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एक औरत की दर्दभरी दास्तां 'अगली दस्तक होन तो पहला'
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 08 Feb 2014 12:32 PM IST
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रंधावा ऑडिटोरियम में पंजाब कला परिषद की तरफ से एमएस रंधावा के यादगार प्रोग्रामों की सूची के अनुसार सूचनात्मक ‘अगली दस्तक होन तो पहला’ नाटक का मंचन किया। पाली भूपिंदर सिंह के नाटक का निर्देशन अनीता शब्दीष ने किया। उन्होंने खुद इस नाटक में मुख्य भूमिका भी निभाई।
नाटक की कहानी एक ऐसी औरत की है जिसे एक दूसरे धर्म के युवक कबीर से प्यार हो जाता है। प्यार के बाद दोनों शादी कर लेते हैं। शादी के बाद महिला की कोशिश होती है कि वह अपनी बेटी सरघी को धर्म और मजहब की परछाई से दूर रखेगी।
उसकी यह भावना धर्म के एजेंडे से बाहर रहने की इच्छा का इजहार थी, पर उसके सपने टूट गए और पहली ही दस्तक में कबीर और उसकी बेटी सरघी की मृत्यु हो जाती है। सरघी की मां के साथ कुछ लोग सामूहिक दुष्कर्म कर देते हैं।
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जुल्म की शिकार औरत जब गर्भवती हो जाती है तो उस बच्चे को वह कबीर का नाम ही देती है। बचपन में वह शांत और संस्कारवान होता है। लेकिन, जैसे-जैसे वह बड़ा होता है वैस-वैसे ही वह उदंडी और उग्र स्वभाव का बन जाता है। इससे वह बूढ़ी औरत पागल हो जाती है और किसी की भी दस्तक से घबरा कर काले पर्दे लगा लेती है।
कुछ वक्त बाद उसका बेटा कबीर फौजी बनकर मेडल जीतकर आता है तो वह खुश होती है। उसकी वर्दी पर लगे दाग से पता लगता है कि वह अपनी आयु के फौजी का कत्ल करके आया है, जो दुश्मन सेना का सिपाही था। इस वह बूढ़ी आंखें फिर निराशा से भर जाती हैं।
इस मौके पर पंजाब के प्रमुख नाटक निर्देशक केवल धालीवाल का पंजाब कला परिषद और इसकी तीनों अकादमी ने सम्मान किया गया। इस दौरान चेयरपर्सन हरजिंदर कौर, महासचिव निर्मल दत्त, सुदेश शर्मा, साधना संगर, अनिल शर्मा, श्याम सुंदर और डॉ. आतमजीत, दविंदर दमन, प्रसिद्घ गायक निर्मल सिद्घू, एमएस रतन शामिल थे।
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नाटक की कहानी एक ऐसी औरत की है जिसे एक दूसरे धर्म के युवक कबीर से प्यार हो जाता है। प्यार के बाद दोनों शादी कर लेते हैं। शादी के बाद महिला की कोशिश होती है कि वह अपनी बेटी सरघी को धर्म और मजहब की परछाई से दूर रखेगी।
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उसकी यह भावना धर्म के एजेंडे से बाहर रहने की इच्छा का इजहार थी, पर उसके सपने टूट गए और पहली ही दस्तक में कबीर और उसकी बेटी सरघी की मृत्यु हो जाती है। सरघी की मां के साथ कुछ लोग सामूहिक दुष्कर्म कर देते हैं।
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जुल्म की शिकार औरत जब गर्भवती हो जाती है तो उस बच्चे को वह कबीर का नाम ही देती है। बचपन में वह शांत और संस्कारवान होता है। लेकिन, जैसे-जैसे वह बड़ा होता है वैस-वैसे ही वह उदंडी और उग्र स्वभाव का बन जाता है। इससे वह बूढ़ी औरत पागल हो जाती है और किसी की भी दस्तक से घबरा कर काले पर्दे लगा लेती है।
कुछ वक्त बाद उसका बेटा कबीर फौजी बनकर मेडल जीतकर आता है तो वह खुश होती है। उसकी वर्दी पर लगे दाग से पता लगता है कि वह अपनी आयु के फौजी का कत्ल करके आया है, जो दुश्मन सेना का सिपाही था। इस वह बूढ़ी आंखें फिर निराशा से भर जाती हैं।
इस मौके पर पंजाब के प्रमुख नाटक निर्देशक केवल धालीवाल का पंजाब कला परिषद और इसकी तीनों अकादमी ने सम्मान किया गया। इस दौरान चेयरपर्सन हरजिंदर कौर, महासचिव निर्मल दत्त, सुदेश शर्मा, साधना संगर, अनिल शर्मा, श्याम सुंदर और डॉ. आतमजीत, दविंदर दमन, प्रसिद्घ गायक निर्मल सिद्घू, एमएस रतन शामिल थे।