World Cycle Day: कम उम्र में साइक्लिंग के दीवाने बन रहे बच्चे, किसी ने ट्रेन को दी चुनौती तो कोई बना सबसे युवा साइक्लिस्ट
12 साल के तन्मय रावत आठवीं में पढ़ते हैं और सेक्टर-47 में रहते हैं। 26 जनवरी को उन्होंने शिमला तक जाने वाली ब्रिटिश काल की ट्रेन को चुनौती दे दी थी, हालांकि वे जीत नहीं पाए थे लेकिन उन्होंने एक दिन इस चैलेंज को जीतने का खुद से वादा किया है।
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कई बार लोग बच्चों को बड़ी प्रतियोगिता में शामिल होने से इसलिए रोक देते हैं कि कहीं उन्हें चोट न लग जाए, लेकिन जब बच्चे कम उम्र में ही उन्हें चुनौती देने को तैयार हों तो फिर मुकाबला टक्कर का हो जाता है। चंडीगढ़ में स्कूल के छात्रों का भी कुछ ऐसा ही जज्बा है। कम उम्र में पहाड़ों की चोटियों को नापने वाले बच्चे साइक्लिंग को सिर्फ सेहत के लिए ही नहीं बल्कि अपने कॅरिअर के लिए भी बेहतर विकल्प मानते हैं। यही कारण है उनकी हर सफलता और जीत का जश्न एक साइकिल यात्रा होती है।
जज्बा ऐसा कि ब्रिटिश काल की ट्रेन को भी दे दी चुनौती
सेक्टर-47 निवासी तन्मय रावत की उम्र मात्र 12 साल है। आठवीं में पढ़ते हैं, लेकिन उनके हौसले उम्र से काफी बड़े हैं। अंग्रेजों के शासनकाल के बारे में उन्होंने अपने पिता से काफी कुछ सुना था। यही कारण था कि बीते 26 जनवरी को साइक्लिंग के शौकीन तन्मय ने बीट द ट्रेन चैलेंज के तहत शिमला तक जाने वाली ब्रिटिश काल की ट्रेन को चुनौती दे दी। इस चैलेंज में बेशक तन्मय को सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने वादा किया कि एक दिन इसे हराऊंगा जरूर। तन्मय ने बताया कि कोरोना काल में उनके पिता साइक्लिंग करने दूर दूर तक जाते थे। उन्हें घर में बंद रहना अच्छा नहीं लगता था तो साइक्लिंग शुरू की। इसके बाद इसका ऐसा चस्का लगा कि अब हर प्रतियोगिता में हिस्सा लेने लगे हैं। इतनी कम उम्र में तन्मय ने दो बार नशे के खिलाफ रैली में भाग लेकर साइकिल से शिमला तक का सफर तय किया है। इसके अलावा 15 अगस्त 2021 को जश्न ए आजादी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए उन्होंने लगभग 250 किमी दूरी तय कर हुसैनी बॉर्डर तक का सफर तय किया था।
खाने के शौकीन नैतिक आज साइक्लिंग के दीवाने
मोहाली के फेज-7 निवासी नैतिक गोयल की उम्र मात्र 13 साल है। 9वीं के छात्र तन्मय ने बताया कि खाने पीने के शौक के साथ काम करने से भी बचता था। आलसी होने के कारण लगातार वजन बढ़ रहा था। इससे लंबाई पर भी फर्क पड़ रहा था। वह कभी भी ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता था जिसमें शारीरिक गतिविधि और मेहनत हो। कोरोना काल में उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया। उनके पिता ने अपने लिए एक साइकिल खरीदी और अपने दोस्तों के साथ साइक्लिंग के लिए जाने लगे। उनके फोटो देखकर नैतिक का भी बाहर घूमने का मन हुआ। उन्होने भी शौक के लिए साइकिल मंगवा ली। थोड़ी थोड़ी दूरी तक साइकिल चलाने के बाद पूरे दिन तरोताजा महसूस होने लगा। उन्होंने बताया कि 6 किमी से यह सफर 60 किमी तक पहुंच गया। इससे उनकी लंबाई भी बढ़ने लगी और वजन भी काफी कम हुआ। उन्होंने कहा कि अब कोई सपने में भी साइकिल के लिए कह दे तो तैयार रहता हूं। शहर के समूह साइकिलगिरी के वे सबसे युवा साइक्लिस्ट हैं। उन्होंने शिमला तक का सफर साइकिल से किया है।
14 साल की उम्र में तय किया 250 किमी का सफर
सेक्टर-7 निवासी महकप्रीत सिंह अभी 14 साल के हैं। 9वीं के छात्र महक ने अपना कॅरिअर ही साइकिल के क्षेत्र में बनाने का फैसला किया है। कोरोना काल में शुरू हुआ साइक्लिंग का सफर आज सेहत के साथ ही भविष्य की राह को स्पष्ट करता दिख रहा है। महकप्रीत ने बताया कि चंडीगढ़ से फिरोजपुर तक 250 किमी के सफर को उन्होंने अपने दोस्तों के साथ साइकिल से तय किया। यह एक अनोखा अनुभव था। इसके बाद कालका से शिमला तक एक मैराथन हुई थी। इसमें लगभग 15 साइक्लिस्टों ने भाग लिया था। 7 घंटे की इस मैराथन को कुछ स्टॉपेज के साथ पूरा किया था। इसमें वे प्रथम स्थान पर रहे थे। महकप्रीत का मानना है कि जब आप मेहनत करते हैं और उसका परिणाम बेहतर आता है तो आपका हौसला सातवें आसमान पर होता है।