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बड़े पर्दे पर दिखा पंजाब के काले दौर 1984 का सच

Sun, 29 Jun 2014 06:06 PM IST
श्ांकर सिंह/अमर उजाला, चंडीगढ़
श्ांकर सिंह/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 29 Jun 2014 06:06 PM IST
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punjab 1984: a review of punjabi movie

निर्देशक अनुराग सिंह ने ‘पंजाब 1984’ जैसे गंभीर मुद्दे को लेकर फिल्म बनाकर एक बार फिर 1984 के दर्द को बयां करने की कोशिश की है। शुक्रवार को ‘पंजाब 1984’ बड़े पर्दे पर रिलीज हुई। किरण खेर के अनुभव और अच्छे अभिनय की बदौलत इस फिल्म से एक आशा बांधी है कि पंजाबी सिनेमा में अच्छी फिल्मों का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है।

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फिल्म की कहानी में एक मां सुखवंत कौर (किरण खेर) है जो रोज अपने गांव के थाने के बाहर बैठती है। थाने का इंस्पेक्टर दीप सिंह राणा (पवन मल्होत्रा) अकसर उसे वहां से भागने को कहता है।
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दरअसल सुखवंत कौर के बेटे को पुलिस वाले एक दिन बिना वजह उठा ले जाते हैं और उसे वापस नहीं छोड़ते। सुखवंत अपनी अर्ज लिए अपने बेटे के दोस्त (वंश भारद्वाज) के साथ एक एनजीओ से संपर्क करती है। एनजीओ में जाकर सुखवंत अपने बेटे से जुड़ी पूरी जानकारी देती है और ऐसे एंट्री होती है स्क्रीन पर शिवजीत सिंह (दलजीत दोसांझ) की।

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कहानी तब एक नया मोड़ ले लेती जब...

punjab 1984: a review of punjabi movie

सुखवंत का हंसता खेलता परिवार है, जिसमें शिवजीत के अलावा उसका पति (जीएस चन्नी) है। शिवजीत के पड़ोस में सोनम रहती है। दलजीत अकसर कालेज जाते वक्त सोनम से मिलता है। दोनों में प्यार भी है, लेकिन कहानी तब एक नया मोड़ ले लेती जब शिवजीत के पिता अमृतसर के दरबार साहिब में माथा टेकने जाते है, लेकिन लौट नहीं पाते।

बाद में पता चलता है कि वहां फायरिंग में उनकी मौत हो गई। शिवजीत दुख में कालेज छोड़ देता है और घर से जुड़े काम करने लगता है। शिवजीत का गांव के ही जगदेव सिंह के साथ एक जमीन को लेकर झगड़ है। इसी झगड़े का फायदा उठा कर जगदेव इंस्पेक्टर राणा को पैसे खिलाकर शिवजीत को लोकअप में बंद करा देता है।

इंस्पेक्टर राणा शिवजीत का कुछ और कैदियों के साथ झुठा एनकाउंटर करने की कोशिश करता है लेकिन शिवजीत बाकी कैदियों के साथ जिसमें तारी (राणा रणबीर) भी है वहां से भाग जाता है। इसके बाद शिवजीत गुरदेव सिंह नाम के एक व्यक्ति से मिलता है जो उसे अपने ग्रुप के साथ जोड़ कर उसे बदला लेने के लिए प्रेरित करता है।

किरण की वजह से फिल्म में दिलचस्पी बढ़ती है

punjab 1984: a review of punjabi movie

कहानी आगे बढ़ती है और शिवजीत को लगता है कि वह एक गलत रास्ते में पड़ गया है जहां उसे निर्दोष लोगों को भी मारने की जिम्मेदारी मिली है। धीरे धीरे कहानी में नए मोड़ आते हैं जब शिवजीत को लगता है कि उसे कुछ नेता लोग अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने लगते है तो शिवजीत एक फिल्मी हीरो की तरह सबकुछ खत्म कर वापिस अपने गांव आता है और बदला लेता है।

फिल्म के पहले हाफ में किरण अपने दर्द को लेकर ज्यादातर स्क्रीन पर रही। किरण की वजह से फिल्म में दिलचस्पी बढ़ती है। इसके अलावा पवन मल्होत्रा पहले हाफ में एक क्रूर पुलिस वाले के किरदार में उमदा नजर आए हालांकि उनकी पंजाबी उतनी अच्छी नहीं लगी जितना की उनके चेहरे पर भाव।

सोनम बाजवा एक अच्छी अभिनेत्री के रूप में उभर के सामने आई हैं। सोनम राणा रणबीर को कम समय मिला, लेकिन एक्टिंग में पुराना चेहरा होने के कारण वह ध्यान खींचते हैं। कुल मिलाकर पंजाब 1984 फिल्म देखी जा सकती है।

फिल्म का मजबूत और कमजोर हिस्सा

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फिल्म में बहुत कुछ अच्छा है जैसे कि वर्ष 1984 के मुताबिक फिल्म का सेट जिसमें घर से लेकर अन्य दृश्यों को बखूबी निर्देशित किया है। किरण खेर और पवन मल्होत्रा का अभिनय बेहतरीन है। फिल्म की एडिटिंग भी शानदार है हालांकि गाने थोड़े ज्यादा है लेकिन फिल्म के अनुसार है।

फिल्म के गाने तेरा रांझा तां हीरे रंगरूट हो गया और पग दे रंग दी चुनी पहले से ही हीट हैं और गाना स्वाह बनके बहुत ही खूबसूरती से लिख गया है। अनुराग ने फिल्म में मंझे हुए कलाकार लिए है जो जिन्होंने अपने किरदारों के साथ पूरी तरह से न्याय किया है।  

कमजोर हिस्सा
बेशक फिल्म 1984 के दंगों को लेकर है लेकिन इसे किसी खास कहानी को लेकर नहीं फिल्माया गया। फिल्म पूरी तरह से फिक्शन है जिसमें 1984 के दौरान राजनीति से लेकर युवाओं का आक्रोश पेश किया गया। फिल्म का एंड मनमाना लगा जिस से लग रहा था कि निर्देशक ने इसे बहुत फिल्मी टच देकर खत्म कर दिया। फिल्म के अंतिम दृश्यों में पवन मल्होत्रा एक डायलॉग बोलते है जिससे लगता है कि निर्देशक ने जान बूझकर उनके भाग मिल्खा भाग के डायलॉग को भूनाने की कोशिश की है।

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