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282 सैनिकों के अवशेषों पर बड़ा खुलासा, प्रो. सहरावत बताएंगे 1857 की क्रांति का सच, पेश करेंगे रिसर्च
Thu, 30 Jan 2020 12:48 PM IST
पंचकुला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
Published by: पंचकुला ब्यूरो
Updated Thu, 30 Jan 2020 12:48 PM IST
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प्रोफेसर जेएस सहरावत
- फोटो : अमर उजाला
अमृतसर के अजनाला में एक कुएं में मिले 282 सैनिकों के अवशेषों के रिसर्च में बड़ा खुलासा हुआ है। पीयू के एंथ्रोपोलॉजी विभाग के प्रोफेसर जेएस सहरावत ने रिसर्च में साफ कर दिया कि ये अवशेष 1947 के हिंदू-मुस्लिम दंगों में मारे गए लोगों के नहीं हैं बल्कि ये 1857 की क्रांति में मारे गए लोगों के ही अवशेष हैं। यह हंगरी प्रयोगशाला से रेडियो कार्बन डेटिंग विधि से करवाई गई जांच में साबित हुआ है। इसके साथ ही अवशेषों के साथ मिले सिक्के और मेडल 1857 से पहले के थे।
तमाम लोगों ने अवशेष मिलने के बाद यह सवाल खड़ा कर दिया था कि यह 1947 के दंगों में मरे लोगों के थे। सैनिकों के लगभग 9000 दांत व हड्डियों पर रिसर्च चल रहा है। इसमें लगभग 300 दांतों के डीएनए आदि कराने के बाद यह भी साबित हुआ है कि मारे गए लोग कई राज्यों के थे। नॉर्थ ईस्ट के भी सैनिक इसमें शामिल रहे हैं। पूर्वी व पश्चिमी यूपी के सैनिक भी इसमें शामिल हैं। उत्तराखंड समेत अन्य राज्यों के सैनिकों के भी होने की आशंका है। उड़ीसा के सैनिक भी इसमें शामिल थे। इनकी उम्र 32 से 53 साल के मध्य रही है।
जर्मनी, कनाडा की प्रयोगशालाओं से कई रिपोर्ट का आना बाकी है। जैसे ही वह रिपोर्ट सामने आएगी तो कई बड़े खुलासे होंगे। साथ ही सैनिकों के अवशेष भी उनके परिजनों तक पहुंचेंगे। इस रिसर्च पर तेजी से काम चल रहा है। इस रिसर्च ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। इंग्लैंड, पुर्तगाल, टोरंटो आदि देशों में कांफ्रेंस में यह बात साझा की गई। अब अमेरिकन एकेडमी ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज के वैज्ञानिकों की बैठक कैलिफोर्निया में होने जा रही है, जहां दुनियाभर के वैज्ञानिकों को बुलाया गया है।
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इस कांफ्रेंस में प्रो. सहरावत पूरे रिसर्च पर प्रकाश डालेंगे। इस रिसर्च के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने पूर्ण यात्रा अनुदान दिया है। यह अनुदान देश के गिने-चुने वैज्ञानिकों को ही मिलता है। यह कांफ्रेंस 17 से 22 फरवरी के बीच होगी। इस दौरान प्रो. सहरावत चार रिसर्च पेपर प्रस्तुत करेंगे।
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तमाम लोगों ने अवशेष मिलने के बाद यह सवाल खड़ा कर दिया था कि यह 1947 के दंगों में मरे लोगों के थे। सैनिकों के लगभग 9000 दांत व हड्डियों पर रिसर्च चल रहा है। इसमें लगभग 300 दांतों के डीएनए आदि कराने के बाद यह भी साबित हुआ है कि मारे गए लोग कई राज्यों के थे। नॉर्थ ईस्ट के भी सैनिक इसमें शामिल रहे हैं। पूर्वी व पश्चिमी यूपी के सैनिक भी इसमें शामिल हैं। उत्तराखंड समेत अन्य राज्यों के सैनिकों के भी होने की आशंका है। उड़ीसा के सैनिक भी इसमें शामिल थे। इनकी उम्र 32 से 53 साल के मध्य रही है।
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जर्मनी, कनाडा की प्रयोगशालाओं से कई रिपोर्ट का आना बाकी है। जैसे ही वह रिपोर्ट सामने आएगी तो कई बड़े खुलासे होंगे। साथ ही सैनिकों के अवशेष भी उनके परिजनों तक पहुंचेंगे। इस रिसर्च पर तेजी से काम चल रहा है। इस रिसर्च ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। इंग्लैंड, पुर्तगाल, टोरंटो आदि देशों में कांफ्रेंस में यह बात साझा की गई। अब अमेरिकन एकेडमी ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज के वैज्ञानिकों की बैठक कैलिफोर्निया में होने जा रही है, जहां दुनियाभर के वैज्ञानिकों को बुलाया गया है।
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इस कांफ्रेंस में प्रो. सहरावत पूरे रिसर्च पर प्रकाश डालेंगे। इस रिसर्च के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने पूर्ण यात्रा अनुदान दिया है। यह अनुदान देश के गिने-चुने वैज्ञानिकों को ही मिलता है। यह कांफ्रेंस 17 से 22 फरवरी के बीच होगी। इस दौरान प्रो. सहरावत चार रिसर्च पेपर प्रस्तुत करेंगे।
इंग्लैंड में मिली कानपुर आलमबेग की खोपड़ी जल्द भारत आएगी
1857 की क्रांति में मारे गए 282 सैनिकों का नेतृत्व कर रहे कानपुर के नायक आलमबेग की खोपड़ी जल्द भारत आएगी। प्रो. जेएस सहरावत ने ब्रिटिश कमिश्नर व ब्रिटिश दूतावास के जरिये वहां की सरकार को चिट्ठी भेजी है। यह खोपड़ी भेजने के लिए वहां के वैज्ञानिक भी तैयार हैं।
यह खोपड़ी आने के बाद प्रो. सहरावत कानपुर जाकर उनके परिजनोें को सौंपेंगे। साथ ही आलमबेग के अंतिम संस्कार की रस्म पूरी की जाएगी और उसके बाद नियमों के तहत खोपड़ी पर रिसर्च चलेगा। मालूम हो कि आलमबेग का सिर रानी विक्टोरिया के सामने तोप से उड़ा दिया गया था। उससे पहले गोली भी मारे जाने की बात सामने आ रही है।
उस दौरान वहां तैनात ब्रिटिश कमिश्नर हेनरी कूपर ने उनका सिर रानी को गिफ्ट किया था, जो इंग्लैंड रानी के साथ ले जाया गया। कुछ समय पहले आलमबेग की खोपड़ी इंग्लैंड के एक होटल में मिली थी। उसमें आलमबेग का पूरा पता भी लिखा था। यह बात प्रो. सहरावत को पता चली तो उन्होंने खोपड़ी लेने की पहल इंग्लैंड सरकार से की है।
यह खोपड़ी आने के बाद प्रो. सहरावत कानपुर जाकर उनके परिजनोें को सौंपेंगे। साथ ही आलमबेग के अंतिम संस्कार की रस्म पूरी की जाएगी और उसके बाद नियमों के तहत खोपड़ी पर रिसर्च चलेगा। मालूम हो कि आलमबेग का सिर रानी विक्टोरिया के सामने तोप से उड़ा दिया गया था। उससे पहले गोली भी मारे जाने की बात सामने आ रही है।
उस दौरान वहां तैनात ब्रिटिश कमिश्नर हेनरी कूपर ने उनका सिर रानी को गिफ्ट किया था, जो इंग्लैंड रानी के साथ ले जाया गया। कुछ समय पहले आलमबेग की खोपड़ी इंग्लैंड के एक होटल में मिली थी। उसमें आलमबेग का पूरा पता भी लिखा था। यह बात प्रो. सहरावत को पता चली तो उन्होंने खोपड़ी लेने की पहल इंग्लैंड सरकार से की है।