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शोध में खुलासाः चंडीगढ़ के आठ फीसदी स्कूली बच्चों की छाती से आती है घरघराहट की आवाज

Sat, 15 Feb 2020 11:21 AM IST
खुशबू गोयल आशीष वर्मा, चंडीगढ़
आशीष वर्मा, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Sat, 15 Feb 2020 11:21 AM IST
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Research by PGI Chandigarh Pediatric Department Doctors on School Students Health
फाइल फोटो
क्या आपके बच्चे की छाती से घरघराहट की आवाज आती है? यदि ऐसा है तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। यह अस्थमा के लक्षण हो सकते हैं। ग्लोबल अस्थमा नेटवर्क फेज वन के तहत पीजीआई के पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट की चंडीगढ़ के स्कूली बच्चों पर की गई स्टडी के परिणाम भी यही बताते हैं कि करीब आठ फीसदी बच्चे घरघराहट से पीड़ित हैं। स्टडी में छह हजार बच्चों को शामिल किया गया। सवाल के आधार पर उन्हें अस्थमा, घरघराहट और एलर्जी के लिए स्क्रीन किया गया। इनमें करीब दो फीसदी बच्चों में अस्थमा भी मिला।
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शोध में शामिल डॉ.क्टरों ने बताया कि बच्चों में घरघराहट के मामले पहले छह फीसदी थे। नया शोध बताता है कि बच्चों में यह समस्या बढ़ रही है। पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट की प्रोफेसर डॉ. मीनू सिंह का कहना है कि इसके लिए काफी हद तक प्रदूषण के साथ वे पेड़ जिम्मेदार हैं, जिनके परागकण वातावरण में आते हैं। जब भी बच्चों की छाती से घरघराहट की आवाज आए तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। अधिकतर मामले आगे चलकर अस्थमा में बदल जाते हैं। हालांकि कुछ ऐसे मामले होते हैं, जिनमें अस्थमा नहीं होता है। यदि अच्छे डॉक्टर को दिखाया तो उसे कंट्रोल भी किया जा सकता है।
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टेलीमेडिसिन से जुड़े डॉ. अनिल चौहान ने बताया कि अस्थमा के इलाज की चार स्टेज होती हैं। जांच के बाद ही पता चलता है कि बच्चा कौन सी स्टेज में शामिल है। डॉ. अनिल के मुताबिक, स्टडी में दो उम्र वर्ग के बच्चों को शामिल किया गया था। इनमें तीन हजार बच्चे छह से सात साल की उम्र के थे, जबकि 13 से 14 उम्र के तीन हजार बच्चे शामिल थे। इन बच्चों के अलावा उनके पैरेंट्स से भी बात की गई ताकि पता चल सके कि कहीं पैरेंट्स से तो बच्चों में अस्थमा नहीं आया। यदि पैरेंट्स को अस्थमा हो तो 40 फीसदी बच्चे भी अस्थमा से पीड़ित होते हैं।
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अस्थमा पीड़ित मरने वाले ज्यादा

इंडियन एकेडमी ऑफ एलर्जी: आईकॉन 2020 में शामिल डॉ. राजा धार ने बताया कि विश्व के कुल अस्थमा मरीजों में भारत की हिस्सेदारी करीब दस प्रतिशत है, जबकि मरने वालों में 20 फीसदी हिस्सेदारी है। दोगुना मौत के मुद्दे पर उनका कहना है कि भारत में अस्थमा के प्रति जागरूकता काफी कम है। लोग इलाज नहीं कराने आते हैं। वे जब तक पहुंचते हैं, तब तक स्थिति काफी खराब हो चुकी होती है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से मरीज पहचाने जाएंगे
पीजीआई अस्थमा पीड़ितों की जांच के लिए एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) उपकरण विकसित कर रहा है। इसके माध्यम से न सिर्फ उन मरीजों का डॉ.टा मजबूत होगा, जो पिछले 20 साल से पीजीआई में इलाज करा रहे हैं, जबकि इसके आधार पर दूसरे मरीजों की जांच करना आसान होगा। संस्थान ने लगभग 10,000 बच्चों का डाटा इलेक्ट्रॉनिक आधुनिक रिकॉर्ड में बदल दिया गया है।

डॉ. अनिल चौहान के मुताबिक एक ऐप भी विकसित किया जा रहा है, जो अस्थमा डायग्नोज में सहायक होगा।
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