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23 मार्चः साल में यहां एक दिन ही चलती है ट्रेन

Mon, 23 Mar 2015 06:07 PM IST
विजय जैन/अमर उजाला, चंडीगढ़
विजय जैन/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Mon, 23 Mar 2015 06:07 PM IST
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omg, train running here one day in a year

क्या आप जानते हैं कि भारत में एक जगह ऐसी भी है, जहां साल में केवल एक दिन यानी 23 मार्च को ही ट्रेन चलती है। फिरोजपुर से लेकर हुसैनीवाला बॉर्डर तक स्पेशल ट्रेन 10 किलोमीटर का सफर तय करती है।

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एक समय में ये रेल लाइन हुसैनीवाला से होकर लाहौर तक जाती थी पर पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के दौरान यह रेल मार्ग बंद कर दिया गया। यहां सतलुज दरिया पर बने रेल पुल को भी तोड़ दिया गया। अब फिरोजपुर से हुसैनीवाला में ही आकर रेल लाइन खत्म हो जाती है। रेलवे ट्रैक को ब्लॉक कर यहां लिखा गया है - द एंड ऑफ नार्दर्न रेलवे।
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पूरे साल में एक दिन, केवल 23 मार्च को फिरोजपुर से एक स्पेशल ट्रेन बार्डर के लिए चलती है। गौरतलब है कि फिरोजपुर शहर से 10 किलोमीटर दूरी पर बने हुसैनीवाला बॉर्डर पर शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की समाधि है। इस समाधि पर 23 मार्च को लगने वाले शहीदी मेले में दूर-दूर से पर्यटक शामिल होते हैं। इस बार खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 23 मार्च को यहां आ रहे हैं।

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मरने के बाद भी शहीदों के साथ बेरहमी

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भारत-पाक बॉर्डर पर बने समाधि स्थल पर लगे बोर्ड पर ये जानकारी अंकित है कि फांसी के बाद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के शवों के साथ अंग्रेज किस बेरहमी से पेश आए। स्मारक स्थल पर लगे बोर्ड के मुताबिक अंग्रेज पुलिस अधिकारी सांड्रस की हत्या के दोष में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गई तो इसके विरोध में पूरा लाहौर बगावत के लिए उठ खड़ा हुआ।

डरी हुई ब्रिटिश सरकार ने निश्चित तारीख से एक दिन पहले 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजे तीनों को फांसी दे दी। उसके बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शवों के टुकड़े-टुकड़े कर अंग्रेज उन्हें लाहौर जेल की पिछली दीवार तोड़कर सतलुज दरिया के किनारे लाए और रात के अंधेरे में यहां बिना रीति रिवाज के जला दिया।

पहले पाक के कब्जे में था समाधि स्थल
बहुत कम लोग जानते होंगे कि हुसैनीवाला स्थित समाधि स्थल 1960 से पहले पाकिस्तान के कब्जे में था। जन भावनाओं को देखते हुए 1950 में तीनों शहीदों की समाधि स्थल पाक से लेने की कवायद शुरू हुई। करीब 10 साल बाद फाजिल्का के 12 गांव व सुलेमान की हेड वर्क्स पाकिस्तान को देने के बाद शहीद त्रिमूर्ति से जुड़ा समाधि स्थल भारत को मिल गया।
 
पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित
सतलुज दरिया के करीब बने इस समाधि स्थल को अब पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित किया जा रहा है। समाधि स्थल के आसपास ग्रीनरी क्षेत्र विकसित किया जा रहा है। यहां पार्क और झूले-फव्वारे लगाए गए हैं। शुक्रवार और रविवार को खास तौर पर सैलानियों की भीड़ होती है।

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