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स्मृतिशेष: प्रणब दा चाहते थे ऐसे हों भविष्य के विश्वविद्यालय, भारत बने तकनीक का विश्वगुरु

Mon, 31 Aug 2020 11:28 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सोनीपत (हरियाणा)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सोनीपत (हरियाणा) Published by: ajay kumar Updated Mon, 31 Aug 2020 11:28 PM IST
सार

  • ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में 18 मार्च 2017 को भविष्य के विश्वविद्यालय पर व्याख्यान देने पहुंचे थे प्रणब मुखर्जी
  • शिक्षण संस्थाओं, कारपोरेट जगत व सरकार में तालमेल के साथ ही ग्लोबल प्रतिस्पर्धा में युवाओं को सक्षम रहने की कही थी बात

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Pranab Mukherjee was give his views on the subject of future university in Sonipat on 2017
ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में मंचासीन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी व अन्य - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी हमेशा शिक्षा में शोध को बढ़ावा देने की बात करते थे, जिससे उस शिक्षा को ग्रहण करके ज्यादा से ज्यादा युवा रोजगार के लिए अग्रसर हो सके। प्रणब मुखर्जी चाहते थे कि शिक्षण संस्थाओं, कारपोरेट जगत व सरकार में हमेशा तालमेल रहे, जिसका बड़ा फायदा विद्यार्थियों को मिल सके। इसके साथ ही वह हमेशा युवाओं को ग्लोबल प्रतिस्पर्धा में सक्षम रहने की सीख देते थे, जिससे हमारे देश के युवा दुनिया में कुछ करने में आगे रहे। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने यह सब कुछ सोनीपत में ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में 18 मार्च 2017 को अपने व्याख्यान में कहा था। 

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पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी सोनीपत में ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में पहुंचे थे। जहां उन्होंने भविष्य के विश्वविद्यालय पर अपने विचार रखे थे। उन्होंने कहा था कि प्राचीन समय में शिक्षा की बदौलत भारत पूरी दुनिया में विश्वगुरु था और अन्य देशों के छात्र-छात्राएं शिक्षा लेने के लिए नालंदा व तक्षशिला विश्वविद्यालय में आते थे। समय के साथ ही शिक्षा बदली है और यह तकनीक का युग है। जिसके अनुसार ही विश्वविद्यालयों में शिक्षा देनी जरूरी है। 
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उन्होंने कहा था कि युवाओं को स्किल और गुणवत्तापरक उच्चतर शिक्षा प्रदान कर ग्लोबल प्रतिस्पर्धा में सक्षम बनाने के लिए आगे आना होगा। वह जर्मनी के एकीकरण में अहम योगदान देने वाले चिंतक बिस्मार्क को याद करते हुए कहते थे कि भारत पूरी दुनिया में नेतृत्व करने की क्षमता रखता है। क्योंकि जिस तरह की लोकतांत्रिक प्रणाली यहां है, उसकी बदौलत ही दुनिया के अन्य देश भारत से काफी उम्मीद रखते हैं। 
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उन्होंने देश के बड़े औद्योगिक घरानों से उच्चतर शिक्षण संस्थान खोलने की ओर कदम बढ़ाने की उम्मीद जताई थी। वह हमेशा शिक्षण संस्थाओं को शिक्षा तक ही सीमित नहीं रखकर, बल्कि उनको शोध की ओर बढ़ते हुए देखना चाहते थे और वह इसको अपने व्याख्यान में कहते थे। क्योंकि शोध से ही भविष्य की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। इसके साथ ही वह शिक्षण संस्थाओं में शोध के लिए आधुनिक प्रयोगशालाओं को स्थापित करने पर जोर देने को कहते थे।

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