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किसान आंदोलन: राजनीतिक दलों ने गढ़ाई किसान यूनियन नेताओं पर नजर, बलवीर राजेवाल पर दांव खेल सकती है आप 

Fri, 10 Dec 2021 10:49 AM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Fri, 10 Dec 2021 10:49 AM IST
सार

कृषि कानूनों की वापसी और किसान आंदोलन के स्थगित होने के बाद पंजाब में राजनीतिक दल अब किसान नेताओं की लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश में हैं। वहीं दोनों मुद्दे खत्म होने के कारण अब पंजाब का चुनाव बेअदबी और नशा तस्करी के मुद्दों पर ही लड़ा जाएगा।  

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Political Parties are trying to woo Farmers Leaders in Punjab Assembly Elections
पंजाब विधानसभा चुनाव में किसान यूनियन के नेताओं पर नजर। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।

विस्तार

किसान आंदोलन स्थगित कर दिया गया है। एक साल के मोर्चे के बाद किसान अपने घरों को लौटने की तैयारी में लग गए हैं। 11 दिसंबर से पंजाब के किसान वापसी की राह पर होंगे और उनकी वापसी पर पंजाब में जश्न का माहौल बनाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। लेकिन इन सबके बीच किसान आंदोलन के असली हीरो यूनियन के प्रधानों को अपनी तरफ खींचने के लिए तमाम राजनीतिक दल नजर लगाकर बैठे हैं। 

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आम आदमी पार्टी के दिग्गज भारतीय किसान यूनियन के प्रधान बलवीर सिंह राजेवाल से संपर्क साध रहे हैं और ऐसी चर्चा जोर पकड़ रही है कि राजेवाल आम आदमी पार्टी की तरफ से पंजाब में सीएम का चेहरा हो सकते हैं। वहीं, कांग्रेस के अलावा अकाली दल व भाजपा ने भी किसान नेताओं की तरफ हाथ बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। इन सबके बीच गुरनाम सिंह चढूनी ने तो पंजाब में चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। निश्चित तौर पर किसान आंदोलन खत्म होने के बाद पंजाब में फिजा बदल रही है। किसान आंदोलन का स्थगित होना भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार के लिए बड़ी राहत की बात है।
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किसान आंदोलन स्थगित होने के बाद अब भाजपा की चुनावों पर पकड़ मजबूत होगी। इसके लिए उनकी टीम पहले से तैयार बैठी है और 13 दिसंबर के बाद से भाजपा के दिग्गज मैदान में आकर रैलियों व मीटिंगों को संबोधित करने लगेंगे। अभी तक किसानों द्वारा उनका लगातार घेराव किया जा रहा था। वहीं, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह इसका पूरा फायदा लेने की फिराक में हैं। उनके निकटवर्ती नेताओं का कहना है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ही किसानों की पीठ पर हाथ रखा, जिस कारण किसान दिल्ली बॉर्डर पर जाकर डट गए।  
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पंजाब में अभी तक तीनों कृषि कानून और किसान आंदोलन मुख्य चुनावी मुद्दा थे। किसानी आंदोलन के बीच पंजाब में विकास, महंगाई, बेरोजगारी, नशाखोरी, श्री गुरुग्रंथ साहब की बेअदबी जैसे मुद्दे छोटे पड़ गए थे, लेकिन किसानों द्वारा आंदोलन स्थगित होने से अब दोबारा पंजाब में बेअदबी व ड्रग बड़ा मुद्दा बन सकते हैं। तीनों कृषि कानून के विरोध में जहां शिरोमणि अकाली दल ने भाजपा के साथ संबंध तोड़ लिए वहीं उसे बसपा के साथ हाथ मिलाने के लिए मजबूर होना पड़ा। 

अकाली दल अब किसानों के अपने पारंपरिक गढ़ में खोई हुई राजनीतिक जमीन को तलाश रहा है। अकाली दल को बेशक बसपा का साथ मिल गया है लेकिन शहरों में उसको वोट कैसे हासिल करना है, किसानी गढ़ में वापस जाकर कैसे अपने आपको मजबूत करना है, इसके लिए नेतृत्व मंथन कर रहा है। कई किसान नेताओं को पार्टी में लाने की कवायद भी शुरू हो चुकी है। 

पंजाब में राजनीति के नए युग की नींव पड़ेगी 

पंजाब में किसान यूनियन में डॉ. दर्शन पाल, बलवीर सिंह राजेवाल, जोगिंदर सिंह उगराहां मुख्य चेहरा रहे हैं। किसानों की जीत पंजाब में राजनीति के एक नए युग की नींव रखेगी। पंजाब की आर्थिक स्थिति खेतीबाड़ी पर आधारित है। खेती होती है तो उससे न केवल बाजार चलता है, बल्कि ज्यादातर इंडस्ट्रीज भी ट्रैक्टर से लेकर खेतीबाड़ी का सामान बनाती हैं। पंजाब में 75 फीसदी लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर खेती से जुड़े हैं।

प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोगों की बात करें तो इसमें किसान, उनके खेतों में काम करने वाले मजदूर, उनसे फसल खरीदने वाले आढ़ती और खाद-कीटनाशक के व्यापारी शामिल हैं। खेती के जरिए यह सभी लोग एक-दूसरे से सीधे जुड़े हुए हैं। इनके साथ ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री भी जुड़ जाती है। आढ़तियों से फसल खरीदकर आगे सप्लाई करने वाले ट्रेडर्स और एजेंसियां भी खेती से ही जुड़ी हुई हैं। अगले फेज में शहर से लेकर गांव के दुकानदार भी किसानों से ही जुड़े हैं। फसल अच्छी होती है, तो फिर किसान खर्च भी करता है। इसके जरिए कई छोटे कारोबार भी चलते रहते हैं।

इसमें कोई शंका ही नहीं कि पंजाब के किसानों ने एक साल डटकर मोर्चा लगाया है। किसान नेताओं की मजबूती साफ दिखाई दे रही है, कुछ किसान नेता राजनीति में प्रवेश कर सकते हैं और यह पंजाब के लिए एक नई राजनीति की शुरुआत भी होगी। पार्टी आंदोलन से निकले लोकप्रिय किसान नेताओं को पार्टी में लाने का प्रयास तमाम राजनीतिक पार्टियां करेंगी।  - डॉ. लखविंदर जौहल, प्रसिद्ध साहित्यकार  

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