समझिए हाइड्रोजन ट्रेन का पूरा विज्ञान: गैस से बिजली, बिजली से रफ्तार... ऐसे चलती है नई नमो ग्रीन ट्रेन
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुक्रवार को जींद से शुरू होगी। यह प्रोटॉन एक्सचेंज मेंब्रेन फ्यूल सेल तकनीक पर आधारित है। इसमें हाइड्रोजन गैस और हवा से बिजली बनती है, जो पहियों को घुमाती है।
विस्तार
क्या गैस से भी ट्रेन चल सकती है? सुनने में यह अजीब लगता है, लेकिन हाइड्रोजन ट्रेन बिल्कुल ऐसे ही चलती है। इसमें न डीजल जलता है और न ही कोयला। डीजल इंजन की जगह इसमें प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन फ्यूल सेल तकनीक का इस्तेमाल होता है। जींद से शुक्रवार को शुरू होने वाली भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन इसी तकनीक पर काम करेगी। ट्रेन में लगी एक खास मशीन में हाइड्रोजन गैस और हवा की मदद से बिजली बनती है। यही बिजली पहियों को घुमाती है।
आसान भाषा में इसे हाइड्रोजन को ईंधन, फ्यूल सेल को बिजलीघर और मोटर को पहिए घुमाने वाली मशीन मान लें। हाइड्रोजन फ्यूल सेल तक पहुंचती है। वहां बिजली बनती है। यही बिजली मोटर को चलाती है और मोटर पहियों को घुमाती है। आखिर में अपशिष्ट के रूप में केवल पानी और थोड़ी गर्मी निकलती है।
इसे ऐसे समझिए जैसे बैटरी से चलने वाली खिलौना कार। फर्क सिर्फ इतना है कि खिलौना कार की बैटरी पहले से चार्ज होती है जबकि हाइड्रोजन ट्रेन अपनी जरूरत की बिजली चलते-चलते खुद बना लेती है।
हाइड्रोजन ट्रेन की कार्यप्रणाली को समझाने के लिए केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (आईबी मंत्रालय) ने वीरवार को एक ग्राफिक जारी किया। इसमें फ्यूल सेल के जरिए हाइड्रोजन से बिजली बनने और ट्रेन के चलने की पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से दर्शाया गया है।
पहला कदम: हाइड्रोजन टैंक से मशीन तक
ट्रेन में बड़े टैंक में हाइड्रोजन गैस (H₂) भरी जाती है। यह गैस एक खास मशीन फ्यूल सेल के एनोड तक पहुंचती है। यही ट्रेन का बिजलीघर है।
दूसरा कदम: गैस दो हिस्सों में टूट जाती है
फ्यूल सेल के अंदर एक रासायनिक प्रक्रिया होती है। इसमें हाइड्रोजन गैस दो हिस्सों में बंट जाती है- प्रोटॉन (H⁺) और इलेक्ट्रॉन (e⁻)। यहीं से बिजली बनने की प्रक्रिया शुरू होती है।
तीसरा कदम: यहीं से बनती है बिजली
अब प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन अलग-अलग रास्तों से आगे बढ़ते हैं। प्रोटॉन सीधे एक खास झिल्ली (मेम्ब्रेन) से होकर दूसरी ओर पहुंच जाते हैं लेकिन इलेक्ट्रॉन इस झिल्ली को पार नहीं कर पाते। उन्हें बाहर बने एक अलग रास्ते (सर्किट) से गुजरना पड़ता है। इलेक्ट्रॉन के बिजली तारों से बहने के प्रवाह से ही बिजली बनती है। यही बिजली ट्रेन की मोटर, पंखे, लाइट और अन्य सभी विद्युत उपकरणों को चलाती है।
चौथा कदम: हवा भी करती है मदद
दूसरी ओर कैथोड पर बाहर से आई ऑक्सीजन (O₂) मौजूद रहती है। यहां प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन फिर मिलना चाहते हैं लेकिन वे अकेले नहीं मिल सकते। यहां हवा से आई ऑक्सीजन उनकी मदद करती है। तीनों मिलकर पानी (H₂O) बनाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के बाद केवल पानी, थोड़ी गर्मी और अतिरिक्त हवा बाहर निकलती है। धुआं या कार्बन डाइऑक्साइड जैसी प्रदूषक गैसें नहीं निकलतीं।
तकनीक के फायदे-
- डीजल की जरूरत नहीं पड़ती।
- धुआं और कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य होता है।
- पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचता है।
- शोर भी अपेक्षाकृत कम होता है।
- भविष्य में स्वच्छ और हरित परिवहन का बेहतर विकल्प माना जा रहा है।
बिजली से चलने वाली वंदे भारत और हाइड्रोजन ट्रेन में अंतर क्या?
दोनों ट्रेनों के पहिए इलेक्ट्रिक मोटर से ही घूमते हैं। यानी दोनों आखिरकार बिजली से ही चलती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि दोनों को बिजली अलग-अलग तरीके से मिलती है। वंदेभारत ट्रेन ऊपर लगी ओवरहेड इलेक्ट्रिक तार से सीधे बिजली लेती है। यह बिजली पैंटोग्राफ के जरिए ट्रेन तक पहुंचती है। मोटर उसी बिजली से चलती है और ट्रेन आगे बढ़ती है। अगर ओवरहेड लाइन नहीं हो तो ट्रेन नहीं चल सकती। वहीं हाइड्रोजन ट्रेन में इसमें ऊपर से बिजली नहीं आती। ट्रेन के अंदर ही बिजली बनती है।