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Partition: बुड़ैल के चौधरी डेराबस्सी के कैंप से ले आए थे मुस्लिम परिवारों को, अपने घरों में दी थी पनाह
Fri, 15 Aug 2025 03:35 PM IST
निवेदिता वर्मा
संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Fri, 15 Aug 2025 03:35 PM IST
सार
बंटवारे के दौरान दंगा हुआ तो मुस्लिम परिवार इधर-उधर छुपने लगे। कोई मक्के के खेत में तो कोई चो में। कुछ लोग डेराबस्सी के मुबारकपुर के शिविर में पाकिस्तान जाने के लिए भी चले गए। इनमें से ही कुछ लोग मुस्लिमों को सहारा देने के लिए भी आगे आए।
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गुरमेल खान, सैयद आलम
- फोटो : संवाद
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विस्तार
देश के बंटवारे के साथ ही आजादी मिली। दर्द भी बहुत था उस समय। चंडीगढ़ के गांव बुड़ैल में मुस्लिम परिवार रहते थे। जब बंटवारे के दौरान दंगा हुआ तो यहां के मुस्लिम परिवार इधर-उधर छुपने लगे। कोई मक्के के खेत में तो कोई चो में। कुछ लोग डेराबस्सी के मुबारकपुर के शिविर में पाकिस्तान जाने के लिए भी चले गए। इनमें से ही कुछ लोग मुस्लिमों को सहारा देने के लिए भी आगे आए। गांव बुड़ैल के राजपूत चौधरियों ने मुसलमानों को जाने नहीं दिया। ये चौधरी उन्हें डेराबस्सी के मुबारकपुर के आर्मी और पुलिस के शिविर से वापस ले आए।
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मेरे पिता दोस्त के घर शरण ली थी...
बुड़ैल निवासी गुरमेल खान ने बताया कि उन्हें सिख परिवार ने शरण दी। गांव के सिख परिवार तेग सिंह और पूरण सिंह ने हमारे परिवार की मदद की। उन्होंने हमारे घर में ताला लगा दिया और अपने घर ले गए। जब मामला ठंडा हुआ तो फिर अपने-अपने घरों को आए।
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चौधरियों ने अपने घरों में छुपा कर जान बचाई...
गांव बुड़ैल के दिलदार स्वीट्स के मालिक मोहम्मद मुश्ताक ने बताया कि जब माहौल खराब हुआ तो गांव बुड़ैल के चौधरियों ने अपने घरों में हमारे परिवारों को छुपाकर जान बचाई। उन्होंने कहा कि मेरे दादा रहमत अली हमें उस समय की कहानियां बताते थे कि कैसे चौधरियों ने अपने घर में रखकर हमारी हर तरह से हिफाजत की। गांव में अभी भी भाईचारा है।
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