हर मुराद पूरी करती है मां मनसा देवी

अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Thu, 24 Oct 2013 06:07 PM IST
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 One of the forms of Shaktipeeth is Mansa Devi

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शिवालिक की पहाड़ियों से लेकर कुरुक्षेत्र तक के 48 कोस के सिंधुवन में ऋषि-मुनियों ने पुराणों की रचना की थी। यह समस्त भूभाग देवधरा के नाम से जाना जाता है।
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इसी परंपरा में हरियाणा के पंचकुला में शिवालिक पर्वत मालाओं की गोद में सिन्धुवन के अतिंम छोर पर प्राकृतिक छटाओं से आच्छादित एकदम मनोरम एवं शांति वातावरण में स्थित है - सतयुगी सिद्घ माता मनसा देवी का मंदिर।
कहा जाता है कि यदि कोई भक्त सच्चे मन से 40 दिन तक निरंतर मनसा देवी के भवन में पहुंच कर पूजा अर्चना करता है तो माता मनसा देवी उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करती है। माता मनसा देवी का चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों में मेला लगता है।
माता मनसा देवी के मंदिर को लेकर कई धारणाएं व मान्यताएं प्रचलित हैं। श्री माता मनसा देवी का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि अन्य सिद्घ शक्तिपीठों का। श्री माता मनसा देवी के प्रकट होने का उल्लेख शिव पुराण में मिलता है।

जब शिव सति के शव को लेकर तांडव कर रहे थे, तो भगवान विष्णु ने सति के शव को विच्छेद किया था।

जहां-जहां शव के टुकड़े गिरे, वहां-वहां शक्ती पीठ बने। हिमाचल प्रदेश के कांगडा के स्थान पर सती का मस्तक गिरने से बृजेश्वरी देवी शक्तिपीठ, ज्वालामुखी पर जिव्हा गिरने से ज्वाला जी, मन का भाग गिरने से छिन्न मस्तिका चिन्तपूर्णी, नयन से नयना देवी बनी।

इसी तरह त्रिपुरा में बाई जंघा से जयन्ती देवी, कलकत्ता में दाये चरण की उंगलियां गिरने से काली मदिंर, सहारनपुर के निकट शिवालिक पर्वत पर शीश गिरने से शकुम्भरी, कुरूक्षेत्र में गुल्फ गिरने से भद्रकाली शक्ति पीठ तथा शिवालिक गिरिमालाओं पर देवी के मस्तिष्क का अग्र भाग गिरने से मनसा देवी बनी।

पांडवों ने की है यहां पूजा
श्री माता मनसा देवी की मान्यता के बारे पुरातन लिखित इतिहास तो उपलब्ध नहीं है, परन्तु पिंजौर, सकेतड़ी एवं कालका क्षेत्र में पुरातत्ववेताओं की खोज से यहां जो प्राचीन चीजे मिली हैं, जो पाषाण युग से संबंधित है।

इनसे यह सिद्घ होता है कि आदिकाल में भी इस क्षेत्र में मानव का निवास था और वे देवी देवताओं की पूजा करते थे, जिससे यह मान्यता दृढ होती है कि उस समय इस स्थान पर माता मनसा देवी मदिंर विद्यमान था।

पांडवों ने बनवास के समय माता मनसा देवी मदिंर में देवी आराधाना की थी। पांडवों के बनवास के दिनों में भगवान श्री कृष्ण के भी इस क्षेत्र में आने के प्रमाण मिलते हैं।
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