{"_id":"5f8ed089fa69bb3aa5657ec8","slug":"punjab-cm-captain-amarinder-singh-and-other-mlas-arrive-at-raj-bhavan-to-meet-governor-vp-singh-badnore","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"विपक्ष के नेताओं संग राज्यपाल से मिलने पहुंचे अमरिंदर सिंह, कृषि कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव सौंपा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
विपक्ष के नेताओं संग राज्यपाल से मिलने पहुंचे अमरिंदर सिंह, कृषि कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव सौंपा
Tue, 20 Oct 2020 05:36 PM IST
ajay kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: ajay kumar
Updated Tue, 20 Oct 2020 05:36 PM IST
विज्ञापन
Punjab
- फोटो : ANI
पंजाब सरकार ने कृषि कानूनों के खिलाफ पारित किए विधेयक मंगलवार को ही राज्यपाल को सौंप दिए। कानूनी विशेषज्ञों की राय है कि राज्यपाल केंद्र सरकार के खिलाफ जाकर इन विधेयकों पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। अगर पंजाब सरकार इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाती है तो इससे राज्य और केंद्र के बीच टकराव हो सकता है।
विज्ञापन
बार एसोसिएशन के सचिव एडवोकेट रंजीवन सिंह ने कहा कि इस मामले में राज्य सरकार ने अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई है। इसके पीछे सूबे के राजनीतिक दलों का राजनीतिक उद्देश्य भी दिखाई देता है, लेकिन इन विधेयकों पर राज्यपाल की मुहर लगना मुश्किल ही है। इसके अलावा राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट तो जा सकती है, लेकिन वहां केंद्र सरकार की ओर से राज्य के फैसले पर संविधान के स्तर पर सवाल उठाए जा सकते हैं। इसमें केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव हो सकता है।
विज्ञापन
भारतीय संविधान के मुताबिक केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए कानूनों को राज्य सरकारें सीधे तौर पर रद्द नहीं कर सकतीं। हालांकि राज्य सरकार संबंधित कानून पर असहमति जताते हुए उसके खिलाफ प्रस्ताव पारित कर राज्यपाल को भेज सकती है। इस पर अंतिम फैसला लेने के लिए राज्यपाल कानूनी राय के लिए इसे रोक सकते हैं या सीधे केंद्र सरकार को फैसला लेने के लिए भेज सकते हैं या इसे राज्य सरकार को लौटा सकते हैं। इस पर राज्य सरकार फिर से सदन में कुछ संशोधन करवाकर या बिना संशोधन के ही फिर से राज्यपाल के पास भेज सकती है।
विज्ञापन
राष्ट्रपति से 2-5 नवंबर के बीच का समय मांगा
बड़े स्तर पर शक्ति प्रदर्शन करते हुए मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह मंगलवार को पंजाब कांग्रेस के अन्य नेताओं के अलावा आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के नेताओं को साथ लेकर की प्रदेश के राज्यपाल से मिले। मुखयमंत्री विधानसभा में केंद्र के तीनों कृषि कानूनों को रद करने के बाद उनकी प्रतियां लेकर राजभवन पहुंचे थे।
उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि राज्यपाल अवश्य ही राज्य की आवाज़ सुनेंगे। इसके साथ ही उन्होेंने यह भी साफ कर दिया कि यदि किसानों और कृषि को बचाने के लिए विधानसभा में पास किए गए संशोधन बिलों पर राज्यपाल वीपी सिंह बदनौर की तरफ से हस्ताक्षर नहीं किये जाते तो उनकी सरकार कानूनी हल करने के लिए भी पूरी तरह तैयार है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने भारत के राष्ट्रपति से 2-5 नवंबर के बीच का समय मांगा है और पंजाब के सभी विधायक मिलकर राष्ट्रपति के पास जाएंगे ताकि राज्य के हित में उनका दख़ल मांगा जा सके। उन्होंने आगे कहा कि उन्हें नहीं लगता कि केंद्र सरकार द्वारा पंजाब की आवाज़ को अनदेखा किया जा सकता है और उनको उम्मीद है कि केंद्र सरकार को यह एहसास होगा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) ख़त्म करने से किसानी भी ख़ात्मे की कगार पर पहुँच जाएगी।
सभी पार्टियों की तरफ से प्रस्ताव और बिलों को समर्थन देने के लिए धन्यवाद प्रकट करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि देश भर के किसानों को यह संदेश पहुंचेगा कि काले खेती कानूनों के ख़िलाफ़ पंजाब पूरी तरह एकजुट है। मुख्यमंत्री, राज्यपाल वीपी सिंह बदनौर को प्रस्तावों और प्रांतीय बिलों, जो विधानसभा द्वारा पहले ही सर्वसम्मति से पास किये गए थे, की कापियां सौंपने के बाद पंजाब राज भवन के बाहर पत्रकारों के साथ बातचीत कर रहे थे। राज्यपाल के साथ 20 मिनट तक चली मीटिंग में मुख्यमंत्री के साथ पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रधान सुनील जाखड़, विपक्ष के नेता हरपाल सिंह चीमा, शिरोमणि अकाली दल के नेता शरणजीत सिंह ढिल्लों और अन्य विधायक मौजूद थे।
मैं अपना इस्तीफा जेब में ही रखता हूं: कैप्टन
खेती कानूनों को रद्द करने की राज्य सरकार की कोशिशों की प्रतिक्त्रिस्या के तौर पर केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की संभावना बारे कैप्टन ंने कहा, ‘‘इंतजार करके देखते हैं.... हम कदम दर कदम आगे बढ़ेंगे।’’ उन्होंने आगे कहा कि यदि ऐसी नौबत आ गई तो केंद्र सरकार को उनको बख़ार्स्त करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि वह अपना इस्तीफ़ा जेब में ही रखते हैं और स्वेच्छा से इस्तीफ़ा दे देंगे बजाय इसके कि पंजाब और इसके किसानों के हितों के साथ समझौता करें।
उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि राज्यपाल अवश्य ही राज्य की आवाज़ सुनेंगे। इसके साथ ही उन्होेंने यह भी साफ कर दिया कि यदि किसानों और कृषि को बचाने के लिए विधानसभा में पास किए गए संशोधन बिलों पर राज्यपाल वीपी सिंह बदनौर की तरफ से हस्ताक्षर नहीं किये जाते तो उनकी सरकार कानूनी हल करने के लिए भी पूरी तरह तैयार है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने भारत के राष्ट्रपति से 2-5 नवंबर के बीच का समय मांगा है और पंजाब के सभी विधायक मिलकर राष्ट्रपति के पास जाएंगे ताकि राज्य के हित में उनका दख़ल मांगा जा सके। उन्होंने आगे कहा कि उन्हें नहीं लगता कि केंद्र सरकार द्वारा पंजाब की आवाज़ को अनदेखा किया जा सकता है और उनको उम्मीद है कि केंद्र सरकार को यह एहसास होगा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) ख़त्म करने से किसानी भी ख़ात्मे की कगार पर पहुँच जाएगी।
सभी पार्टियों की तरफ से प्रस्ताव और बिलों को समर्थन देने के लिए धन्यवाद प्रकट करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि देश भर के किसानों को यह संदेश पहुंचेगा कि काले खेती कानूनों के ख़िलाफ़ पंजाब पूरी तरह एकजुट है। मुख्यमंत्री, राज्यपाल वीपी सिंह बदनौर को प्रस्तावों और प्रांतीय बिलों, जो विधानसभा द्वारा पहले ही सर्वसम्मति से पास किये गए थे, की कापियां सौंपने के बाद पंजाब राज भवन के बाहर पत्रकारों के साथ बातचीत कर रहे थे। राज्यपाल के साथ 20 मिनट तक चली मीटिंग में मुख्यमंत्री के साथ पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रधान सुनील जाखड़, विपक्ष के नेता हरपाल सिंह चीमा, शिरोमणि अकाली दल के नेता शरणजीत सिंह ढिल्लों और अन्य विधायक मौजूद थे।
मैं अपना इस्तीफा जेब में ही रखता हूं: कैप्टन
खेती कानूनों को रद्द करने की राज्य सरकार की कोशिशों की प्रतिक्त्रिस्या के तौर पर केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की संभावना बारे कैप्टन ंने कहा, ‘‘इंतजार करके देखते हैं.... हम कदम दर कदम आगे बढ़ेंगे।’’ उन्होंने आगे कहा कि यदि ऐसी नौबत आ गई तो केंद्र सरकार को उनको बख़ार्स्त करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि वह अपना इस्तीफ़ा जेब में ही रखते हैं और स्वेच्छा से इस्तीफ़ा दे देंगे बजाय इसके कि पंजाब और इसके किसानों के हितों के साथ समझौता करें।