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Highcourt: मां का बयान नजरअंदाज, 13 साल की किशोरी की बात मान हाईकोर्ट ने दुष्कर्मी की सजा रखी बरकरार

Wed, 29 Nov 2023 03:17 PM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Wed, 29 Nov 2023 03:17 PM IST
सार

जस्टिस सुरेश्वर ठाकुर और जस्टिस कुलदीप तिवारी की खंडपीठ ने सजा के खिलाफ अपील को खारिज करते हुए कहा कि हम पीड़िता की गवाही पर विश्वास करते हैं। याची के खिलाफ लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं यह सब पीड़िता की बेदाग गवाही पर निर्भर है, न कि उसके विपरीत दी गई मां की गवाही पर।

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Punjab-Haryana High Court rejected appeal against conviction of Misdeed convict on basis of victim statement
Punjab And Haryana Highcourt Chandigarh - फोटो : File Photo

विस्तार

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 13 साल की किशोरी से दुष्कर्म के दोषी की सजा के खिलाफ अपील को पीड़िता के बयान को आधार बनाते हुए खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने पीड़िता की मां के बयान को नजरअंदाज करते हुए पीड़िता के बयान में विश्वास दिखाया और याची की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
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याचिका दाखिल करते हुए दोषी ने सोनीपत जिला अदालत द्वारा दोषी करार देने और उम्रकैद की सजा के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याची ने कहा कि इस मामले में पीड़िता की मां का बयान पीड़िता से बिलकुल अलग और विपरीत है। ऐसे में पीड़िता के बयान की अहमियत नहीं रह जाती और वह विश्वास खो देती है। इसके साथ ही मेडिकल रिपोर्ट में भी याची को सीधे तौर पर दोषी नहीं करार दिया गया।
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पीड़िता की गवाही बेदाग

जस्टिस सुरेश्वर ठाकुर और जस्टिस कुलदीप तिवारी की खंडपीठ ने सजा के खिलाफ अपील को खारिज करते हुए कहा कि हम पीड़िता की गवाही पर विश्वास करते हैं। याची के खिलाफ लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं यह सब पीड़िता की बेदाग गवाही पर निर्भर है, न कि उसके विपरीत दी गई मां की गवाही पर। जब पीड़िता ने खुद गवाही देकर पूरी घटना का विवरण दे दिया है तो उसकी मां की उसके खिलाफ दी गई गवाही महत्वहीन हो जाती है।


एफआईआर के अनुसार 13 वर्षीय किशोरी ने बीमार पड़ने और उल्टी शुरू करने के बाद अपने माता-पिता को घटना के बारे में सूचित किया था। जांच की गई और सामने आया कि पीड़िता सात सप्ताह की गर्भवती थी। चिकित्सा साक्ष्य की जांच के बाद आरोप पत्र दायर किया गया। याची पर पॉक्सो एक्ट में एफआईआर दर्ज की गई थी। याची ने दलील दी कि उसे फंसाया जा रहा है क्योंकि पीड़िता और उसकी मां ने विरोधाभासी बयान दिए थे। ऐसे में पीड़िता की गवाही की विश्वसनीयता खत्म हो गई। 

डॉक्टर की गवाही पर भी गौर
हाईकोर्ट ने डॉक्टर की गवाही पर भी गौर किया, जिसने पीड़िता की जांच की थी और कहा था कि उसे सात सप्ताह के जीवित भ्रूण के साथ भर्ती कराया गया था। इसका विरोध करते हुए याची ने कहा था कि डीएनए रिपोर्ट अनिर्णायक थी और ऐसे में उसे दोषमुक्त करार दिया जाए। हाईकोर्ट ने याची की सभी दलीलों को रद्द करते हुए उसकी अपील को खारिज कर दिया।
 
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