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Chandigarh News: चेहरे पर बड़ा चीरा नहीं, 8 मिमी की कट से जुड़ेगी टूटी हड्डी

Wed, 28 Oct 2026 02:41 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 28 Oct 2026 02:41 AM IST
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No large incision on the face; a broken bone will be repaired through an 8 mm cut.
चंडीगढ़। हादसे में चेहरे की हड्डी टूटने पर इलाज का मकसद केवल हड्डी जोड़ना नहीं बल्कि चेहरे का आकार, आंखों और मुंह की सामान्य गतिविधियां और नसों की सुरक्षा बनाए रखना भी होता है। इसी दिशा में जीएमसीएच-32 के ओरल हेल्थ सेंटर के विशेषज्ञों ने एक ऐसी सर्जिकल तकनीक विकसित की है, जिसमें चेहरे की टूटी हड्डी तक पहुंचने के लिए केवल 8 से 10 मिलीमीटर का छोटा चीरा लगाया जाता है। इससे बड़े चीरे, त्वचा पर निशान और चेहरे की नस को नुकसान पहुंचने के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। इस तकनीक के लिए टीम के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर डॉ. आनंद गुप्ता को अमेरिका में सम्मानित किया गया है।
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यह तकनीक गाल के उभरे हुए हिस्से की हड्डी यानी जाइगोमैटिक आर्च में फ्रैक्चर के इलाज में उपयोगी हो सकती है। इससे संबंधित शोध 2026 में जर्नल ऑफ ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी में प्रकाशित हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार, चेहरे की कुछ टूटी हड्डियों को बिना चीरा लगाए भी सही जगह पर लाया जा सकता है। हालांकि, हड्डी खिसकने या दोबारा अपनी जगह से हटने का खतरा होने पर प्लेट और स्क्रू से उसे स्थिर करना जरूरी हो सकता है। पारंपरिक सर्जरी में इसके लिए अपेक्षाकृत बड़ा चीरा लगाने की जरूरत पड़ सकती है।
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छोटे चीरे से हड्डी तक पहुंच, प्लेट से किया स्थिर
जीएमसीएच की टीम की तकनीक में फ्रैक्चर वाली जगह के ऊपर छोटा चीरा लगाया जाता है। इसके बाद आसपास के ऊतकों को सावधानी से हटाकर टूटी हड्डी तक पहुंच बनाई जाती है। हड्डी को सही स्थिति में लाने के बाद छोटी टाइटेनियम प्लेट और स्क्रू की मदद से उसे स्थिर किया जाता है। इस दौरान चेहरे की नसों के रास्ते को सुरक्षित रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
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30 मरीजों पर इस्तेमाल, किसी की नस को नुकसान नहीं
इस तकनीक से 30 मरीजों का इलाज किया गया। इनमें किसी भी मरीज में चेहरे की नस को अस्थायी या स्थायी नुकसान नहीं हुआ। एक मरीज को सर्जरी वाली जगह पर सतही संक्रमण हुआ, जिसे दोबारा ऑपरेशन के बिना संभाल लिया गया। किसी भी मरीज को दूसरी सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ी। मरीजों का छह से 24 महीने तक फॉलोअप किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार छोटे चीरे से त्वचा पर निशान कम रहने और ऑपरेशन के बाद रिकवरी में मदद मिलने की संभावना है। हालांकि, हर मरीज के लिए यही तकनीक उपयुक्त नहीं होती। फ्रैक्चर की जगह, गंभीरता और हड्डी के खिसकने की स्थिति के आधार पर डॉक्टर इलाज का तरीका तय करते हैं।

शोध में ये विशेषज्ञ रहे शामिल
इस शोध में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आनंद गुप्ता, पूर्व सीनियर रेजिडेंट डॉ. अनिश पूर्णा टी., डॉ. विराज नितिन खिसमात्राव और विभागाध्यक्ष प्रो. गुरवनित कौर लेहल शामिल रहे।
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