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दो बेटे पर कोई न आया, मां-बाप का अंत ‘संध्या छाया’

Mon, 12 May 2014 02:03 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Mon, 12 May 2014 02:03 PM IST
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punjab kala bhawan play 'sandhya chaya'

अगर एक नाटक में कुछ नया न किया जाए तो दर्शक उसे देखने की जहमत नहीं उठाते। यही देखने को मिला नाटक संध्या छाया में। रविवार शाम पंजाब कला भवन में नाटक ‘संध्या छाया’ का मंचन हुआ।

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पंजाब संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित इस नाटक को हरियाणा कला परिषद, मल्टी आर्ट कल्चर सेंटर कुरुक्षेत्र के कलाकारों ने मंचित किया।

बच्चों के आने का रहा इंतजार
नाटक की कहानी एक बुजुर्ग दंपति की है। रिटायर्ड ए क्लास ऑडिटर सतनाम बुजुर्ग पत्नी के साथ रहते हैं। उनके दो बच्चे हैं, इनमें से बड़ा बेटा अमेरिका में रहता है तो दूसरा कश्मीर में सिपाही के तौर पर तैनात है।
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पति पत्नी को अकसर बेटों के आने का इंतजार रहता है। सतनाम और उनकी पत्नी बच्चों को इतना याद करते हैं कि घर आने वाले किस भी बच्चे में अपने बच्चों को तलायाने लगते हैं।
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इसी बीच एक दिन दोनों को पता चलता है कि उनके अमेरिका में रहने वाले बेटे ने शादी कर ली है। दोनों को दुख होता है, लेकिन किसी तरह खुद को संभालते हैं।

इसके कुछ दिन बाद दोनों को पता चलता है कि उनके छोटा बेटा कश्मीर में शहीद हो गया। भाई की मृत्यु पर अमेरिका वाला बेटा भी आता है, लेकिन यह कहकर वापस चला जाता है कि वह अब अमेरिका में ही रहेगा। यह जानकार दंपति को आघात लगता है और वह इस गम में कुछ समय बाद चल बसते हैं।

कलाकारों ने किया निराश
नाटक की कहानी इससे पहले कई नाटक और फिल्मों में दर्शायी जा चुकी है। इसलिए दर्शकों को कहानी से कोई खास उम्मीद नहीं थी। लेकिन, कलाकारों के अभिनय ने और भी निराश किया। हालांकि नाटक बुढ़ापे पर आधारित था तो थोड़ा धीमी गति से चलता है, लेकिन दमदार अभिनय की कमी ने इसको और निरस बनाया।


नाटक में लांग एक्ट थे जो इसकी नीरसता का एक और कारण बने। नाटक में सिर्फ एक ही फेड आउट देखने को मिला। नाटक में नौकर की एंट्री का साउंड भी मनमाना लगा। नाटक देखने के लिए हॉल में आधी सीटें भी मुश्किल से भरी थी।

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