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कैसे पड़े भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के नाम, बेहद दिलचस्प है नामकरण की कहानी

Fri, 22 Mar 2019 03:40 PM IST
दुष्यंत शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 22 Mar 2019 03:40 PM IST
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शहीद भगत सिंह
शहीदी दिवस के मौके पर हम आपको सुना रहे हैं, शहीद भगत सिंह, शहीद राजगुरु और शहीद सुखदेव के नामकरण की दिलचस्प कहानी। सरदार किशन सिंह और विद्यावती कौर के घर जन्मा एक बालक शहीद-ए-आज़म भगतसिंह कहलाया, लेकिन उनका नाम भगतसिंह कैसे पड़ा, इसके पीछे एक कहानी है। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो यह जानते होंगे, आइए सुनते हैं...
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शहीद-ए-आजम भगतसिंह के परिवार में वतन परस्ती कूट-कूट कर भरी हुई थी। उनके पिता सरदार किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह भी स्वतंत्रता सेनानी थे। 28 सितंबर, 1907 के दिन जब भगत सिंह का जन्म हुआ तो उसी दिन उनके पिता और चाचा जेल से रिहा हो कर घर आए थे। घर में एक नन्हा सा सदस्य आने से पिता और चाचा की घर वापसी हो गई, इससे घर में खुशी का माहौल था।
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जब भगत के पिता और चाचा घर आए तो दादी जय कौर ने कहा "ए मुंडा बड़ा ही भाग वाला है।" तभी निर्णय लिया गया कि इस बच्चे का नाम भाग या इससे मिलता जुलता रखेंगे। परिवार में आम सहमति के बाद इस बच्चे का नाम भगत सिंह रखा गया। इसी भगत सिंह ने आगे चल कर मात्र 23 साल की जिन्दगी जी कर एक ऐसा स्वर्णिम इतिहास लिख दिखाया जो आज भी हर भारतीय को देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत कर देता है।
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ऐसे पड़ा नाम राजगुरु

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राजगुरु
24 अगस्त, 1908 को खेड़ा पुणे (महाराष्ट्र)  में पण्डित हरिनारायण राजगुरु और पार्वती देवी के घर इस महान क्रांतिकारी और अमर बलिदानी का जन्म हुआ। शिवराम हरिनारायण अपने नाम के पीछे राजगुरु लिखते थे। यह कोई उपनाम नहीं है, बल्कि एक उपाधि है। इनके पिता पण्डित हरिनारायण राजगुरु, पण्डित कचेश्वर की सातवीं पीढ़ी में जन्मे थे। इनका उपनाम ब्रह्मे था। यह प्रकांड ज्ञानी पण्डित थे।

एक बार जब महाराष्ट्र में भयंकर अकाल पड़ा तो पण्डित कचेश्वर ने इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ किया। लगातार 2 दिनों तक घोर यज्ञ करने के बाद तीसरे दिन सुबह बहुत तेज़ बारिश शुरू हुई जो कि बिना रुके लगभग एक सप्ताह तक चलती रही। इससे पण्डित कचेश्वर की ख्याति पूरे मराठा रियासत में फैल गई। जब इसकी सूचना शाहू जी महाराज तक पहुंची तो वह भी इनकी मंत्र शक्ति के प्रशंसक हो गए।

इस समय मराठा सम्राज्य में शाहू जी महाराज और तारा बाई के बीच राज गद्दी को लेकर टकराव चल रहा था। इसमें शाहू जी महाराज की स्थिति कमजोर थी क्योंकि मराठा सरदार ताराबाई की सहायता कर रहे थे। इसी घोर विकट परिस्थिति में शाहू जी महाराज को पण्डित कचेश्वर एक आशा की किरण लगे। इसी के चलते शाहू जी महाराज इनसे मिलने चाकण गांव पहुंचे।

शाहू जी महाराज ने अपने राज के खिलाफ हो रहे षड्यंत्रों से अवगत करवाते हुए उनसे आशीर्वाद मांगा। पण्डित कचेश्वर ने आशीर्वाद देते हुए युद्ध में इनके जीतने की घोषणा की जिसके बाद शाहू जी महाराज की अंतिम युद्ध में जीत हुई। शाहू जी ने इस जीत का श्रेय पण्डित कचेश्वर को दिया और उन्हें अपना गुरु मानते हुए राजगुरु की उपाधि दी। तभी से इनके वंशज अपने नाम के पीछे राजगुरु लगाने लगे।

ऐसे पड़ा नाम सुखदेव

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सुखदेव
सुखदेव थापर का जन्म पंजाब के लुधियाना जिले में 15 मई, 1907 में रामलाल और रल्ली देवी के घर हुआ था। इनके जन्म से 3 महीने ही इनके पिता का निधन हो गया था। इसलिए इनके लालन पोषण में इनके ताऊ अचिंतराम ने इनकी माता को पूर्ण सहयोग दिया। सुखदेव को इनके ताऊ व ताई ने अपने बेटे की तरह पाला पोसा। यह शहीद-ए-आज़म भगतसिंह के परम मित्र थे।

सुखदेव ने लाला लाजपत राय की मौत का बदल लेने के लिए अंग्रेज़ पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या की योजना रची थी। जिसे 17 दिसम्बर, 1928 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने अंजाम दिया था। इन्होंने महात्मा गाँधी द्वारा क्रांतिकारी गतिविधियों को नाकरे जाने के फलस्वरूप अंग्रेजी में गाँधी जी को एक खुला पत्र लिखा था जो कि तत्कालीन समय में बहुत ही चर्चाओं में रहा और युवा वर्ग में काफी लोकप्रिय भी हुआ।

यह एक संयोग ही है कि यह तीनों अमर शहीद 1 साल (1907-1908) के भीतर ही पैदा हुए और 23 मार्च, 1931 को एक दिन एक साथ ही शहीद हो गए। इनकी इस शहादत को भारत का हर एक बच्चा आज तक भी नहीं भूल पाया है और आनी वाली कई सदियों तक नहीं भूल सकेगा। भारत माता के इन अनमोल रत्नों की शहादत को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है।
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