पंजाब में क्यों पलटा देश का जनादेश?
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एक तरफ पूरा देश भाजपा द्वारा लोकसभा चुनाव में हासिल की ऐतिहासिक जीत का जश्न मना रहा है तो पंजाब में लोगों ने अलग ही इतिहास लिख डाला जो भाजपा के साथ-साथ उनके सत्ता में मुख्य राजनीतिक सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के लिए भी भारी नमोशी का कारण बन गया है।
भाजपा के राष्ट्रीय नेता और पार्टी के चाणक्य अरुण जेटली की अमृतसर लोकसभा सीट से हार के बहुत से मायने हैं और यह लोगों के दिलों में सत्ता पक्ष के विरुद्ध तीव्र रोष का एक व्यापक रूप है। इसी रोष से निकली है आम आदमी पार्टी की वो लहर जिसने सभी बड़े राजनीतिक दलों की नींव को हिलाकर रख दिया है।
मोदी की लहर से अछूता रहा पंजाब
देशभर में पंजाब ही एक ऐसा राज्य है, जो भाजपा के घोषित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर से अछूता रह गया है। हालांकि पंजाब की सरहद से जुड़े हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, हरियाणा और राजस्थान में मोदी लहर ने खूब रंग जमाया।
इस का कुछ तो कारण रहा होगा। चुनाव के नतीजे देख कर यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि लोगों के रोष के सामने मोदी लहर भी विफल हो गई।
पंजाब मे भाजपा और अकाली दल के गठजोड़ को अगर आज ही विधानसभा का चुनाव लड़ना पड़े तो शायद एक और नया इतिहास बन के सामने आए।
शिअद को चार और भाजपा को दो सीटें
पंजाब में शिअद को चार और भाजपा को दो सीटें मिली हैं, कांग्रेस को केवल तीन और आम आदमी पार्टी को चार सीटे मिलीं। पिछली लोकसभा में शिअद के पास चार, भाजपा के पास एक और कांग्रेस के पास आठ सीटें थीं। इस हिसाब से सबसे बड़ा नुकसान यूं तो कांग्रेस पार्टी का हुआ है जो सिर्फ तीन सीटों पर सिमट कर रह गई है।
तर्क यह दिया जा रहा है कि कांग्रेस को आप के कारण नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन यह तर्क इसलिए माना नहीं जा सकता, क्योंकि आप को पड़ी भारी वोट ने कहीं न कहीं यह बात साबित कर दी है कि लोगों का कांग्रेस से भी विश्वास उठ चुका है और आप एक बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।
आप के चार उम्मीदवार भारी मतों से जीते हैं और दो उम्मीदवार ऐसे भी हैं जो दूसरे नंबर पर रहे हैं। आप को भारी समर्थन इसलिए भी विशेष है कि पार्टी का पंजाब में कोई संगठन तक नहीं था।
आप ने सभी का काम बिगाड़ा
दूसरा आप ने मालवा क्षेत्र की चार सीटों फतेहगढ़ साहिब, पटियाला, फरीदकोट और संगरूर में जीत हासिल की है और संयोगवश ये चारों सीटें पूरी तरह ग्रामीण हैं और मालवा में शिअद का वोटबैंक समझी जाती हैं।
लुधियाना में आप के एचएस फूलका 275070 वोट लेकर दूसरे नंबर पर रहे हैं और आप ने पंजाब में कुल 4085161 (लगभग 41 लाख) वोट हासिल किए। बठिंडा और अमृतसर को छोड़कर आप के सभी प्रत्याशी एक लाख से ज़्यादा वोट ले गए। अकाली दल को सभी 13 सीटों पर 3148251 वोट मिले और भाजपा को 1183525 वोट मिले जो कुल मिलाकर 4331776 बनते हैं।
कांग्रेस को कुल 4541574 वोट मिले जो सबसे ज़्यादा हैं। तीनों में अंतर दो लाख के करीब है। इस क्रम से कांग्रेस सब से आगे है। दूसरे नंबर पर अकाली-भाजपा गठबंधन और तीसरे नंबर पर आप है।
कांग्रेस भी आप से पिछड़ी
कांग्रेस सीटों के मामले में फिर भी आप से पिछड़ गई और केवल तीन सीटें ही ले सकी। अकाली दल-भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव के नतीजे एक ऐसा अवसर बन कर आए हैं, जिसका अगर सही ढंग से उपयोग कर सके तो आगामी विधानसभा चुनाव में वो कुछ बेहतर कर सकते हैं।
पंजाब में ड्रग्स की समस्या इतनी बड़ी है लेकिन इसे स्वीकार करने को कोई तैयार नहीं है। सबको पता है कि रेत-बजरी के भाव रेत माफिया की देन हैं लेकिन इसे स्वीकार नही किया जाएगा। इसके लिए पाकिस्तान और केंद्र दोषी है।
पहले यह स्वीकार करना होगा कि सरकार में कहीं न कहीं दोष है, तभी उसका इलाज संभव है। पंजाब में क़ानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार चुनाव में बड़े मुद्दे थे। पुलिस और प्रशासन का राजनीतिकरण लोगों की आम जिंदगी में खलल डाल रहा है।
अकाली-भाजपा गठबंधन के लिए चुनौती
कम से कम इतना तो सोचा जा सकता है कि मोदी लहर पंजाब की सीमा के अंदर क्यों नहीं आ सकी। यह चुनाव अकाली-भाजपा सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती छोड़कर जा रहे हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पंजाब की राजनीति में तब्दीली का दौर शुरू हो गया है और शायद यह तब्दीली ऐतिहासिक हो।
एक बात और उभरकर सामने आई है कि कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल में नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है। पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा चुनाव हारकर अपना वजूद खो चुके हैं। अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल को ग्रामीण वोट बैंक खोने से बड़ा धक्का लगा है।
राज्य भाजपा का नेतृत्व भी बुरी तरह विफल हो गया है, जिसके अध्यक्ष कमल शर्मा को जेटली हार के कारण बड़ी निराशा झेलनी पड़ रही है। पंजाब को शायद एक दमदार नेतृत्व की जरूरत है।