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Chandigarh News: लुधियाना में डॉग्स स्टरलाइजेशन पर करोड़ों खर्च, आवारा कुत्तों का आतंक जारी
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-1 लाख 15 हजार कुत्तों की नसबंदी के बावजूद काटने की घटनाओं में कमी नहीं-- -
लुधियाना। नगर निगम की ओर से पिछले दस वर्षों से आवारा कुत्तों की नसबंदी (डॉग्स स्टरलाइजेशन) पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। निगम के आंकड़ों के मुताबिक अब तक 1 लाख 15 हजार से अधिक कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है, जिस पर करीब 14 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
हालांकि, शहरवासियों को राहत नहीं मिली है। मॉडल ग्राम इलाके में एक कुत्तिया ने हाल ही में 35 से अधिक लोगों को काट दिया, जिससे निगम के दावों पर सवाल उठे हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि कुत्तिया के बच्चों को कोई उठा ले गया था, जिसके बाद वह आक्रामक हो गई। नगर निगम के हेल्थ अफसर विपल मल्होत्रा ने बताया कि नसबंदी का काम ठेके के तहत एक निजी कंपनी के माध्यम से किया जाता है और प्रति कुत्ता 1200 रुपये खर्च किए जाते हैं। हालांकि, वार्ड या जोनवार विस्तृत रिकॉर्ड नहीं रखा गया है, केवल उस क्षेत्र की एंट्री की जाती है जहां गाड़ी जाती है।
समाजसेवी कुमार गौरव ने कहा कि शहरवासियों को आवारा कुत्तों और अन्य पशुओं से लगातार परेशानी हो रही है। उनका कहना है कि नगर निगम की हेल्थ ब्रांच जिम्मेदार है, लेकिन वर्षों से कोई ठोस समाधान नहीं निकला। नगर निगम ने पहले रोजाना 1200–1500 कुत्तों की नसबंदी की, जो अब घटकर 500–600 रह गई है। निगम के आंकड़ों और मॉनिटरिंग में कमी के कारण शहरवासियों का डर बना हुआ है।
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शहरवासियों को सुझाव
आवारा कुत्तों या खतरे में फंसे बच्चों की जानकारी के लिए 1098 या नगर निगम हेल्थ ब्रांच से संपर्क करें। इस पूरी स्थिति से स्पष्ट है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद आवारा कुत्तों की समस्या अभी भी नगर निगम के नियंत्रण से बाहर है।
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लुधियाना। नगर निगम की ओर से पिछले दस वर्षों से आवारा कुत्तों की नसबंदी (डॉग्स स्टरलाइजेशन) पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। निगम के आंकड़ों के मुताबिक अब तक 1 लाख 15 हजार से अधिक कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है, जिस पर करीब 14 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
हालांकि, शहरवासियों को राहत नहीं मिली है। मॉडल ग्राम इलाके में एक कुत्तिया ने हाल ही में 35 से अधिक लोगों को काट दिया, जिससे निगम के दावों पर सवाल उठे हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि कुत्तिया के बच्चों को कोई उठा ले गया था, जिसके बाद वह आक्रामक हो गई। नगर निगम के हेल्थ अफसर विपल मल्होत्रा ने बताया कि नसबंदी का काम ठेके के तहत एक निजी कंपनी के माध्यम से किया जाता है और प्रति कुत्ता 1200 रुपये खर्च किए जाते हैं। हालांकि, वार्ड या जोनवार विस्तृत रिकॉर्ड नहीं रखा गया है, केवल उस क्षेत्र की एंट्री की जाती है जहां गाड़ी जाती है।
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समाजसेवी कुमार गौरव ने कहा कि शहरवासियों को आवारा कुत्तों और अन्य पशुओं से लगातार परेशानी हो रही है। उनका कहना है कि नगर निगम की हेल्थ ब्रांच जिम्मेदार है, लेकिन वर्षों से कोई ठोस समाधान नहीं निकला। नगर निगम ने पहले रोजाना 1200–1500 कुत्तों की नसबंदी की, जो अब घटकर 500–600 रह गई है। निगम के आंकड़ों और मॉनिटरिंग में कमी के कारण शहरवासियों का डर बना हुआ है।
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शहरवासियों को सुझाव
आवारा कुत्तों या खतरे में फंसे बच्चों की जानकारी के लिए 1098 या नगर निगम हेल्थ ब्रांच से संपर्क करें। इस पूरी स्थिति से स्पष्ट है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद आवारा कुत्तों की समस्या अभी भी नगर निगम के नियंत्रण से बाहर है।