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NDA से नाता टूटने से अकाली दल को तीन तरफ से नुकसान, अब इस पार्टी से गठबंधन की कवायद
Mon, 28 Sep 2020 10:12 AM IST
खुशबू गोयल
अमर उजाला, जालंधर
अमर उजाला, जालंधर
Published by: खुशबू गोयल
Updated Mon, 28 Sep 2020 10:12 AM IST
सार
- पंथक, किसानी और शहरी वोट अकाली दल के साथ से निकला
- गठबंधन टूटने से अकाली दल को शहरी हलकों में नुकसान
- पहले ही पंथक नेताओं और किसानों की नाराजगी झेल रहा शिअद
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Sukhbir Badal
- फोटो : File Photo
विस्तार
पंजाब में भाजपा के साथ गठबंधन टूटने से अकाली दल को तीन तरफ से नुकसान हुआ है और भाजपा की तरह अकालियों की राहें भी आगे के लिए आसान नहीं रहेंगी। सूबे का इतिहास गवाह है कि यहां जिस भी पार्टी की सरकार बनी है, वह शहरी वोटरों के दम पर ही बनी है।
अकाली दल ग्रामीण व भाजपा शहरी वोट लेकर पंजाब में तीन बार सत्ता में काबिज हो चुके हैं लेकिन अब सियासत उलट गई है। अकाली दल को शहरों से वोट लेना आसान नहीं होगा। वहीं अब अकाली कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन कर सकता है। पंजाब में कम्युनिस्टों के पास 2-3 प्रतिशत वोट हैं, ऐसे में अकाली दल उनके जरिए गांवों में किसानों और मजदूरों तक पैठ बनाना चाहता है।
पार्टी की कोर टीम इस पर मंथन कर रही है। लेकिन अकाली दल के लिए शहरी क्षेत्रों में विश्वास बनाना आसान नहीं है, क्योंकि शहरों में हिंदू वोट काफी अधिक हैं। वहीं, अकाली दल को पंथक वोट बैंक की भी नाराजगी झेलनी पड़ रही है। बहिबल कलां व बरगाड़ी कांड के दाग अभी अकाली दल के दामन से उतरे नहीं हैं। इसके अलावा 328 पावन स्वरूप लापता होने का मामला भी अकाली दल के सिर पर है।
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अकाली दल ग्रामीण व भाजपा शहरी वोट लेकर पंजाब में तीन बार सत्ता में काबिज हो चुके हैं लेकिन अब सियासत उलट गई है। अकाली दल को शहरों से वोट लेना आसान नहीं होगा। वहीं अब अकाली कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन कर सकता है। पंजाब में कम्युनिस्टों के पास 2-3 प्रतिशत वोट हैं, ऐसे में अकाली दल उनके जरिए गांवों में किसानों और मजदूरों तक पैठ बनाना चाहता है।
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पार्टी की कोर टीम इस पर मंथन कर रही है। लेकिन अकाली दल के लिए शहरी क्षेत्रों में विश्वास बनाना आसान नहीं है, क्योंकि शहरों में हिंदू वोट काफी अधिक हैं। वहीं, अकाली दल को पंथक वोट बैंक की भी नाराजगी झेलनी पड़ रही है। बहिबल कलां व बरगाड़ी कांड के दाग अभी अकाली दल के दामन से उतरे नहीं हैं। इसके अलावा 328 पावन स्वरूप लापता होने का मामला भी अकाली दल के सिर पर है।
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किसानी वोट काफी दूर जा चुका है
किसानों का जनाधार भी अकाली दल से काफी दूर जा चुका है। जून से लेकर सितंबर तक जिस तरह से अकाली दल कृषि विधेयकों की वकालत करता रहा है, उसके वीडियो लगातार सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। किसानों द्वारा दिए गए धरनों में अकाली नेताओं को नहीं आने दिया गया। किसान नेता बलवंत सिंह का कहना है कि जून से अकाली दल को कृषि विधेयक का पता था।
कैबिनेट में विधेयक लाए गए, उसमें हरसिमत कौर बादल मौजूद थीं। जून से लेकर सितंबर तक बादल परिवार विधेयकों की वकालत करता रहा और अब जब किसान सड़कों पर उतर आए तो अकाली दल को अपना ग्रामीण वोट खिसकता दिखा तथा हरसिमरत बादल ने इस्तीफा दे दिया। पंजाब में 65 फीसदी सीट ग्रामीण हलकों से हैं, जिसमें ज्यादातर वोट किसानों का है। अगले विधानसभा चुनाव में 18 माह का समय है, ऐसे में अकाली दल की मुश्किलें कम होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही हैं।
गठबंधन का गणित
पंजाब में 1997 में पहली बार अकाली दल-भाजपा की सरकार बनी थी तो गठबंधन को 94 सीटें मिली थी। इसमें भाजपा की 18 सीटें थीं। भाजपा ने शहरी वोट लिए और अकाली दल ने ग्रामीण। 2002 में कैप्टन सरकार बनी तो शहरी वोट कांग्रेस की तरफ खिसक गया। 2007 में अकाली दल 48 और भाजपा 19 सीटों पर जीती। शहरों में गठबंधन का परचम लहराया। 2012 में भी शहरी वर्ग ने शिअद भाजपा को वोट दिया और गठबंधन सरकार दोबारा बनी। 2017 में शहरी क्षेत्र गठबंधन से खिसक गया और भाजपा सिर्फ तीन सीट पर आ गई। नतीजा, गठबंधन हार गया।
कैबिनेट में विधेयक लाए गए, उसमें हरसिमत कौर बादल मौजूद थीं। जून से लेकर सितंबर तक बादल परिवार विधेयकों की वकालत करता रहा और अब जब किसान सड़कों पर उतर आए तो अकाली दल को अपना ग्रामीण वोट खिसकता दिखा तथा हरसिमरत बादल ने इस्तीफा दे दिया। पंजाब में 65 फीसदी सीट ग्रामीण हलकों से हैं, जिसमें ज्यादातर वोट किसानों का है। अगले विधानसभा चुनाव में 18 माह का समय है, ऐसे में अकाली दल की मुश्किलें कम होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही हैं।
गठबंधन का गणित
पंजाब में 1997 में पहली बार अकाली दल-भाजपा की सरकार बनी थी तो गठबंधन को 94 सीटें मिली थी। इसमें भाजपा की 18 सीटें थीं। भाजपा ने शहरी वोट लिए और अकाली दल ने ग्रामीण। 2002 में कैप्टन सरकार बनी तो शहरी वोट कांग्रेस की तरफ खिसक गया। 2007 में अकाली दल 48 और भाजपा 19 सीटों पर जीती। शहरों में गठबंधन का परचम लहराया। 2012 में भी शहरी वर्ग ने शिअद भाजपा को वोट दिया और गठबंधन सरकार दोबारा बनी। 2017 में शहरी क्षेत्र गठबंधन से खिसक गया और भाजपा सिर्फ तीन सीट पर आ गई। नतीजा, गठबंधन हार गया।