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विश्व गौरेया दिवस : चंडीगढ़ के आलीशान मकानों में झरोखे नहीं, रूठ गई घोंसला बनाने वाली गौरेया
Sat, 20 Mar 2021 10:31 AM IST
निवेदिता वर्मा
आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sat, 20 Mar 2021 10:31 AM IST
सार
- चंडीगढ़ में कई लोगों ने सालों से गौरेया को नहीं देखा।
- आलीशान मकानों में झरोखे नहीं मिलने से गौरेया नहीं बनाती घोंसला
- मोबाइल टावर भी कर रहे गौरेया की प्रजनन क्षमता को प्रभावित
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चंडीगढ़ में सुखना लेक किनारे बैठी गौरेया।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
20 मार्च को विश्व गौरेया दिवस मनाया जाता है। चंडीगढ़ में मैना, कबूतर, बुलबुल और कौए तो खूब दिखेंगे, लेकिन गौरेया को देखने के लिए आंखें तरस जाती हैं। कई लोग तो ऐसे हैं, जिन्होंने कई सालों से इस चिड़िया को नहीं देखा। इसकी एक बड़ी वजह है कि चंडीगढ़ में लोगों ने आलीशान मकान बना रखे हैं लेकिन वे अपने घरों में कोई झरोखा नहीं छोड़ते। गौरेया अक्सर मकानों के सुराख, दीवार की टूटी ईंटों के बीच या झरोखे पर ही अपना घोंसला बनाती है। भूले-बिसरे उसने कहीं घोंसला बना भी दिया तो गंदगी फैलने के डर से लोग उसे उजाड़ देते हैं। पक्षी विशेषज्ञ कहते हैं कि ये चंडीगढ़ में गौरेया के न दिखने का एक बड़ा कारण है।
इसके अलावा गौरेया कुछ पेड़ों पर भी घोंसला बनाती है। इनमें बबूल, कनेर, नींबू, अनार, मेहंदी, बांस, चांदनी, अमरूद आदि शामिल हैं। इन पेड़ों की संख्या भी चंडीगढ़ में काफी कम है। इन पेड़ों को अब बहुत ही कम लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि मोबाइल टावर भी गौरेया की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती है।
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इसके अलावा गौरेया कुछ पेड़ों पर भी घोंसला बनाती है। इनमें बबूल, कनेर, नींबू, अनार, मेहंदी, बांस, चांदनी, अमरूद आदि शामिल हैं। इन पेड़ों की संख्या भी चंडीगढ़ में काफी कम है। इन पेड़ों को अब बहुत ही कम लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि मोबाइल टावर भी गौरेया की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती है।
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भोजन भी एक बड़ी वजह
आमतौर पर गौरेया बाजरा, धान, पके चावल के दाने और सुंडियां खाती है। अब यह सब नहीं मिलता है। पहले लोग घर का आटा पिसाने के लिए गेहूं को धोते थे और उसे सुखाने के लिए छत पर रखते थे। इसे खाने के लिए बहुत से पक्षी आते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होता है। गौरेया अपने बच्चों को सुंडियां खिलाती है, जो प्रोटीन से भरे होते हैं, मगर पेस्टीसाइड का इस्तेमाल होने से सुंडियां मर जाती है। इससे गौरेया के बच्चों को सुंडियां मिलती नहीं और वह मर जाते हैं।
पीजीआई की सर्वे में क्या मिला था
आज से करीब छह साल पहले पीजीआई व पंजाब यूनिवर्सिटी ने एक साझा सर्वे में 25 फीसदी लोगों ने माना था कि उन्होंने पिछले दस सालों के दौरान गौरेया को नहीं देखा है। इस सर्वे में 1200 लोगों को शामिल किया गया था। वहीं, 20 फीसदी लोगों ने पिछले एक से पांच सालों में गौरेया को नहीं देखा था। सिर्फ 24 फीसदी लोगों ने कहा था कि उन्होंने गौरेया को देखा है।
आमतौर पर गौरेया बाजरा, धान, पके चावल के दाने और सुंडियां खाती है। अब यह सब नहीं मिलता है। पहले लोग घर का आटा पिसाने के लिए गेहूं को धोते थे और उसे सुखाने के लिए छत पर रखते थे। इसे खाने के लिए बहुत से पक्षी आते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होता है। गौरेया अपने बच्चों को सुंडियां खिलाती है, जो प्रोटीन से भरे होते हैं, मगर पेस्टीसाइड का इस्तेमाल होने से सुंडियां मर जाती है। इससे गौरेया के बच्चों को सुंडियां मिलती नहीं और वह मर जाते हैं।
पीजीआई की सर्वे में क्या मिला था
आज से करीब छह साल पहले पीजीआई व पंजाब यूनिवर्सिटी ने एक साझा सर्वे में 25 फीसदी लोगों ने माना था कि उन्होंने पिछले दस सालों के दौरान गौरेया को नहीं देखा है। इस सर्वे में 1200 लोगों को शामिल किया गया था। वहीं, 20 फीसदी लोगों ने पिछले एक से पांच सालों में गौरेया को नहीं देखा था। सिर्फ 24 फीसदी लोगों ने कहा था कि उन्होंने गौरेया को देखा है।
ऐसे बढ़ सकती है गौरेया की संख्या
आसपास देखे कि कहां पर गौरेया आती हैं। यदि ऐसा है तो वहां पर नियमित रूप से दाना-पानी रखें। उसके लिए घोंसला बनाकर उसे सुरक्षित माहौल दें। यह एक लंबी प्रक्रिया है। धीरे-धीरे इनकी संख्या में बढ़ोतरी होगी। उनके लिए कृत्रिम घोंसले भी बना सकते हैं। बाजार में भी बहुत से बने बनाए घोंसले आते हैं। एक बात जरूर ध्यान रखनी होगी कि गौरेया को नमक वाला खाना नहीं डालना चाहिए। नमक उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है।
जहां पर चिड़िया आती हैं, यदि वहां पर प्रयास किए जाएं तो इनकी संख्या जरूर बढ़ेगी। चंडीगढ़ के कुछ ही जगहों में गौरेया हैं। मेरे घर में दो तीन गौरेया थीं। उन्हें दाना-पानी दिया, सुरक्षा दी। 20 सालों में जाकर उनकी संख्या 25 से 30 हो गई है। कोशिश करें और साथ में धैर्य भी रखें। यदि इन्हें बचाया नहीं गया तो यह चिड़िया विलुप्त हो जाएगी। -एमएस सेखों, प्रेसिडेंट चंडीगढ़ बर्ड्स क्लब
आसपास देखे कि कहां पर गौरेया आती हैं। यदि ऐसा है तो वहां पर नियमित रूप से दाना-पानी रखें। उसके लिए घोंसला बनाकर उसे सुरक्षित माहौल दें। यह एक लंबी प्रक्रिया है। धीरे-धीरे इनकी संख्या में बढ़ोतरी होगी। उनके लिए कृत्रिम घोंसले भी बना सकते हैं। बाजार में भी बहुत से बने बनाए घोंसले आते हैं। एक बात जरूर ध्यान रखनी होगी कि गौरेया को नमक वाला खाना नहीं डालना चाहिए। नमक उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है।
जहां पर चिड़िया आती हैं, यदि वहां पर प्रयास किए जाएं तो इनकी संख्या जरूर बढ़ेगी। चंडीगढ़ के कुछ ही जगहों में गौरेया हैं। मेरे घर में दो तीन गौरेया थीं। उन्हें दाना-पानी दिया, सुरक्षा दी। 20 सालों में जाकर उनकी संख्या 25 से 30 हो गई है। कोशिश करें और साथ में धैर्य भी रखें। यदि इन्हें बचाया नहीं गया तो यह चिड़िया विलुप्त हो जाएगी। -एमएस सेखों, प्रेसिडेंट चंडीगढ़ बर्ड्स क्लब
चंडीगढ़ में बने आधुनिक मकानों की वजह से यहां पर गौरेया बहुत कम हैं। ये अपने घोंसले उन जगहों पर बनाती हैं, जहां पर सुराख हो। गौरेया को न तो घर मिल रहा है और न ही दाना-पानी। पहली कोशिश हमें यह करनी चाहिए कि जहां पर यह चिड़िया हो, उसे सुरक्षित करने के लिए कदम उठाएं। उन्हें खाना और रहने की जगह मुहैया करवाएं। -रीमा ढिल्लन, बर्ड वॉचर चंडीगढ़