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जब प्रदूषण ने हिलाई इंद्र और नारद की गद्दी...
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 06 Jun 2014 04:06 PM IST
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थियेटर आर्ट्स चंडीगढ़ व डिपार्टमेंट ऑफ इन्वॉयरमेंट चंडीगढ़ की ओर से पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य पर सेक्टर 17 प्लाजा में नीलम थियेटर के सामने स्ट्रीट प्ले पर्यावरण का विनाश का बहुत ही जानदार तरीके से मंचन किया। कलाकारों ने अपने हुनर और भाव-भंगिमा से कुछ इस तरह से नाटक को पेश किया कि लोगों को पर्यावरण से हो रहे नुकसान के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया।
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नाटक की खास बात यह थी कि इसे एक पेड़ की छांव में मंचित किया गया और इसका समय एक से दो बजे तक रखा गया, ताकि लोगों को कड़ी धूप में पेड़ की ठंडी छांव का सुखद अहसास का मतलब समझ सके। नाटक में बताया गया कि जब प्रदूषण से मरने वालों की संख्या स्वर्गलोक में ज्यादा होने लगी तो इंद्र, नारद, यमराज और चित्रगुप्त के होश उड़ जाते हैं।
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लगातार बढ़ती संख्या से उन्हें चिंता सताने लगती है कि यदि ऐसी ही जनसंख्या बढ़ती रही तो उनकी गद्दी हिल सकती है। आखिर नीचे क्या हो रहा है कि लोग जल्दी स्वर्गलोक के वासी बन रहे हैं। इसका रहस्य नीचे जानने के लिए आ जाते हैं। कोई दिल्ली पहुंचता है तो कोई शिमला।
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हर जगह उन्हें पर्यावरण के घनघोर विनाश के निशान मिलते हैं। दिल्ली में आकर उन्हें पता चलता है कि ओजोन परत के छिद्र काफी बड़े हो गए हैं। इससे गर्मी बढ़ गई है। यमुना के बारे में बताया जाता है कि उसकी हालत ऐसी हो गई है कि यहां पर पशुओं को नहलाना बीमारियों को दावत देने के बराबर है। शिमला की पहाड़ियां गंजी हो चुकी है।
वनों व पहाड़ियों को काटकर होटल, रेस्टोरेंट व धर्मशाला बनाई जा रही हैं। सभी भगवान लोगों को समझाते हैं कि वे आने वाली नस्लों के बारे में सोचे। हालत ऐसी हो जाएगी कि बच्चा जन्म से पहले ही स्वर्ग लोक सिधार जाएगा। धीरे-धीरे मनुष्य का नामो-निशान मिट जाएगा। इस नाटक को राजीव मेहता ने निर्देशित किया व इसे योगेश अरोड़ा ने लिखा।