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यादें: बटालवी टैगोर थिएटर की दीवार पर लिखते थे नज्में, मेरी ड्यूटी नोट करके उन्हें सौंपना था
Sat, 17 Aug 2019 11:22 AM IST
पंचकुला ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: पंचकुला ब्यूरो
Updated Sat, 17 Aug 2019 11:22 AM IST
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शिव कुमार बटालवी के लिए परिचर्चा
- फोटो : अमर उजाला
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शिव कुमार बटालवी और कुमार विकल अक्सर रात में मेरे दफ्तर के नीचे आते थे, फिर हम घूमने निकल जाते थे। कई बार वह शराब पीकर सेक्टर-18 स्थित टैगोर थिएटर के पीछे की दीवार पर चॉक या कोयला से कविता लिखते थे। मेरी काम था कि सुबह सुबह उठकर उस नज्म को कागज पर लिखना और उन्हें सौंपना। यह बात शिव कुमार बटालवी के दोस्त और हरियाणा उर्दू अकादमी पंचकूला के निदेशक डॉ. चन्द्र त्रिखा ने शुक्रवार को पीयू में शिव बटालवी पर आयोजित परिचर्चा के दौरान साझा कीं।
डॉ. त्रिखा ने बताया कि आमतौर पर शिव कुमार बटालवी रोमांटिक कविता के लिए जाने जाते हैं, लेकिन अगर बारीकी से अध्ययन करें तो पाएंगे कि उन्होंने समाज के विभिन्न सरोकारों पर भी कविता लिखी है। उन्होंने विशेष तौर पर शिव कुमार बटालवी और कुमार विकल के साथ बिताए वक्त के कई निजी अनुभव सभी के साथ साझा किए। परिचर्चा के बाद विभाग की शोध पत्रिका ‘परिशोध’ में जिन शोधार्थियों के आलेख प्रकाशित हुए हैं उनको उसकी एक- एक प्रति डॉ. चन्द्र त्रिखा के द्वारा भेंट की गई।
इनमें रामसिंह यादव, हैप्पी, मुलायम यादव, नवीन कुमार नीरज, सुअम्बदा, बलजीत कौर, प्रवीन मलिक और शकुंतला शामिल हैं। कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष डॉ. गुरमीत सिंह, प्रो. सत्यपाल सहगल और जनसंचार विभाग से डॉ. भवनीत भट्टी उपस्थित रहीं। इस कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी बोबिजा द्वारा किया गया।
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डॉ. त्रिखा ने बताया कि आमतौर पर शिव कुमार बटालवी रोमांटिक कविता के लिए जाने जाते हैं, लेकिन अगर बारीकी से अध्ययन करें तो पाएंगे कि उन्होंने समाज के विभिन्न सरोकारों पर भी कविता लिखी है। उन्होंने विशेष तौर पर शिव कुमार बटालवी और कुमार विकल के साथ बिताए वक्त के कई निजी अनुभव सभी के साथ साझा किए। परिचर्चा के बाद विभाग की शोध पत्रिका ‘परिशोध’ में जिन शोधार्थियों के आलेख प्रकाशित हुए हैं उनको उसकी एक- एक प्रति डॉ. चन्द्र त्रिखा के द्वारा भेंट की गई।
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इनमें रामसिंह यादव, हैप्पी, मुलायम यादव, नवीन कुमार नीरज, सुअम्बदा, बलजीत कौर, प्रवीन मलिक और शकुंतला शामिल हैं। कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष डॉ. गुरमीत सिंह, प्रो. सत्यपाल सहगल और जनसंचार विभाग से डॉ. भवनीत भट्टी उपस्थित रहीं। इस कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी बोबिजा द्वारा किया गया।
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...जब पुलिस ने पकड़ा और कहा- कविता सुनाओ, छोड़ देंगे
डॉ. चन्द्र त्रिखा ने बताया, एक बार शिव कुमार बटालवी, कुमार विकल और वे रात के समय शहर में घूम रहे थे। एक जगह पर जाकर पुलिस ने उन्हें रोका और पुलिस स्टेशन ले गए। डॉ. त्रिखा ने पुलिसकर्मियों को समझाया कि यह बहुत बड़े शायर शिव बटालवी और कुमार विकल हैं। जब थानेदार को यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि अगर कवि हो तो कोई कविता सुनाओ.. छोड़ देंगे। शिव ने तुरंत कहा कि वह चाहे तो उन्हें अरेस्ट कर लें, लेकिन वह ऐसे माहौल में कविता नहीं सुना सकते। डॉ. त्रिखा ने कहा कि शिव ने कभी भी अपनी कविताओं के साथ समझौता नहीं किया।
अमृता प्रीतम ने बटालवी को दिया था ‘बिरह का सुल्तान’ उपनाम
शिव कुमार बटालवी के गीतों में ‘बिरह की पीड़ा’ इस कदर थी कि उस दौर की प्रसिद्ध कवयित्री अमृता प्रीतम ने उन्हें ‘बिरह का सुल्तान’ नाम दे दिया। शिव कुमार बटालवी यानी पंजाब का वह शायर जिसके गीत हिंदी में न आकर भी वह बहुत लोकप्रिय हो गया। उसने जो गीत अपनी गुम हुई महबूबा के लिए बतौर इश्तहार लिखा था वो जब फिल्मों तक पहुंचा तो मानो हर कोई उसकी महबूबा को ढूंढते हुए गा रहा था।
अमृता प्रीतम ने बटालवी को दिया था ‘बिरह का सुल्तान’ उपनाम
शिव कुमार बटालवी के गीतों में ‘बिरह की पीड़ा’ इस कदर थी कि उस दौर की प्रसिद्ध कवयित्री अमृता प्रीतम ने उन्हें ‘बिरह का सुल्तान’ नाम दे दिया। शिव कुमार बटालवी यानी पंजाब का वह शायर जिसके गीत हिंदी में न आकर भी वह बहुत लोकप्रिय हो गया। उसने जो गीत अपनी गुम हुई महबूबा के लिए बतौर इश्तहार लिखा था वो जब फिल्मों तक पहुंचा तो मानो हर कोई उसकी महबूबा को ढूंढते हुए गा रहा था।