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ऑर्गन ट्रांसप्लांट के लिए नीति बनाने की मांग, पंजाब-हरियाणा और यूटी को नोटिस
ब्यूरो/अमर उजाला/चंडीगढ़
Updated Tue, 04 Oct 2016 09:57 PM IST
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कोर्ट
- फोटो : डेमो फोटो
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भारत में अंगदान और अंग प्रत्यर्पण को लेकर आज तक कोई स्पष्ट एवं ठोस नीति नहीं बनने के कारण देशभर में अंग प्रत्यर्पण के जरूरतमंद मरीजों को समय पर अंग नहीं मिल पाते। कहीं-कहीं तो अंगों के इंतजार में मरीजों की मौत भी हो जाती है।
देश भर में मौजूदा हालत ऐसे हैं कि जरूरतमंद मरीजों को सालों-साल अंग नहीं मिल पाते। इस मुद्दे को लेकर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका पर मंगलवार को जस्टिस एसएस सारों और जस्टिस लीजा गिल की खंडपीठ ने केंद्र सहित पंजाब व हरियाणा सरकार, चंडीगढ़ प्रशासन और पीजीआई चंडीगढ़ को 17 नवंबर के लिए नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
एडवोकेट रंजन लखनपाल की ओर से दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि देश में अधिकांश जरूरतमंद मरीजों को समय पर अंग प्राप्त ही नहीं हो पा रहे। कभी-कभी ब्लड ग्रुप मेल नहीं खाता तो कभी डोनर नहीं मिल पाते। कभी पैसों की कमी के कारण मरीजों को अंग नहीं मिलते।
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याचिका में कहा गया कि ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि सरकार के पास ऑर्गन ट्रांसप्लांट व अंग दान से संबंधित कोई स्पष्ट नीति नहीं है। याचिका में कहा गया है कि सरकार ने ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं बनाई, जिससे जरूरतमंद मरीज को समय पर डोनर और अन्य सुविधाएं सकें।
याचिकाकर्ता ने तमिलनाडु और गुजरात राज्य का उदाहरण देते हुए हाईकोर्ट को बताया कि इन राज्यों में ऑर्गन ट्रांसप्लांट के मामले में एक बेहतर व्यवस्था तैयार कर ली है। याचिका में बताया गया कि तमिलनाडु में किसी भी मरीज को अधिकतम तीन महीनों तक अंग प्रत्यर्पण के लिए इंतजार करना पड़ता है।
वहां ऐसी व्यवस्था बना ली गई है कि सरकारी व निजी अस्पतालों में तालमेल बनाया गया है। डोनर की एक लिस्ट तैयार की गई है ताकि जब भी किसी अंग की जरूरत हो तो डोनर उपलब्ध रहें। वहां डोनर को लाने वाली एंबुलेंस के लिए सेफ पैसेज बनाया गया है ताकि उसे जल्द से जल्द जरूरतमंद मरीज के पास पहुंचाया जा सके।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट ने मांग की गई है कि इस मामले में केंद्र सरकार को ठोस नीति बनाने के लिए कहा जाए और ऑर्गन ट्रांसप्लांट की सुविधा वाले सभी अस्पतालों में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए। इसके साथ ही अंग दाताओं की लिस्ट तैयार की जाए, जिसे अंग प्रत्यर्पण करने वाले सभी अस्पताल आपस में साझा कर सकें। याचिका में यह सुझाव भी दिया गया कि ऐसे मरीज जिन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया है, उनके परिजनों को काउंसिल उपलब्ध करवाकर ऐसे मरीज के अंग दान के लिए प्रेरित किया जाए।
हर साल देश में डेढ़ लाख किडनी की जरूरत
याचिका में बताया गया है कि भारत में इस समय प्रति वर्ष डेढ़ लाख से अधिक लोगों को किडनी की जरूरत पड़ती है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था के चलते महज पांच हजार किडनी ही उपलब्ध हो पाती हैं। वहीं, लीवर के मामले में देश में साल भर में एक हजार ऑपरेशन ही हो पाते हैं, जबकि जरूरत एक लाख से अधिक की है। फेफड़ों के मामले में भी साल भर में 20 हजार ऑपरेशन के मुकाबले केवल 37 ऑपेरेशन ही हो रहे हैं। हार्ट ट्रांसप्लांट को लेकर भी साल भर पचास हजार से अधिक मरीजों में से केवल 10 हजार मरीजों को अंग दान का लाभ मिल पाता है।
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देश भर में मौजूदा हालत ऐसे हैं कि जरूरतमंद मरीजों को सालों-साल अंग नहीं मिल पाते। इस मुद्दे को लेकर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका पर मंगलवार को जस्टिस एसएस सारों और जस्टिस लीजा गिल की खंडपीठ ने केंद्र सहित पंजाब व हरियाणा सरकार, चंडीगढ़ प्रशासन और पीजीआई चंडीगढ़ को 17 नवंबर के लिए नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
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एडवोकेट रंजन लखनपाल की ओर से दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि देश में अधिकांश जरूरतमंद मरीजों को समय पर अंग प्राप्त ही नहीं हो पा रहे। कभी-कभी ब्लड ग्रुप मेल नहीं खाता तो कभी डोनर नहीं मिल पाते। कभी पैसों की कमी के कारण मरीजों को अंग नहीं मिलते।
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याचिका में कहा गया कि ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि सरकार के पास ऑर्गन ट्रांसप्लांट व अंग दान से संबंधित कोई स्पष्ट नीति नहीं है। याचिका में कहा गया है कि सरकार ने ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं बनाई, जिससे जरूरतमंद मरीज को समय पर डोनर और अन्य सुविधाएं सकें।
याचिकाकर्ता ने तमिलनाडु और गुजरात राज्य का उदाहरण देते हुए हाईकोर्ट को बताया कि इन राज्यों में ऑर्गन ट्रांसप्लांट के मामले में एक बेहतर व्यवस्था तैयार कर ली है। याचिका में बताया गया कि तमिलनाडु में किसी भी मरीज को अधिकतम तीन महीनों तक अंग प्रत्यर्पण के लिए इंतजार करना पड़ता है।
वहां ऐसी व्यवस्था बना ली गई है कि सरकारी व निजी अस्पतालों में तालमेल बनाया गया है। डोनर की एक लिस्ट तैयार की गई है ताकि जब भी किसी अंग की जरूरत हो तो डोनर उपलब्ध रहें। वहां डोनर को लाने वाली एंबुलेंस के लिए सेफ पैसेज बनाया गया है ताकि उसे जल्द से जल्द जरूरतमंद मरीज के पास पहुंचाया जा सके।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट ने मांग की गई है कि इस मामले में केंद्र सरकार को ठोस नीति बनाने के लिए कहा जाए और ऑर्गन ट्रांसप्लांट की सुविधा वाले सभी अस्पतालों में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए। इसके साथ ही अंग दाताओं की लिस्ट तैयार की जाए, जिसे अंग प्रत्यर्पण करने वाले सभी अस्पताल आपस में साझा कर सकें। याचिका में यह सुझाव भी दिया गया कि ऐसे मरीज जिन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया है, उनके परिजनों को काउंसिल उपलब्ध करवाकर ऐसे मरीज के अंग दान के लिए प्रेरित किया जाए।
हर साल देश में डेढ़ लाख किडनी की जरूरत
याचिका में बताया गया है कि भारत में इस समय प्रति वर्ष डेढ़ लाख से अधिक लोगों को किडनी की जरूरत पड़ती है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था के चलते महज पांच हजार किडनी ही उपलब्ध हो पाती हैं। वहीं, लीवर के मामले में देश में साल भर में एक हजार ऑपरेशन ही हो पाते हैं, जबकि जरूरत एक लाख से अधिक की है। फेफड़ों के मामले में भी साल भर में 20 हजार ऑपरेशन के मुकाबले केवल 37 ऑपेरेशन ही हो रहे हैं। हार्ट ट्रांसप्लांट को लेकर भी साल भर पचास हजार से अधिक मरीजों में से केवल 10 हजार मरीजों को अंग दान का लाभ मिल पाता है।