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एफआईआर में जाति लिखने पर जनहित याचिका, सोमवार को सुनवाई

Sun, 19 Feb 2017 01:06 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 19 Feb 2017 01:06 AM IST
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PIL in punjab and highcourt, hearing on monday
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : File Photo
हमारा संविधान जातिवाद मुक्त तथा सभी धर्मों को बराबर का दर्जा देने वाला है फिर एफआईआर में अपराधी और पीड़ित की जाति क्यों दर्ज की जाती है। यह अहम मुद्दा उठाते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट एचसी अरोड़ा ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की है। इस याचिका पर सोमवार को सुनवाई होगी।
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याचिका दाखिल करते हुए अरोड़ा ने कहा कि हमारे संविधान में जाति विहीन समाज का ध्येय रखा गया है तथा धर्म निरपेक्ष राज्य की धारणा है। जब भी कोई अपराध होता है और उसके लिए एफआईआर दर्ज की जाती है तो पीड़ित और आरोपी की जाति दर्ज की जाती है। यह सीधे तौर पर मानवीयता के खिलाफ है क्योंकि अपराधी का कोई धर्म नहीं होता और न ही उसकी कोई जाति होती है वह केवल अपराधी होता है। उसकी जाति और धर्म भी अपराधी होता है।
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आरोपी व शिकायतकर्ता की पहचान पंडित, नाई, सिख, मुस्लिम के स्थान पर अलग माध्यमों और तरीके से भी दर्ज की जा सकती है जैसे पिता के साथ दादा का नाम, गली, वार्ड आदि। इस प्रकार जाति धर्म को अंकित करना गुरुवाणी के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है। गुरुवाणी के शब्द मानस की जात सबे एको पहचान वे याची की दलीलों के समर्थन में हैं। याची ने इस जनहित याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट  से अपील की कि संविधान के मूल ध्येय व पर्याय की रक्षा के लिए एफआईआर में जाति और धर्म को अंकित करने पर रोक लगाई जाए।
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