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चंडीगढ़: अब नहीं दिखते शहर की सुंदरता बढ़ाने वाले इमली और कचनार के पेड़, धीरे-धीरे गायब हुई कईं प्रजातियां

Fri, 31 Dec 2021 09:03 PM IST
पंचकुला ब्‍यूरो सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: पंचकुला ब्‍यूरो Updated Fri, 31 Dec 2021 09:03 PM IST
सार

चंडीगढ़ की स्थापना वर्ष 1966 में हुई थी। आज यहां 63 से अधिक सेक्टर हैं। पांच हजार से अधिक प्रजातियों के लाखों पेड़ यहां लगे हैं। स्थापना के समय शहर में तमाम प्रजातियों के पेड़ लगाए गए थे।

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Tamarind and Kachnar trees are no longer visible in Chandigarh
चंडीगढ़ में लगा पेपर मलबेरी का पेड़। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अपनी हरियाली के लिए देशभर में मशहूर सिटी ब्यूटीफुल चंडीगढ़ में अब इमली के पेड़ दिखते हैं न कचनार के। ये वो पेड़ हैं जो इस शहर की सुंदरता में चार चांद लगाते थे। अब इनकी जगह शहतूत की प्रजाति कागजी शहतूत (पेपर मलबेरी) ने ली है। यही नहीं भारतीय प्रवाल वृक्ष (कोरल ट्री ऑफ इंडिया) भी अब नजर नहीं आता। इसका खुलासा पीयू के वनस्पति विज्ञान विभाग की वरिष्ठ प्रोफेसर डेजी बातिश के शोध में हुआ है। उन्होंने शहर व आसपास के क्षेत्रों के पेड़ों की स्थिति को देखा। उनका तर्क है कि शहर में कुछ पेड़ों के कम होने के कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन भी एक महत्वपूर्ण कारक है।

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चंडीगढ़ की स्थापना वर्ष 1966 में हुई थी। आज यहां 63 से अधिक सेक्टर हैं। पांच हजार से अधिक प्रजातियों के लाखों पेड़ यहां लगे हैं। स्थापना के समय शहर में तमाम प्रजातियों के पेड़ लगाए गए थे। पेड़ों की संख्या हर साल बढ़ी लेकिन पेड़ों की कई प्रजातियां धीरे-धीरे गायब हो गईं। इस पर शोध किया गया तो पाया गया कि चंडीगढ़ के आसपास के जंगल में पाए जाने वाले पेड़ फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट पेड़ की संख्या कम हो गई है। पहले इन पेड़ों पर लाल रंग के फूल आते थे, जो शहर के प्रवेश के समय एक अलग अनुभव देते थे। इसी तरह सेक्टर-32 से लेकर सुखना लेक तक पहले इमली के पेड़ काफी संख्या में थे, जो अब नहीं दिखते। इमली के पेड़ बड़ी संख्या में सूख गए। कचनार का भी यही हाल है। इसी तरह पीयू में पहाड़ी पीपल (थेस्पेसिया पोपुलनिया) के पेड़ काफी संख्या में थे, जो आज गायब हो चुके हैं। अर्थरेना इंडिका पेड़ भी अब शहर में दिखाई नहीं दे रहा है।

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बूटी प्लांट भी हुए गायब

शोध में पाया गया है कि कंघी, बरनोनिया (सहदेवी), थुंबाई, मेडिसनल प्लांट भूमि आंवला, खैर शीशम भी गिनती के ही बचे हैं। इनमें से कुछ गायब भी हुए हैं। यह पेड़ व बूटी प्लांट पिछले 15 साल में गायब हुए हैं। कई अन्य बूटी प्लांटों पर भी शोध चल रहा है।
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पेड़ों के लुप्त व कम होने के कारण

- तेजी से हो रहा जलवायु परिवर्तन
- बढ़ता शहरीकरण
- फॉरेस्ट ग्रोविंग प्लांट की संख्या बढ़ना
- नई-नई बीमारियों का जन्म
- पेड़ों की समय-समय पर देखभाल न होना

शहर में पिछले 15 वर्षों में इमली, कचनार, कोरल ट्री, पहाड़ी पीपल आदि पेड़ काफी कम हो गए हैं। कई ब्यूटी प्लांट भी कम हुए हैं। इनके कम होने या लुप्त होने के कई कारण शोध में सामने आए हैं। हालांकि इनकी जगह दूसरे पेड़ लगाए गए हैं। हरियाली भी बढ़ रही है। - प्रो. डेजी बातिश, वनस्पति विज्ञान विभाग, पीयू

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