नेपाल में भूकंप झेल जिंदा लौटी पंचकूला की 'डाक्टर' बेटी
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पिछले शनिवार से बेहाल परिवार के सदस्यों ने उस वक्त राहत की सांस ली, जब डॉक्टर बनने का ख्वाब लेकर नेपाल के काठमांडू में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही प्रीति पंचकूला पहुंची। प्रीति के मम्मी पापा को हर पल बेटी की चिंता सता रही थी। लेकिन बेटी के पहुंचते ही उन्होंने राहत की सांस ली।
भूकंप से बचती हुई कॉलेज हॉस्टल से अस्पताल पहुंचने के बाद खुद के बजाय भूकंप की चपेट में आए अन्य लोगों के इलाज में वह जुटी रही। तीन दिन तक जमीन में कुछ घंटों की नींद लेकर इस त्रासदी का सामना करने वाली पंचकूला के सेक्टर-17 की प्रीति ने हार नहीं मानी और लगातार भूकंप पीड़ितों के इलाज में खुद का दर्द भी भूल गईं।
पंचकूला पहुंचने पर प्रीति ने बताया कि जिस वक्त भूकंप आया, उस वक्त वह किस्त मेडिकल कॉलेज, काठमांडू के हॉस्टल में थी। छुट्टियां होने के कारण 150 छात्राओं में से महज दो तीन स्टूडेंट ही हॉस्टल में थीं। प्रीति ने कहा कि भूकंप का झटका जैसे महसूस हुआ, वह हॉस्टल की दूसरी मंजिल से उतरकर नीचे की तरफ दौड़ी।
इस दौरान लगे झटकों की वजह से कई बार वह गिरी तो कई बार हाथों पर भी चोटें आईं। उस वक्त हिम्मत ने जवाब देना शुरू कर दिया, जब हॉस्टल से बाहर निकलने के लिए एकमात्र दरवाजा भी झटके के कारण हिलकर बंद हो गया। फिर फोन से अपनी दोस्त रूबी को बुलाया और दोनों ने दरवाजे का धक्के लगाए। दरवाजा खुलते ही दोनों बाहर ग्राउंड में जा पहुंचे।
इस दौरान प्रीति ने पंचकूला में पिता विनोद और मम्मी अंजू से बातचीत कर खुद के बारे में बताया। सेक्टर-17 में रहने वाली प्रीति की मम्मी ने बताया कि कई दिनों के बाद उन्होंने बेटी को दखकर राहत की सांस ली है।
बच्ची को नहीं बचा पाने का है गम
प्रीति ने बताया कि इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों के लिए किस्त अस्पताल में ऑपरेशन थियेटर और वेंटिलेटर रूम भी क्षतिग्रस्त हो गए। नतीजतन सामान्य इलाज के अलावा अन्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही थी।
वहां एक बच्ची को लाए जाने के बाद सीनियर डॉक्टरों ने उसकी हालत देखने को कहा। जब तक प्रीति बच्ची की हालत को देखकर उसे इलाज दे पाती उसकी मौत हो गई। इस बात का गम प्रीति को ताउम्र सताएगा। प्रीति ने कहा कि अगर मुझे सुविधाएं मिलती तो शायद बच्ची की जान बचाने का मौका मिल जाता।
नानी के लिए दो घंटे पैदल चली
हॉस्टल से जब प्रीति बाहर की तरफ निकली तो देखा कि चारदीवारी टूटकर पास से बहने वाली करमनासा नदी में पत्तों की तरह समा गई। इसके बाद भी प्रीति ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी एक दोस्त के साथ सीधे अस्पताल जा पहुंची। वहां खुद का इलाज कराने के बाद तुरंत मरीजों की राहत में जुट गईं। फुर्सत मिलने पर काठमांडू में ही अपने मामा और नानी की खैरियत जानने के लिए दो घंटे का पैदल चलने के बाद वह उनके घर पहुंची और शाम के वक्त फिर अस्पताल लौट आईं।