साल के शिवा महज सात वर्ष के थे, जब उनकी माता गुजर गईं। वो अपने पिता के साथ डड्डूमाजरा में किराए के एक मकान में रहते थे। पिता को शराब पीने की लत थी, जो धीरे-धीरे बढ़ती गई। 12 साल के हुए तो पिता ने उन्हें छोड़ दिया और वह मलोया स्थित स्नेहालय में रहने लगे।
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चिराग और शिवा।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
चंडीगढ़ के 22 वर्षीय शिवा और 20 साल के चिराग ने जीवन की तमाम विपरीत परिस्थितियों को मात देकर सफलता की इबारत लिखी। शिवा ने 12 साल की उम्र में मां और फिर पिता को खो दिया, तो चिराग ने कभी माता-पिता को देखा ही नहीं। दोनों छह साल स्नेहालय के हॉस्टल में रहे लेकिन हार नहीं मानी। शिवा आज एक यूरोपियन प्रोफेशनल पर्सनल ट्रेनर हैं। हाल में फीफा के लिए भी उनका चयन हुआ और चिराग शेफ हैं। उन्होंने कहा कि सफलता के लिए सिर्फ कल्पना ही नहीं, सार्थक कर्म भी जरूरी है। सीढ़ियों को देखते रहना पर्याप्त नहीं, सीढ़ियों पर चढ़ना भी जरूरी है। जुनून की ये दो कहानियां प्रेरणा दे रही हैं।
स्नेहालय से फीफा तक का सफर
22 साल के शिवा महज सात वर्ष के थे, जब उनकी माता गुजर गईं। वो अपने पिता के साथ डड्डूमाजरा में किराए के एक मकान में रहते थे। पिता को शराब पीने की लत थी, जो धीरे-धीरे बढ़ती गई। 12 साल के हुए तो पिता ने उन्हें छोड़ दिया और वह मलोया स्थित स्नेहालय में रहने लगे। उन्होंने बताया कि शुरू से ही उनके मन में था कि फौजी बनना है और सेना में जाना है। इसलिए स्नेहालय में होने वाली कबड्डी समेत अन्य कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगे। स्नेहालय में रहते हुए 2018 तक सेना की तैयारी की। कोशिश की भी लेकिन सफल नहीं हुए। हार नहीं मानी और ठान लिया कि फिटनेस की फील्ड में ही कुछ करना है। 18 वर्ष की उम्र के बाद स्नेहालय से जाना पड़ा और आफ्टर केयर होम में रहने लगे, लेकिन जुनून कम नहीं हुआ।
शिवा ने बताया कि वह एक नौकरी करने लगे, ताकि सर्टिफाइड पर्सनल ट्रेनर का कोर्स करने के लिए कुछ पैसे जुटा सकें। इस बात की जानकारी सीसीपीसीआर की चेयरपर्सन हरजिंदर कौर को लगी। उन्होंने फीस देने में मदद की। जिसके बाद मोहाली स्थित एक संस्थान से यूरोपियन प्रोफेशनल पर्सनल ट्रेनर का कोर्स पूरा किया। इसी दौरान यूट्यूब से फीफा और चंडीगढ़ में होने वाले इंटरव्यू की जानकारी मिली। कई राउंड के इंटरव्यू दिए और तीन महीने कतर में रहने और काम के लिए चयन हो गया। कुछ दिनों बाद फ्लाइट की टिकट आ गई। कहा कि 29 सितंबर को जब पहली बार फ्लाइट पर चढ़े तो उन्हें यकीन नहीं हो रहा था। बताया कि वहां पर उन्हें कोच के आई कार्ड देखने की जिम्मेदारी मिली थी, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। जिसके बाद उन्हें इंसेंटिव मिला और वहां काम करने का भी ऑफर मिला, लेकिन उन्होंने चंडीगढ़ वापस आकर पर्सनल ट्रेनर की फील्ड में ही आगे बढ़ने का फैसला किया।
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माता-पिता को देखा तक नहीं, आज शेफ
चिराग ने कभी अपने माता-पिता को नहीं देखा। वह शुरू से ही अपने चाचा के साथ कुरुक्षेत्र में रहते थे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। वर्ष 2014 में जब चिराग महज 12 वर्ष के थे, तो उनके चाचा की जीएमसीएच-32 में एक बीमारी की वजह से मृत्यु हो गई। चिराग के पास अब कोई छत नहीं थी। वह अस्पताल में अकेले थे, तो डॉक्टर ने पुलिस को जानकारी दी और उन्हें स्नेहालय लाया गया। यहां सेक्टर-40 के स्कूल में दाखिला दिलाया गया। चिराग ने बताया कि सीसीपीसीआर में हमेशा कई कार्यक्रमों का आयोजन होता था, तो एक दिन फूड वर्कशॉप लगी। उस दिन उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें खाना बनाना अच्छा लगता है।
इसके बाद हॉस्टल के किचन में भी मदद करने के लिए वह अपनी इच्छा से पहुंच जाते थे। उनकी रुचि को देखते हुए सीसीपीसीआर ने उनका दाखिला सेक्टर-42 के होटल मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में कराया। डिप्लोमा पूरा किया। कई जगह से नौकरी के ऑफर भी मिलने लगे लेकिन डिग्री करने का फैसला लिया। इस बीच 2020 में उन्होंने 18 वर्ष की उम्र पूरी कर ली, जिसके बाद उन्हें स्नेहालय छोड़ आफ्टर केयर होम में रहने जाना पड़ा। चिराग ने बताया कि भले उन्होंने स्नेहालय छोड़ दिया लेकिन सीसीपीसीआर की चेयरपर्सन हरजिंदर कौर उनका हालचाल जानने के लिए फोन करती रहीं। इसी दौरान उन्होंने डिग्री करने की इच्छा जताई और पैसे नहीं होने की भी बात कही। हरजिंदर कौर ने चिराग की फीस देने में मदद की और दाखिला भी कराया। अब चिराग पढ़ाई भी कर रहे हैं और खाना बनाने के अपने पैशन को भी पूरा कर रहे हैं। बताया कि उन्होंने कभी परिवार नहीं देखा, लेकिन स्नेहालय में रहते हुए जो प्यार मिला, उससे ये पता चलता है कि अगर वह परिवार के साथ रहते तो ऐसा ही महसूस होता। चिराग ने कहा कि आज वह जो भी हैं, स्नेहालय की वजह से ही हैं।
मदद करने वालों की कमी नहीं : हरजिंदर कौर
सीसीपीसीआर की चेयरपर्सन हरजिंदर कौर ने कहा कि शिवा और चिराग दूसरों के लिए प्रेरणा हैं। उन्होंने साबित किया है कि परिस्थितियां विपरीत हों, तब भी इच्छाशक्ति से मंजिल को पाया जा सकता है। कतर से लौटने के बाद शिवा और चिराग बीते दिनों हरजिंदर कौर से मिलने आए। इस दौरान शिवा की उपलब्धि पर हरजिंदर कौर की आंखें भर आईं। उन्होंने गले लगाया और कहा कि वह दोनों बच्चों के लिए जो बन सकेगा, करेंगी। उन्होंने कहा कि ऐसे कई बच्चे हैं, जिनकी मदद की जा रही है। मदद करने वाले लोगों की कमी नहीं है। बस जरूरत है कि उन लोगों को चैनलाइज करने की। देश-विदेश में कई दोस्त हैं, जो हर समय मदद के लिए तैयार रहते हैं।
शिवा और चिराग के सुझाव
- अपना लक्ष्य तय करें और उस पर अडिग रहें।
- जिस काम में मन लगे, उसी में करियर बनाएं तो काम बोझिल नहीं लगेगा।
- अपने से बड़ों का सम्मान करो और उनकी बातों को सुनो।
- कोई भी काम करो। उसमें पूरी ईमानदारी रखो।
- शिक्षा पूरी करो।
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स्नेहालय से फीफा तक का सफर
22 साल के शिवा महज सात वर्ष के थे, जब उनकी माता गुजर गईं। वो अपने पिता के साथ डड्डूमाजरा में किराए के एक मकान में रहते थे। पिता को शराब पीने की लत थी, जो धीरे-धीरे बढ़ती गई। 12 साल के हुए तो पिता ने उन्हें छोड़ दिया और वह मलोया स्थित स्नेहालय में रहने लगे। उन्होंने बताया कि शुरू से ही उनके मन में था कि फौजी बनना है और सेना में जाना है। इसलिए स्नेहालय में होने वाली कबड्डी समेत अन्य कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगे। स्नेहालय में रहते हुए 2018 तक सेना की तैयारी की। कोशिश की भी लेकिन सफल नहीं हुए। हार नहीं मानी और ठान लिया कि फिटनेस की फील्ड में ही कुछ करना है। 18 वर्ष की उम्र के बाद स्नेहालय से जाना पड़ा और आफ्टर केयर होम में रहने लगे, लेकिन जुनून कम नहीं हुआ।
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शिवा ने बताया कि वह एक नौकरी करने लगे, ताकि सर्टिफाइड पर्सनल ट्रेनर का कोर्स करने के लिए कुछ पैसे जुटा सकें। इस बात की जानकारी सीसीपीसीआर की चेयरपर्सन हरजिंदर कौर को लगी। उन्होंने फीस देने में मदद की। जिसके बाद मोहाली स्थित एक संस्थान से यूरोपियन प्रोफेशनल पर्सनल ट्रेनर का कोर्स पूरा किया। इसी दौरान यूट्यूब से फीफा और चंडीगढ़ में होने वाले इंटरव्यू की जानकारी मिली। कई राउंड के इंटरव्यू दिए और तीन महीने कतर में रहने और काम के लिए चयन हो गया। कुछ दिनों बाद फ्लाइट की टिकट आ गई। कहा कि 29 सितंबर को जब पहली बार फ्लाइट पर चढ़े तो उन्हें यकीन नहीं हो रहा था। बताया कि वहां पर उन्हें कोच के आई कार्ड देखने की जिम्मेदारी मिली थी, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। जिसके बाद उन्हें इंसेंटिव मिला और वहां काम करने का भी ऑफर मिला, लेकिन उन्होंने चंडीगढ़ वापस आकर पर्सनल ट्रेनर की फील्ड में ही आगे बढ़ने का फैसला किया।
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माता-पिता को देखा तक नहीं, आज शेफ
चिराग ने कभी अपने माता-पिता को नहीं देखा। वह शुरू से ही अपने चाचा के साथ कुरुक्षेत्र में रहते थे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। वर्ष 2014 में जब चिराग महज 12 वर्ष के थे, तो उनके चाचा की जीएमसीएच-32 में एक बीमारी की वजह से मृत्यु हो गई। चिराग के पास अब कोई छत नहीं थी। वह अस्पताल में अकेले थे, तो डॉक्टर ने पुलिस को जानकारी दी और उन्हें स्नेहालय लाया गया। यहां सेक्टर-40 के स्कूल में दाखिला दिलाया गया। चिराग ने बताया कि सीसीपीसीआर में हमेशा कई कार्यक्रमों का आयोजन होता था, तो एक दिन फूड वर्कशॉप लगी। उस दिन उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें खाना बनाना अच्छा लगता है।
इसके बाद हॉस्टल के किचन में भी मदद करने के लिए वह अपनी इच्छा से पहुंच जाते थे। उनकी रुचि को देखते हुए सीसीपीसीआर ने उनका दाखिला सेक्टर-42 के होटल मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में कराया। डिप्लोमा पूरा किया। कई जगह से नौकरी के ऑफर भी मिलने लगे लेकिन डिग्री करने का फैसला लिया। इस बीच 2020 में उन्होंने 18 वर्ष की उम्र पूरी कर ली, जिसके बाद उन्हें स्नेहालय छोड़ आफ्टर केयर होम में रहने जाना पड़ा। चिराग ने बताया कि भले उन्होंने स्नेहालय छोड़ दिया लेकिन सीसीपीसीआर की चेयरपर्सन हरजिंदर कौर उनका हालचाल जानने के लिए फोन करती रहीं। इसी दौरान उन्होंने डिग्री करने की इच्छा जताई और पैसे नहीं होने की भी बात कही। हरजिंदर कौर ने चिराग की फीस देने में मदद की और दाखिला भी कराया। अब चिराग पढ़ाई भी कर रहे हैं और खाना बनाने के अपने पैशन को भी पूरा कर रहे हैं। बताया कि उन्होंने कभी परिवार नहीं देखा, लेकिन स्नेहालय में रहते हुए जो प्यार मिला, उससे ये पता चलता है कि अगर वह परिवार के साथ रहते तो ऐसा ही महसूस होता। चिराग ने कहा कि आज वह जो भी हैं, स्नेहालय की वजह से ही हैं।
मदद करने वालों की कमी नहीं : हरजिंदर कौर
सीसीपीसीआर की चेयरपर्सन हरजिंदर कौर ने कहा कि शिवा और चिराग दूसरों के लिए प्रेरणा हैं। उन्होंने साबित किया है कि परिस्थितियां विपरीत हों, तब भी इच्छाशक्ति से मंजिल को पाया जा सकता है। कतर से लौटने के बाद शिवा और चिराग बीते दिनों हरजिंदर कौर से मिलने आए। इस दौरान शिवा की उपलब्धि पर हरजिंदर कौर की आंखें भर आईं। उन्होंने गले लगाया और कहा कि वह दोनों बच्चों के लिए जो बन सकेगा, करेंगी। उन्होंने कहा कि ऐसे कई बच्चे हैं, जिनकी मदद की जा रही है। मदद करने वाले लोगों की कमी नहीं है। बस जरूरत है कि उन लोगों को चैनलाइज करने की। देश-विदेश में कई दोस्त हैं, जो हर समय मदद के लिए तैयार रहते हैं।
शिवा और चिराग के सुझाव
- अपना लक्ष्य तय करें और उस पर अडिग रहें।
- जिस काम में मन लगे, उसी में करियर बनाएं तो काम बोझिल नहीं लगेगा।
- अपने से बड़ों का सम्मान करो और उनकी बातों को सुनो।
- कोई भी काम करो। उसमें पूरी ईमानदारी रखो।
- शिक्षा पूरी करो।