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Chandigarh: वजन कम करने की सनक कर रही बीमार, PGI मनोरोग विभाग में तेजी से बढ़ रहे एनोरेक्सिया के मरीज
Wed, 19 Jul 2023 03:28 PM IST
निवेदिता वर्मा
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Wed, 19 Jul 2023 03:28 PM IST
सार
पीजीआई की आहार विशेषज्ञ डॉ. रचना श्रीवास्तव का कहना है कि लड़कियों को यह मर्ज ज्यादा होता है। उनकी डाइट चार्ट तैयार करने के साथ ही काउंसलिंग की जाती है। ब्लड टेस्ट और अन्य जांच कराकर उसकी रिपोर्ट दिखाकर पोषण तत्वों की कमी और उसके दुष्प्रभाव के बारे में बताया जाता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : iStock
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विस्तार
फिगर मेंटेन करने के चक्कर में युवा सेहत खराब कर रहे हैं। भूख लगने पर भी खाना नहीं खा रहे हैं। अगर जोर जबरदस्ती से खा भी ले रहे हैं तो मुंह में अंगुली डालकर उल्टी कर रहे हैं। ये स्थिति उनके लिए घातक है। चंडीगढ़ के युवा इस तरह की स्थिति वाले मर्ज के शिकार हो रहे हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार ऐनोरेक्सिया एक मानसिक बीमारी है जो इटिंग डिसऑर्डर से जुड़ी है। इस स्थिति को अगर समय रहते न रोका गया तो मरीज की जान भी जा सकती है।
चंडीगढ़ निवासी 19 वर्षीया स्मिता की लंबाई पांच फुट आठ इंच है लेकिन वजन महज 45 किलो है। उसके माता-पिता उसके शरीर को देखकर बेहद दुखी हैं। कारण उसके चेहरे पर हड्डियां दिखना और पेट-पीठ का एक बराबर होना है। समझाने पर भी स्मिता ठीक से खाना नहीं खाती। कभी उनका मन रखने के लिए खा भी ले तो तत्काल जबरदस्ती उल्टी कर देती है। उसके पड़ोस में रह रहे एक मनोचिकित्सक ने उसकी स्थिति देखकर उसके पिता को बताया कि उनकी बेटी ऐनोरेक्सिया नामक बीमारी से ग्रस्त है। समय गंवाए बिना उसका इलाज कराएं। स्मिता का पिछले तीन महीने से पीजीआई में इलाज चल रहा है।
यह भी पढ़ें: Punjab: पटियाला में मूसलाधार बरसात से गिरी मकान की छत, दो की मौत, जैकब ड्रेन के फ्लड गेट खोले
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वजन बहुत कम होने पर भी खुद को मोटा समझता है मरीज
पीजीआई मनोचिकित्सा विभाग के डॉ. राहुल ने बताया कि ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है। इलाज के दौरान एनोरेक्सिया के मरीजों का ध्यान केंद्रित करते हैं। थेरेपी के माध्यम से उनके व्यवहार में बदलाव लाने का प्रयास किया जाता है। उन्हें ये समझाया जाता है कि उनके लिए भोजन जरूरी है। जिससे मरीजों को भोजन करने की ललक लगे और वह पौष्टिक आहार का सेवन करे। इलाज के दौरान उन्हें कुछ दवाइयां भी दी जाती हैं जिससे मरीज की चिंता व तनाव दूर हो सके। अगर मरीज कुपोषित होता है तो उसकी काउंसलिंग के साथ ही भर्ती कर फिजीशियन की देखरेख में इलाज भी शुरू कराया जाता है।
केस खराब होने पर आते हैं मरीज
पीजीआई की आहार विशेषज्ञ डॉ. रचना श्रीवास्तव का कहना है कि लड़कियों को यह मर्ज ज्यादा होता है। उनकी डाइट चार्ट तैयार करने के साथ ही काउंसलिंग की जाती है। ब्लड टेस्ट और अन्य जांच कराकर उसकी रिपोर्ट दिखाकर पोषण तत्वों की कमी और उसके दुष्प्रभाव के बारे में बताया जाता है। डॉ. रचना का कहना है कि इस बीमारी में सबसे खराब बात यह है कि लोग इसे मानसिक विकार मानते ही नहीं। केस खराब होने के बाद ही विशेषज्ञ के पास आते हैं।
इलाज में इनकी भूमिका अहम
ऐनरोक्सिया से ठीक होने के लिए इटिंग डिसऑर्डर स्पेशलिस्ट, काउंसलर, थैरेपिस्ट, फिजिशियन व आहार विशेषज्ञ की मदद लेने का सुझाव दिया जाता है। इस दौरान मरीज की काउंसलिंग कर उसे वजन बढ़ने के मानसिक डर से उबरने में मदद की जाती है। फिजिशियन बॉडी के आइडियल वेट को प्राप्त करने वहीं न्यूट्रिशनिस्ट संतुलित आहार को प्लान करने में मदद करते हैं।
ये हैं इसके लक्षण
ऐसे मरीजों के सरमैडियन रिदम यानी आत्मा, शरीर और दिमाग के संतुलन की जांच की जाती है क्योंकि ये रिदम खराब हो जाता है। इसका शुरुआती दौर में पता नहीं चलता। खासतौर पर लड़कियां इस मर्ज से ज्यादा ग्रस्त होती हैं। ऐसे मरीजों को फैट इज फाइन को स्वीकार करने की सलाह दी जाती है। इस पर नियंत्रण न होने पर अवसाद, चिड़चिड़ापन और आत्महत्या तक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। - मिनी सिंह, मनोवैज्ञानिक व एडोलेसेंट साइकोलॉजी की विशेषज्ञ
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चंडीगढ़ निवासी 19 वर्षीया स्मिता की लंबाई पांच फुट आठ इंच है लेकिन वजन महज 45 किलो है। उसके माता-पिता उसके शरीर को देखकर बेहद दुखी हैं। कारण उसके चेहरे पर हड्डियां दिखना और पेट-पीठ का एक बराबर होना है। समझाने पर भी स्मिता ठीक से खाना नहीं खाती। कभी उनका मन रखने के लिए खा भी ले तो तत्काल जबरदस्ती उल्टी कर देती है। उसके पड़ोस में रह रहे एक मनोचिकित्सक ने उसकी स्थिति देखकर उसके पिता को बताया कि उनकी बेटी ऐनोरेक्सिया नामक बीमारी से ग्रस्त है। समय गंवाए बिना उसका इलाज कराएं। स्मिता का पिछले तीन महीने से पीजीआई में इलाज चल रहा है।
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यह भी पढ़ें: Punjab: पटियाला में मूसलाधार बरसात से गिरी मकान की छत, दो की मौत, जैकब ड्रेन के फ्लड गेट खोले
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वजन बहुत कम होने पर भी खुद को मोटा समझता है मरीज
पीजीआई मनोचिकित्सा विभाग के डॉ. राहुल ने बताया कि ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है। इलाज के दौरान एनोरेक्सिया के मरीजों का ध्यान केंद्रित करते हैं। थेरेपी के माध्यम से उनके व्यवहार में बदलाव लाने का प्रयास किया जाता है। उन्हें ये समझाया जाता है कि उनके लिए भोजन जरूरी है। जिससे मरीजों को भोजन करने की ललक लगे और वह पौष्टिक आहार का सेवन करे। इलाज के दौरान उन्हें कुछ दवाइयां भी दी जाती हैं जिससे मरीज की चिंता व तनाव दूर हो सके। अगर मरीज कुपोषित होता है तो उसकी काउंसलिंग के साथ ही भर्ती कर फिजीशियन की देखरेख में इलाज भी शुरू कराया जाता है।
केस खराब होने पर आते हैं मरीज
पीजीआई की आहार विशेषज्ञ डॉ. रचना श्रीवास्तव का कहना है कि लड़कियों को यह मर्ज ज्यादा होता है। उनकी डाइट चार्ट तैयार करने के साथ ही काउंसलिंग की जाती है। ब्लड टेस्ट और अन्य जांच कराकर उसकी रिपोर्ट दिखाकर पोषण तत्वों की कमी और उसके दुष्प्रभाव के बारे में बताया जाता है। डॉ. रचना का कहना है कि इस बीमारी में सबसे खराब बात यह है कि लोग इसे मानसिक विकार मानते ही नहीं। केस खराब होने के बाद ही विशेषज्ञ के पास आते हैं।
इलाज में इनकी भूमिका अहम
ऐनरोक्सिया से ठीक होने के लिए इटिंग डिसऑर्डर स्पेशलिस्ट, काउंसलर, थैरेपिस्ट, फिजिशियन व आहार विशेषज्ञ की मदद लेने का सुझाव दिया जाता है। इस दौरान मरीज की काउंसलिंग कर उसे वजन बढ़ने के मानसिक डर से उबरने में मदद की जाती है। फिजिशियन बॉडी के आइडियल वेट को प्राप्त करने वहीं न्यूट्रिशनिस्ट संतुलित आहार को प्लान करने में मदद करते हैं।
ये हैं इसके लक्षण
- वजन काफी ज्यादा कम हो जाना
- ब्लड काउंट असामान्य रहना
- थकान व नींद न आना
- चक्कर आना, बार-बार बेहोश होना
- नाखून नीले पड़ जाना या उनका रंग बदल जाना
- पीरियड्स समय पर न होना
- मौसम में बदलाव सहन न कर पाना
- त्वचा का पीला पड़ जाना
- पेट में लगातार दर्द बने रहना
- चिड़चिड़ा हो जाना
- खाने से दूरी बनाना
- पार्टी आदि में जाने से कतराना
- साथ में खाना न खाना
- डिप्रेशन में जाना
- हमेशा थकान महसूस करते रहना
ऐसे मरीजों के सरमैडियन रिदम यानी आत्मा, शरीर और दिमाग के संतुलन की जांच की जाती है क्योंकि ये रिदम खराब हो जाता है। इसका शुरुआती दौर में पता नहीं चलता। खासतौर पर लड़कियां इस मर्ज से ज्यादा ग्रस्त होती हैं। ऐसे मरीजों को फैट इज फाइन को स्वीकार करने की सलाह दी जाती है। इस पर नियंत्रण न होने पर अवसाद, चिड़चिड़ापन और आत्महत्या तक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। - मिनी सिंह, मनोवैज्ञानिक व एडोलेसेंट साइकोलॉजी की विशेषज्ञ