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और ‘मोहनजोदड़ो’ के कायल हो गए चंडीगढ़वासी
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 02 Mar 2014 05:06 PM IST
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पिरयोडीकल नाटक की सबसे कठिन चीज होती है इसमें इस्तेमाल होने वाली भाषा। लेकिन, शनिवार शाम टैगोर थिएटर-18 में मुंबई के थिएटर ग्रुप बिग बोंग ने बेहद ही आसान लहजे में पौराणिक भाषा का इस्तेमाल करते हुए मोहनजोदड़ो नाटक का मंचन किया। नाटक को आकाश आदित्य लामा ने लिखा और इसका निर्देशन कुलविंदर बक्शीश ने किया।
नाटक की शुरूआत होती है मोहनजोदड़ो और आर्य समाज की दुश्मनी से। मोहनजोदड़ो के काबिल सैनिक अक्षत की बहादुरी से आर्य समाज का राजा इंद्र हार जाता है।
अक्षत की बहादुरी से खुश होकर मोहनजोदड़ो के राजा उसे अपनी बेटी से शादी का न्योता देता है। अक्षत भी राजा की बेटी को पसंद करता है।
कहानी में द्वंद्व तब पैदा होता है जब पता चलता है कि राजा की बेटी आर्य समाज के राजा इंद्र को प्यार करती है और उसके बच्चे की मां बनने वाली है।
अक्षत यह जानकर राजा की बेटी को इंद्र के साथ भेजने में मदद करता है, लेकिन राजा नाखुश होकर अक्षत को देश से निकाल देता है।
कहानी आगे बढ़ती है और इंद्र के घर में पुत्र जन्म लेता है जिसका नाम वरुण है। कहानी आगे बढ़ती है और वरुण बड़ा होता है। वह भी वीर योद्धा बनता है। लेकिन, वरुण पर आरोप लगता है कि वह मोहनजोदड़ो पर कभी हमला नहीं करेगा। क्योंकि उसकी मां भी उसी समाज से है। वरुण इसका खंडन करता है और युद्ध के लिए तैयार होता है।
मोहनजोदड़ो के राजा इससे चिंतित होकर अक्षत को वापस राज्य में बुलाते हैं और वरुण से लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। युद्ध के मैदान में वरुण को देख अक्षत का दिल पसीज जाता है और वह जानबूझकर युद्ध हारकर प्राण त्याग देता है। अंत में वरुण खुश तो होता है, लेकिन जब उसे पता चलता है कि अक्षत जानबूझकर हारा है तो उसे बुरा लगता है और वह भी राज्य छोड़ कर चला जाता है।
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चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी द्वारा आयोजित इस नाटक की अवधि एक घंटा 40 मिनट रही। बारिश की वजह से दर्शक कम थे, लेकिन पूरी अवधि नाटक ने दर्शकों को बांधे रखा।
नाटक में शिकार और लड़ाई के लिए कंटेंपरी डांस फार्म का इस्तेमाल किया गया और स्टेज के पीछे सफेद कपड़े से लाइट के साथ कलाकारों की परछाई का शानदार प्रयोग किया गया।
बॉडी वर्क पर दिखी कमी
नाटक देखने आई प्रसिद्ध रंगकर्मी नीलम मान सिंह के अनुसार नाटक में थोड़ी सुधार की गुंजाइश थी। थिएटर में बॉडी वर्क पर काफी काम होता है। नाटक में इसको लेकर काफी कमियां झलक रही थीं। स्टोरी लाइन और अदाकारी में काफी काम होना चाहिए। नाटक से जितनी अपेक्षाएं थीं वह पूरी नहीं हुईं।
बोले दर्शक
नाटक बहुत ही अच्छा लगा। इसमें बीच में हुई तलवारबाजी ने दिल जीत लिया। लाइट और साउंड का इस्तेमाल भी बखूबी से किया गया, जिससे नाटक में पृष्ठ भूमि में इस्तेमाल हुआ। सफेद स्पोर्ट पर कलाकारों की छवियां काफी अच्छी लग रही थीं।
अभय खुशवाहा, आईटी प्रोफेशनल
कलाकारों की अदाकारी काफी पसंद आई। नाटक को देखते हुए एक किरयोसिटी बनी रही। काफी दिनों बाद एक पुराना नाटक देखकर अच्छा लगा। कुछ सीन जैसे अक्षत का अपनी जान गंवा देना दिल को छू गया। राजा का टूटा हुआ दिल और उसकी बेबसी भी काफी भावुक कर गई।
सीएन मलहोत्रा, रिटायर्ड बैंक अधिकारी
पानी टपक रहा था बीच नाटक में
नाटक के सेट में वैसे तो कलाकार काफी सहज रूप से अदाकारी कर रहे थे, लेकिन बीच नाटक में स्टेज पर पानी पड़ने लगा। शनिवार हुई बारिश की वजह से नाटक के बीच पानी निरंतर टपकता रहा जिससे हादसा होने का डर भी था।
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नाटक की शुरूआत होती है मोहनजोदड़ो और आर्य समाज की दुश्मनी से। मोहनजोदड़ो के काबिल सैनिक अक्षत की बहादुरी से आर्य समाज का राजा इंद्र हार जाता है।
अक्षत की बहादुरी से खुश होकर मोहनजोदड़ो के राजा उसे अपनी बेटी से शादी का न्योता देता है। अक्षत भी राजा की बेटी को पसंद करता है।
कहानी में द्वंद्व तब पैदा होता है जब पता चलता है कि राजा की बेटी आर्य समाज के राजा इंद्र को प्यार करती है और उसके बच्चे की मां बनने वाली है।
अक्षत यह जानकर राजा की बेटी को इंद्र के साथ भेजने में मदद करता है, लेकिन राजा नाखुश होकर अक्षत को देश से निकाल देता है।
कहानी आगे बढ़ती है और इंद्र के घर में पुत्र जन्म लेता है जिसका नाम वरुण है। कहानी आगे बढ़ती है और वरुण बड़ा होता है। वह भी वीर योद्धा बनता है। लेकिन, वरुण पर आरोप लगता है कि वह मोहनजोदड़ो पर कभी हमला नहीं करेगा। क्योंकि उसकी मां भी उसी समाज से है। वरुण इसका खंडन करता है और युद्ध के लिए तैयार होता है।
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मोहनजोदड़ो के राजा इससे चिंतित होकर अक्षत को वापस राज्य में बुलाते हैं और वरुण से लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। युद्ध के मैदान में वरुण को देख अक्षत का दिल पसीज जाता है और वह जानबूझकर युद्ध हारकर प्राण त्याग देता है। अंत में वरुण खुश तो होता है, लेकिन जब उसे पता चलता है कि अक्षत जानबूझकर हारा है तो उसे बुरा लगता है और वह भी राज्य छोड़ कर चला जाता है।
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चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी द्वारा आयोजित इस नाटक की अवधि एक घंटा 40 मिनट रही। बारिश की वजह से दर्शक कम थे, लेकिन पूरी अवधि नाटक ने दर्शकों को बांधे रखा।
नाटक में शिकार और लड़ाई के लिए कंटेंपरी डांस फार्म का इस्तेमाल किया गया और स्टेज के पीछे सफेद कपड़े से लाइट के साथ कलाकारों की परछाई का शानदार प्रयोग किया गया।
बॉडी वर्क पर दिखी कमी
नाटक देखने आई प्रसिद्ध रंगकर्मी नीलम मान सिंह के अनुसार नाटक में थोड़ी सुधार की गुंजाइश थी। थिएटर में बॉडी वर्क पर काफी काम होता है। नाटक में इसको लेकर काफी कमियां झलक रही थीं। स्टोरी लाइन और अदाकारी में काफी काम होना चाहिए। नाटक से जितनी अपेक्षाएं थीं वह पूरी नहीं हुईं।
बोले दर्शक
नाटक बहुत ही अच्छा लगा। इसमें बीच में हुई तलवारबाजी ने दिल जीत लिया। लाइट और साउंड का इस्तेमाल भी बखूबी से किया गया, जिससे नाटक में पृष्ठ भूमि में इस्तेमाल हुआ। सफेद स्पोर्ट पर कलाकारों की छवियां काफी अच्छी लग रही थीं।
अभय खुशवाहा, आईटी प्रोफेशनल
कलाकारों की अदाकारी काफी पसंद आई। नाटक को देखते हुए एक किरयोसिटी बनी रही। काफी दिनों बाद एक पुराना नाटक देखकर अच्छा लगा। कुछ सीन जैसे अक्षत का अपनी जान गंवा देना दिल को छू गया। राजा का टूटा हुआ दिल और उसकी बेबसी भी काफी भावुक कर गई।
सीएन मलहोत्रा, रिटायर्ड बैंक अधिकारी
पानी टपक रहा था बीच नाटक में
नाटक के सेट में वैसे तो कलाकार काफी सहज रूप से अदाकारी कर रहे थे, लेकिन बीच नाटक में स्टेज पर पानी पड़ने लगा। शनिवार हुई बारिश की वजह से नाटक के बीच पानी निरंतर टपकता रहा जिससे हादसा होने का डर भी था।