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पंजाब में सरकारी कामकाज की खुली पोल, 'अफसर पॉलिसी बनाते रहे और मंत्री देते रहे मंजूरी'
Thu, 14 May 2020 12:08 PM IST
खुशबू गोयल
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 14 May 2020 12:08 PM IST
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कैप्टन अमरिंदर सिंह
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एक्साइज पॉलिसी को लेकर पंजाब के मुख्य सचिव और मंत्रियों के बीच छिड़ी जंग में सरकार कामकाज की पोल खुल गई है। भले ही मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बुधवार को डैमेज कंट्रोल करते हुए पॉलिसी संबंधी कई नीतियों का एलान कर दिया, लेकिन यह साफ हो गया है कि राज्य में पॉलिसियां बनाने का काम अफसरशाही कर रही है और सरकार के मंत्री उन पर आंख मूंदकर मुहर लगाते रहे हैं।
जैसा कि विपक्ष का आरोप है कि इस बार मामला शराब की बिक्री का था, जिससे अफसरों और कई सियासतदानों के हित जुड़े हैं, झगड़े का रूप ले गया। इस आरोपों को इसलिए भी बल मिला है क्योंकि राज्य सरकार एक्साइज पॉलिसी के मामले में साल-दर-साल घाटा झेल रही है। तीन सालों के दौरान शराब की बिक्री से राजस्व प्रापित को जो भी लक्ष्य निर्धारित किए गए, उनमें से एक भी पूरा नहीं हो सका। दूसरी ओर, राज्य में न तो शराब की बिक्री कम हुई और न ही पड़ोसी राज्यों से शराब की तस्करी।
आंकड़ों के अनुसार पंजाब सरकार को मार्च, 2017 में शराब की बिक्री से 4406 करोड़ की आमदनी हुई, जबकि लक्ष्य 5135 करोड़ रुपये हासिल करने का था। इसके बाद, मार्च, 2018 में 5422 करोड़ रुपये के निर्धारित लक्ष्य से आमदन मात्र 5135 करोड़ रुपये पर ठहर गई। बीते साल भी एक्साइज पॉलिसी के तहत राजस्व प्राप्ति का लक्ष्य 6000 करोड़ निर्धारित किया गया था लेकिन सरकार को आमदनी हुई केवल 5072 करोड़ रुपये की।
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जैसा कि विपक्ष का आरोप है कि इस बार मामला शराब की बिक्री का था, जिससे अफसरों और कई सियासतदानों के हित जुड़े हैं, झगड़े का रूप ले गया। इस आरोपों को इसलिए भी बल मिला है क्योंकि राज्य सरकार एक्साइज पॉलिसी के मामले में साल-दर-साल घाटा झेल रही है। तीन सालों के दौरान शराब की बिक्री से राजस्व प्रापित को जो भी लक्ष्य निर्धारित किए गए, उनमें से एक भी पूरा नहीं हो सका। दूसरी ओर, राज्य में न तो शराब की बिक्री कम हुई और न ही पड़ोसी राज्यों से शराब की तस्करी।
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आंकड़ों के अनुसार पंजाब सरकार को मार्च, 2017 में शराब की बिक्री से 4406 करोड़ की आमदनी हुई, जबकि लक्ष्य 5135 करोड़ रुपये हासिल करने का था। इसके बाद, मार्च, 2018 में 5422 करोड़ रुपये के निर्धारित लक्ष्य से आमदन मात्र 5135 करोड़ रुपये पर ठहर गई। बीते साल भी एक्साइज पॉलिसी के तहत राजस्व प्राप्ति का लक्ष्य 6000 करोड़ निर्धारित किया गया था लेकिन सरकार को आमदनी हुई केवल 5072 करोड़ रुपये की।
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खास बात यह भी है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार के सत्ता संभालने के तुरंत बाद वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने राज्य में शराब की बिक्री सरकार के अधीन लाने के प्रयास शुरू किए थे। इस कड़ी में मंत्रियों की एक टीम को उन राज्यों के दौरे पर भेजा गया, जहां राज्य सरकारें खुद शराब की बिक्री करती हैं। इस टीम की रिपोर्ट के आधार पर वित्त मंत्री ने पश्चिम बंगाल की पॉलिसी अपनाने का एलान भी कर दिया लेकिन कुछ ही दिन में यह ऐलान कहीं गुम हो गया और राज्य सरकार आज तक शराब के कारोबार पर प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं बना सकी।
वित्त मंत्री के फैसले को किसने और किस आधार पर रोक दिया गया, यह आज तक साफ नहीं हो सका है और सरकार की तरफ से हर साल घाटे का हवाला दिया जाता है। ताजा विवाद ने राज्य में शराब के धंधे को लेकर सरकार के अपनों ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मंत्री जहां अफसरशाही पर उंगली उठा रहे हैं, वहीं अफसर खामोशी साधे अपने काम में जुटे हुए हैं।
सहकारिता मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा और मुख्यमंत्री के सलाहकार विधायक राजा वड़िंग ने ट्वीट कर मुख्यमंत्री से अपील की है कि बीते तीन साल के दौरान एक्साइज विभाग को हुए घाटे के कारणों की जांच कराएं। मुख्यमंत्री की ओर से इस विवाद में अब तक जो भी फैसले लिए गए हैं, उससे साफ है कि वे न तो मंत्रियों को और न ही अफसरों को नाराज करना चाहते हैं। वैसे, मुख्यमंत्री का अफसरों के प्रति लगाव जगजाहिर है क्योंकि तीन साल के दौरान उन्होंने रिटायर होने वाले अपने हर आला अफसर को तुरंत कोई न कोई पद देकर अपने साथ बनाए रखा है।
वित्त मंत्री के फैसले को किसने और किस आधार पर रोक दिया गया, यह आज तक साफ नहीं हो सका है और सरकार की तरफ से हर साल घाटे का हवाला दिया जाता है। ताजा विवाद ने राज्य में शराब के धंधे को लेकर सरकार के अपनों ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मंत्री जहां अफसरशाही पर उंगली उठा रहे हैं, वहीं अफसर खामोशी साधे अपने काम में जुटे हुए हैं।
सहकारिता मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा और मुख्यमंत्री के सलाहकार विधायक राजा वड़िंग ने ट्वीट कर मुख्यमंत्री से अपील की है कि बीते तीन साल के दौरान एक्साइज विभाग को हुए घाटे के कारणों की जांच कराएं। मुख्यमंत्री की ओर से इस विवाद में अब तक जो भी फैसले लिए गए हैं, उससे साफ है कि वे न तो मंत्रियों को और न ही अफसरों को नाराज करना चाहते हैं। वैसे, मुख्यमंत्री का अफसरों के प्रति लगाव जगजाहिर है क्योंकि तीन साल के दौरान उन्होंने रिटायर होने वाले अपने हर आला अफसर को तुरंत कोई न कोई पद देकर अपने साथ बनाए रखा है।