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अंगदान से जीवनदान देने में पीजीआई कर रहा महान कार्य, चार साल से देश में सर्वोच्च स्थान
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चंडीगढ़। अंगदान से दूसरों को जीवनदान देने वालों में पीजीआई का लगातार देश में सर्वोच्च स्थान बना हुआ है। 2017 से लगातार 2020 तक पीजीआई को अंगदान के लिए देश के सर्वश्रेष्ठ अस्पताल का पुरस्कार प्राप्त हुआ है। इस पुरस्कार के सम्मान को बरकरार रखते हुए पीजीआई ने कोविड के दौरान भी बेहतरीन परिणाम दिए हैं। इस वर्ष भी अंगदान दिवस पर इस क्रम को जारी रखने की पूरी तैयारी की गई है, क्योंकि 2020 से अब तक 42 अंगदान किए जा चुके हैं। पीजीआई प्रशासन इसे अपने टीम की सफलता मान रहा है। पीजीआई प्रशासन के अनुसार बिना सहयोग के मानवता के लिए किया जा रहा यह कार्य पूरा करना संभव नहीं है।
मौत के बाद इन अंगों को कर सकते हैं दान
डॉक्टरों के मुताबिक मौत के बाद अंगदान कर एक व्यक्ति कम से कम आठ लोगों की जान बचा सकता है। ब्रेन डेड घोषित होने के बाद सभी अंग दान किए जा सकते हैं। इसके लिए परिजनों की स्वीकृति अनिवार्य है। ब्रेन डेड मरीज की किडनी, लीवर, फेफड़ा, पैंक्रियाज, छोटी आंत, वॉयस बॉक्स, हाथ, गर्भाश्य, अंडाशय, चेहरा, आंखें, मिडिल ईयर बोन, त्वचा, हड्डी, कार्टिलेज, तंतु, धमनी व शिराएं, कॉर्निया, हार्ट वाल्व, नर्वस, अंगुलियां और अंगूठे दान किए जा सकते हैं।
ये लोग नहीं कर सकते अंगदान
कैंसर, डायबिटीज, एचआईवी से पीड़ित व्यक्ति, सेप्सिस या इन्ट्रावेनस दवाओं का इस्तेमाल करने वाले अंगदान नहीं कर सकते।
जीवित रहते हुए दान किए जाने वाले अंग
यकृत- यकृत (लीवर) में पुनर्निर्माण की क्षमता होती है। यदि यकृत का एक हिस्सा दान कर दिया जाए तो वह फिर से वृद्धि या उसी स्थिति को प्राप्त कर लेता है।
गुर्दा - मनुष्य एक गुर्दे (किडनी) से भी जीवित रह सकता है, इसलिए दूसरे गुर्दे को दान किया जा सकता है।
फेफड़े - फेफड़े के एक भाग को दान किया जा सकता है। यह यकृत के विपरीत हैं, क्योंकि फेफड़ों में पुनर्निर्माण की क्षमता नहीं होती है।
अग्न्याशय - अग्न्याशय का एक भाग दान किया जा सकता है।
आंत- आंत का एक हिस्सा दान किया जा सकता है।
बॉक्स
इनकी दानवीरता सराहनीय, पिता की आंखें दान करने का लिया निर्णय
जीरकपुर निवासी 68 साल के कुलवंत सिंह 30 जनवरी 2021 को सड़क दुर्घटना का शिकार होकर पीजीआई में भर्ती हुए। 3 फरवरी को डॉक्टरों ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया। उनके बड़े बेटे लवजीत सिंह ने तत्काल अपने पिता की आंखें दान करने का निर्णय लिया। उनके पिता से मिली आंखें पीजीआई की प्रतीक्षा सूची में शामिल दो नेत्रहीनों को प्रत्यारोपित की गई जिससे वे फिर से दुनिया देख पा रहे हैं। लवजीत सिंह का कहना है कि अंगदान और नेत्रदान जैसे महादान कर हम अपनों को खोने के बाद भी दुनिया में जीवित रख सकते हैं।
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मेरी अंधेरी दुनिया को रोशन कर गए, वे फरिश्ते से कम नहीं
मैंने एक साल तक अंधेरी दुनिया देखी है। सच कहूं तो जब मेरी नेत्रज्योति चली गई तब इस बात का एहसास हुआ कि नेत्रदान का कितना महत्व है। यह कहना है जालंधर निवासी 43 साल की ज्योति का। पेशे से बतौर अध्यापिका ज्योति ने 2019 में अचानक अपनी आंखों की रोशनी खो दी। एक आंख में परेशानी आने से उन्हें दूसरी आंख से भी देखना बंद हो गया। पीजीआई में संपर्क किया तो कार्निया प्रत्यारोपित करने को कहा गया। पीजीआई रोटो के प्रयास के 5 फरवरी 2020 को कार्निया प्रत्यारोपित की गई।, जिसके बाद से अब फिर से दुनिया देख रही हैं। ज्योति का कहना है कि जिस अजनबी के कारण आज मैं दुनिया देख पा रही हूं वे तो मेरे लिए ईश्वर के समान है। मैं खुद को अंगदान करूं गी ही, साथ छात्र-छात्राओं को भी इसके लिए जागरूक करूंगी।
फोटो
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पीजीआई ने किया जागरूक
अंगदान दिवस की पूर्व संध्या पर पीजीआई में जागरूकता कार्यक्रम किया गया। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग एजुकेशन की छात्राओं ने चित्र, पोस्टर और रंगोली के माध्यम से अंगदान के महत्व को प्रदर्शित करने का प्रयास किया। इस अवसर पर चिकित्सा अधीक्षक व डीन रिसर्च प्रो. एके गुप्ता ने उनके प्रयास की सराहना की। उन्होंने कहा कि पीजीआई रोटो के प्रयास का ही परिणाम है जो कोविड जैसे दौर में भी अंगदान का क्रम निर्बाध जारी रहा। इस अवसर पर बेहतर प्रस्तुति करने वाली छात्राओं को पुरस्कृत भी किया गया।
कोट-
रोटो पीजीआई ने अंगदान को बढ़ावा देने के लिए वास्तव में कड़ी मेहनत की है। अभी देश की एक बड़ी आबादी को इसकी जानकारी ही नहीं है कि किसी अपने को खोने के बाद उसके जिन अंग को जलाकर राख कर दिया जाता है, उसे दान कर जिंदगी-मौत के बीच जूझ रहे व्यक्ति को पुनर्जीवन दिया जा सकता है। मैं कहना चाहता हूं कि हम सभी को अपना ड्राइविंग लाइसेंस डोनर स्टेटस के साथ अपडेट करना चाहिए। अपने परिवार को अपने अंगदान की इच्छा से अवगत कराएं और इस नेक कार्य में योगदान दें।
-डॉ. विपिन कौशल, नोडन अधिकारी रोटो पीजीआई
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मौत के बाद इन अंगों को कर सकते हैं दान
डॉक्टरों के मुताबिक मौत के बाद अंगदान कर एक व्यक्ति कम से कम आठ लोगों की जान बचा सकता है। ब्रेन डेड घोषित होने के बाद सभी अंग दान किए जा सकते हैं। इसके लिए परिजनों की स्वीकृति अनिवार्य है। ब्रेन डेड मरीज की किडनी, लीवर, फेफड़ा, पैंक्रियाज, छोटी आंत, वॉयस बॉक्स, हाथ, गर्भाश्य, अंडाशय, चेहरा, आंखें, मिडिल ईयर बोन, त्वचा, हड्डी, कार्टिलेज, तंतु, धमनी व शिराएं, कॉर्निया, हार्ट वाल्व, नर्वस, अंगुलियां और अंगूठे दान किए जा सकते हैं।
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ये लोग नहीं कर सकते अंगदान
कैंसर, डायबिटीज, एचआईवी से पीड़ित व्यक्ति, सेप्सिस या इन्ट्रावेनस दवाओं का इस्तेमाल करने वाले अंगदान नहीं कर सकते।
जीवित रहते हुए दान किए जाने वाले अंग
यकृत- यकृत (लीवर) में पुनर्निर्माण की क्षमता होती है। यदि यकृत का एक हिस्सा दान कर दिया जाए तो वह फिर से वृद्धि या उसी स्थिति को प्राप्त कर लेता है।
गुर्दा - मनुष्य एक गुर्दे (किडनी) से भी जीवित रह सकता है, इसलिए दूसरे गुर्दे को दान किया जा सकता है।
फेफड़े - फेफड़े के एक भाग को दान किया जा सकता है। यह यकृत के विपरीत हैं, क्योंकि फेफड़ों में पुनर्निर्माण की क्षमता नहीं होती है।
अग्न्याशय - अग्न्याशय का एक भाग दान किया जा सकता है।
आंत- आंत का एक हिस्सा दान किया जा सकता है।
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इनकी दानवीरता सराहनीय, पिता की आंखें दान करने का लिया निर्णय
जीरकपुर निवासी 68 साल के कुलवंत सिंह 30 जनवरी 2021 को सड़क दुर्घटना का शिकार होकर पीजीआई में भर्ती हुए। 3 फरवरी को डॉक्टरों ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया। उनके बड़े बेटे लवजीत सिंह ने तत्काल अपने पिता की आंखें दान करने का निर्णय लिया। उनके पिता से मिली आंखें पीजीआई की प्रतीक्षा सूची में शामिल दो नेत्रहीनों को प्रत्यारोपित की गई जिससे वे फिर से दुनिया देख पा रहे हैं। लवजीत सिंह का कहना है कि अंगदान और नेत्रदान जैसे महादान कर हम अपनों को खोने के बाद भी दुनिया में जीवित रख सकते हैं।
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मेरी अंधेरी दुनिया को रोशन कर गए, वे फरिश्ते से कम नहीं
मैंने एक साल तक अंधेरी दुनिया देखी है। सच कहूं तो जब मेरी नेत्रज्योति चली गई तब इस बात का एहसास हुआ कि नेत्रदान का कितना महत्व है। यह कहना है जालंधर निवासी 43 साल की ज्योति का। पेशे से बतौर अध्यापिका ज्योति ने 2019 में अचानक अपनी आंखों की रोशनी खो दी। एक आंख में परेशानी आने से उन्हें दूसरी आंख से भी देखना बंद हो गया। पीजीआई में संपर्क किया तो कार्निया प्रत्यारोपित करने को कहा गया। पीजीआई रोटो के प्रयास के 5 फरवरी 2020 को कार्निया प्रत्यारोपित की गई।, जिसके बाद से अब फिर से दुनिया देख रही हैं। ज्योति का कहना है कि जिस अजनबी के कारण आज मैं दुनिया देख पा रही हूं वे तो मेरे लिए ईश्वर के समान है। मैं खुद को अंगदान करूं गी ही, साथ छात्र-छात्राओं को भी इसके लिए जागरूक करूंगी।
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पीजीआई ने किया जागरूक
अंगदान दिवस की पूर्व संध्या पर पीजीआई में जागरूकता कार्यक्रम किया गया। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग एजुकेशन की छात्राओं ने चित्र, पोस्टर और रंगोली के माध्यम से अंगदान के महत्व को प्रदर्शित करने का प्रयास किया। इस अवसर पर चिकित्सा अधीक्षक व डीन रिसर्च प्रो. एके गुप्ता ने उनके प्रयास की सराहना की। उन्होंने कहा कि पीजीआई रोटो के प्रयास का ही परिणाम है जो कोविड जैसे दौर में भी अंगदान का क्रम निर्बाध जारी रहा। इस अवसर पर बेहतर प्रस्तुति करने वाली छात्राओं को पुरस्कृत भी किया गया।
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रोटो पीजीआई ने अंगदान को बढ़ावा देने के लिए वास्तव में कड़ी मेहनत की है। अभी देश की एक बड़ी आबादी को इसकी जानकारी ही नहीं है कि किसी अपने को खोने के बाद उसके जिन अंग को जलाकर राख कर दिया जाता है, उसे दान कर जिंदगी-मौत के बीच जूझ रहे व्यक्ति को पुनर्जीवन दिया जा सकता है। मैं कहना चाहता हूं कि हम सभी को अपना ड्राइविंग लाइसेंस डोनर स्टेटस के साथ अपडेट करना चाहिए। अपने परिवार को अपने अंगदान की इच्छा से अवगत कराएं और इस नेक कार्य में योगदान दें।
-डॉ. विपिन कौशल, नोडन अधिकारी रोटो पीजीआई