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मोबाइल की 'टिक टॉक' के चक्कर में पढ़ाई भूल एक्टर बने स्टूडेंट, पैरेंट्स और टीचर्स की उड़ी नींद

Wed, 03 Oct 2018 09:38 AM IST
रीतिका पठानियां, अमर उजाला, पंचकूला
रीतिका पठानियां, अमर उजाला, पंचकूला Updated Wed, 03 Oct 2018 09:38 AM IST
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मोबाइल यूज - फोटो : SELF
सोशल मीडिया पर वायरल हो रही टिक टॉक व वीगो एप की वीडियो ने पैरेंट्स ही नहीं शिक्षकों की भी नींद उड़ा दी है, पढ़ाई भूलकर स्टूडेंट्स एक्टर बन गए हैं। फेमस होने के चक्कर में बच्चे स्कूल में मोबाइल लेकर पहुंचते हैं और वीडियो शूट कर सोशल मीडिया पर अपलोड कर रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर कुछ छात्रों ने बताया कि टिक टॉक आजकल का लेटेस्ट ट्रेंड है।
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इससे हम आसानी से फेमस हो सकते हैं और फिल्मी दुनिया में अपनी पहचान बना सकते हैं। क्योंकि बहुत से स्टूडेंट्स के पास टैलेंट तो होता है लेकिन मां बाप के डर से या सही मंच का पता न हो पाने के कारण अपनी प्रतिभा नहीं दिखा पाते। ऐसे छात्र सोशल मीडिया को मंच बनाते हैं। स्कूल परिसर में फोन अलाउड न होने की बात पूछे जाने पर स्टूडेंट्स ने बताया कि उनके परिजन उन्हें समय नहीं देते और बंदिशें लगाते हैं।
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फोन के साथ ही ज्यादातर समय हम बिताते हैं। सोशल मीडिया के जरिए हमारे मित्र बनते हैं और टिकटॉक व वीगो एप के माध्यम से पता चलता है कि हम में भी टैलेंट है कुछ अलग कर दिखाने का। रही बात स्कूल में फोन लाने की तो फ्री टाइम में ही इस्तेमाल करते हैं।
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क्या है टिक टॉक एप
टिक टॉक एक एप है, जिसके माध्यम से युवा वर्ग व स्टूडेंट्स अलग- अलग गानों व डॉयलॉग या फिर चैलेंज देने की वीडियो बनाकर शेयर कर रहे हैं। इसके माध्यम से लोगों के वीडियो पर हजारों लाखों लाइक व कमेंट्स आते हैं। मुख्य तौर पर युवा इस एप का प्रयोग फेमस होने के लिए कर रहे है। इस एप को पहले म्यूजिकली एप का नाम दिया गया था। माना जाता है कि जो इस एप पर वीडियो अपलोड कर अधिक लाइक व फैन फॉलोइंग पाता है, उसे पैसे मिलते हैं। जबकि कुछ युवाओं ने इस बात को झूठ कहा है। स्मार्टफोन में इस्तेमाल की जाने वाली टिक टॉक एप की तरह वीगो व अन्य कई एप भी प्रचलन में हैं।

एप होनी चाहिए बैन: प्रीति

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mobile user
सेक्टर 20 निवासी प्रीति आहुजा के अनुसार परिजनों को अपने बच्चों पर ध्यान देना चाहिए। टिकटॉक बच्चों के लिए नहीं है, उन्हें अपनी पढ़ाई में ध्यान देना चाहिए। गवर्नमेंट को ऐसी एप ही बंद करा देनी चाहिए, जिससे बच्चों की एकाग्रता भंग होती हो। परिजनों को भी नजर रखनी चाहिए। बालिग होने से पहले बच्चों को मोबाइल से दूर रखना चाहिए। टीचर भी स्कूल में बच्चों के बैग चेक करें और फोन पकडे़ जाने पर सीधा परिजनों को नोटिस दें ताकि उनके ध्यान में भी बात रहे।

दोनों झाड़ रहे जिम्मेदारियों से पल्ला: ऊषा शर्मा
पंजाब एजुकेशन शिक्षा बोर्ड की रिटायर अधिकारी ऊषा शर्मा के अनुसार गलती परिजनों और शिक्षकों दोनों की है। दोनों ही अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं। अगर बच्चे पैरेंट्स के कंट्रोल में ही न हों तो टीचर की क्या गलती । परिजन ही अपने बच्चों को अच्छी आदतें अपनाने की सीख देते हैं। जब बच्चे न मानें ते उन्हें समझ लेना चाहिए कि वह एक जिम्मेदार परिजन नहीं।

फोन के कुछ अच्छे इस्तेमाल भी: ज्योति
ताऊ देवी लाल स्टेडियम की जिला खेल एवं युवा कार्यक्रम अधिकारी ज्योति रानी का कहना है कि बच्चे स्कूल से लेट हो जाएं तो परिजन परेशान हो उठते हैं। इमरजेंसी में बच्चे परिजनों को सूचित कर सकें, इसलिए फोन दिया जाता है। यह शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करें कि बच्चे पढ़ाई के समय मोबाइल का इस्तेमाल न करें। पैरेंट्स की मुश्किल ये भी है कि किसी चीज के लिए बच्चों को मना करो तो वह सुसाइड जैसे कदम उठा लेते हैं।

परिजन बच्चों की जगह देते हैं पार्टियों को महत्व: लिली बाबा
पूर्व पार्षद लिली बाबा के अनुसार परिजनों को अपने बच्चों को अनुशासन व बातचीत करने का ढंग सिखाना चाहिए। जब तक बच्चे बडे़ नहीं हो जाते, मां बाप ही बच्चों की केयर करते हैं। बच्चों की हर जिद को पूरा करना सही नहीं है क्योंकि बच्चों की ज्यादातर जिद उनके लिए ही नुकसानदायक हो सकती हैं। आजकल के परिजन कामकाज में व्यस्त रहते हैं और बच्चों को समय नहीं देते हैं। जब फ्री हो जाते हैं तो पार्टियों में बिजी हो जाते हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि स्टूडेंट्स की नाजुक उम्र में उनके साथ समय व्यतीत करना कितना जरूरी है।

बच्चों को टार्चर करना मतलब उन्हें खो देना: शारदा

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सेक्टर सात निवासी शारदा के अनुसार आजकल परिजन यदि बच्चों को मना करें तो वह उसे टार्चर समझते हैं और मरने की धमकी देते हैं। इसलिए परिजन बच्चों को फोन दे देते हैं। ताकि वह जिद में कोई गलत कदम न उठा लें। सरकार को ऐसे एप बंद कर देने चाहिए, जिससे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो।

हमारे स्कूल में कई बार स्टूडेंट्स फोन के साथ पकड़े जाते हैं। हम अभिभावकों को भी सूचित करते हैं। जब बच्चों से फोन की बात पूछी जाती है तो वह पार्ट टाइम जॉब का बहाना लगाते हैं। टीचर्स को निर्देश दिया है कि स्टूडेंट्स की चेकिंग की जानी चाहिए।
- मोहिंदर सिंह चौहान, प्रिंसिपल, सेक्टर-19, गवर्नमेंट स्कूल

स्कूल में फोन अलाउड नहीं है. समय समय पर चेकिंग की जाती है। जब दोषी स्टूडेंट्स पर कार्रवाई की जाए तो परिजन शिकायत करते हैं और कहते हैं हमारा एक ही बच्चा है अगर कुछ कर ले तो। जब कुछ गलत हो जाए तो कहते हैं, टीचर क्या कर रहे थे। जबकि टीचर कुछ कहे तो स्टूडेंट जान से मारने की धमकी देते हैं। कुछ दिन पहले ही एक लड़की के पास फोन पाया गया। जब छुट्टी हुई तो कुछ लड़के स्कूल के बाहर टीचर को जान से मारने की धमकी देने लगे। परिजनों को बताया तो वह भी लड़की का पक्ष लेने लगे। ऐसे में शिक्षक करें भी तो क्या।
- सुनीता नयन, उप जिलाशिक्षा अधिकारी, पंचकूला

अभी तक हमारी जानकारी में ऐसा कुछ नही। पहले ही स्कूल में फोन लेकर आने की अनुमति नहीं। मैं जल्द ही परिजनों व शिक्षकों से मीटिंग करूंगा। स्कूल में स्टूडेंट्स के बैग चेक करने के आदेश जारी करता हूं ताकि स्टूडेंट्स स्कूल में फोन लेकर यदि आएं तो पकड़े जाएं।
- हरजिन्द्र सैनी, जिला शिक्षा अधिकारी , पंचकूला

 
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