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साइंटफिक इंस्ट्रूमेंट इंडस्ट्री सिर्फ उद्योग नहीं, गौरवशाली विरासत भी
ब्यूरो/अमर उजाला, अंबाला
Updated Wed, 20 Jan 2016 03:25 PM IST
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हरियाणा के अंबाला की साइंटफिक इंस्ट्रूमेंट इंडस्ट्री सिर्फ उद्योग भर नहीं है। यह एक विरासत है। इसका एक गौरवशाली अतीत है। देश के आजाद होने से पहले इस इंडस्ट्री ने विश्व बाजार में अंबाला को एक पहचान दी थी। अंबाला में आज भी 2100 सूक्ष्म और लघु इकाइयां इस इंडस्ट्री को चलाने में अपना अहम योगदान दे रही हैं।
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हालांकि दो साल से चीन इनके लिए एक खतरे की तरह अपनी पकड़ बना रहा है मगर ये लघु उद्यमी इनोवेशन और क्वालिटी के दम पर उससे दो-दो हाथ कर रहे हैं। इस औद्योगिक विरासत की रक्षा में दिन रात एक किए हुए हैं। इन उद्यमियों के इसी कौशल और उत्साह को समर्पित है अंबाला से मोहित धुप्पड़ की यह रिपोर्ट....
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यह है पहचान
2100 सूक्ष्म और लघु इकाइयां
23 हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार
800 करोड़ से अधिक का टर्नओवर
110 करोड़ का सरकार को सालाना राजस्व
इतिहास
1914 में मिस्टर हरगोलाल ने अंबाला में साइंस उपकरण बनाकर देश और दुनिया के शैक्षिणक संस्थानों को भेजने शुरू किए थे। उस जमाने में इंग्लैंड, कनाडा, जापान, जर्मनी और फ्रांस में ही ऐसे उपकरण बनते थे। मिस्टर हरगोलाल के समय में ही साइंस टीचर नंद लाल ने भी सिर्फ दो कर्मचारियों के साथ यह उपकरण बनाने का काम शुरू किया। अंग्रेजों के काल में ही इस इंडस्ट्री की प्रसिद्धी इतनी हो गई थी कि 1937 में अंबाला के साइंस इंस्ट्रूमेंट्स पर पहला कैटेलॉग प्रकाशित हुआ। उस समय इसके प्रकाशन पर 50 हजार रुपये खर्च हुए थे।
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दिक्कतें
चीन से बड़ा खतरा
चीन ने भी विश्व बाजार में अपने साइंस इंस्ट्रूमेंट्स जैसे माइक्रोस्कोप, टेलीस्कोप, ग्लास ट्यूबिंग, डिजिटल मीटर सर्किट चिप, ऑपटिकल ग्लास, स्पैक्ट्रोमीटर, थर्मामीटर इत्यादि उतार दिए हैं। चीनी उपकरण भारत से सस्ते हैं। इस वजह से विश्व बाजार में अंबाला के हाथ से ऑर्डर छिन रहे हैं। दो साल पहले एक अरब का एक इंटरनेशनल ऑर्डर चीन ने हथिया लिया था।
तब से यह सिलसिला जारी है। अंबाला इंडस्ट्री को काफी नुकसान हो रहा है। सिर्फ विदेशी बाजार में ही नहीं घरेलू मोर्चे पर चीन की घुसपैठ बढ़ रही है। अंबाला की प्रमुख कंपनियां यहां की 2100 लघु और छोटी इकाइयों से स्पेयर पार्ट्स तैयार करवाती थीं मगर अब इन कंपनियों का रुझान भी चीन की ओर हो रहा है। इससे छोटी इकाइयों में चिंता बढ़ रही है।
टैक्स का बोझ
साइंस उपकरणों पर एक्साइज शुल्क लगता है। पिछले 15 साल से एक्साइज शुल्क की सीमा 1.5 करोड़ है, जबकि उद्यमी इसे बढ़ा कर पांच करोड़ करने की मांग कर रहे हैं। इससे यहां के उद्योग की लागत बढ़ रही है। कच्चे माल पर 12 फीसदी कर चुकाना होता है और तैयार माल पर पांच फीसदी वैट।
मदद के तीनों प्रोजेक्ट लटके
1. साहा ग्रोथ सेंटर
डेढ़ दशक पहले 1100 करोड़ के इस प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई थी। वर्ष 2006 तक इसे पूरा होना था मगर यह अब तक पूरी तरह सिरे नहीं चढ़ी।
2. साइंस क्लस्टर जोन
यहां एडवांस मशीनें लगाई जानी थी। इसमें छोटे उद्यमी मामूली सी फीस देकर अत्याधुनिक मशीनों पर उपकरण तैयार कर सकते थे। चीन को टक्कर देने में यह योजना कारगर है। इसे 2010 तक पूरा होना था मगर अधर में लटकी है।
3. टूल रूम, रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर
सौ करोड़ की लागत से यह सेंटर साहा में बनना था। वर्ष 2013 में इसका शिलान्यास तो हुआ मगर उसके बाद एक ईंट भी नहीं रखी गई।
क्या कहते हैं उद्यमी
चीन से जबरदस्त चुनौती मिल रही है। चीन के उपकरण सस्ते हैं। कंपटीशन में टिके रहने के लिए तुलनात्मक रेट रखने होंगे। यह बिना सरकार की मदद के संभव नहीं है। अंबाला की बड़ी इकाइयों को भी सोचना होगा कि वे स्पेयर पार्ट्स के लिए छोटी यूनिटों पर विश्वास बनाए रखें। यह उद्योग अंबाला की विरासत है।
-अश्वनी गोयल, पूर्व प्रेजीडेंट, असीमा
सूक्ष्म और लघु साइंस इकाइयां ही अंबाला इंडस्ट्री की जान हैं। इन इकाइयों को यदि सरकार अपग्रेड करवाएं, टूल रूम व ट्रेनिंग सेक्शन खुलवाकर दे तो चीन का मुकाबला किया जा सकता है। आज भी अंबाला में तैयार उपकरण चीन के उपकरणों से क्वालिटी में कहीं बेहतर हैं।
-बाल किशन ठाकुर, साइंस उद्यमी, अंबाला
अंबाला की साइंस इंडस्ट्री बहुत ही पुरानी है, लेकिन सरकार ने हमेशा इस इंडस्ट्री की उपेक्षा ही की है। इस इंडस्ट्री को एक बड़े पैकेज की दरकार है।
-ज्ञानचंद अग्रवाल, प्रधान, साइंसटीफिक अपरेट्स मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन (सामा)
वैट टैक्स की एडजस्टमेंट सरकार द्वारा बंद किए जाने से उद्यमियों को बहुत नुकसान हुआ है। अब कारोबारी कच्चे माल की खरीद पर तो ज्यादा टैक्स अदा करते हैं, लेकिन तैयार माल की बिक्री पर यह कम है। पहले सरकार इस अंतर की भरपायी करती थी मगर अब सरकार ने इसे बंद कर दिया है।
-राजीव अग्रवाल, सचिव, सामा
यह बेहद जरूरी है कि अंबाला को साइंस सिटी का दर्जा मिले। सरकारी मदद और पैकेज की गुंजाइश भी तभी बनेगी। इतनी बड़े साइंस उद्योग में जहां हजारों वर्कर काम कर रहे हैं, उनके लिए एक अलग से ईएसआई अस्पताल होना चाहिए। फिलहाल ईएसआई का रोटरी अस्पताल से टाईअप हुआ है, ये बहुत अच्छी बात है। लेकिन जरूरत के हिसाब से एक अलग अस्पताल होना चाहिए।
- राकेश गुप्ता, प्रधाना, असीमा