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हाईकोर्ट: 15 हजार रुपये के लिए अटका वैवाहिक समझौता: चार वकीलों ने अपनी जेब से जुटाई रकम, जानें पूरा मामला

Tue, 22 Sep 2026 08:57 PM IST
शाहिल शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़ Published by: शाहिल शर्मा Updated Tue, 22 Sep 2026 08:57 PM IST
सार

पति-पत्नी के वैवाहिक समझौते में 15 हजार रुपये कम पड़ रहे थे जिसे वकीलों ने अपनी जेब से जुटाकर ऑनलाइन पति को ट्रांसफर किया जिसके बाद दोनों का तलाक हो गया। 

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Lawyers facilitated a couple divorce by providing financial assistance
वकीलों ने आर्थिक मदद देकर करवाया तलाक - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में एक वैवाहिक विवाद का समझौता 15 हजार रुपये की कमी के कारण अटक गया था। पति तीन लाख रुपये देने को तैयार था जबकि पत्नी 3.15 लाख रुपये चाहती थी। पति ने आर्थिक मजबूरी बताई और कहा कि उसे यह रकम भी उधार लेनी पड़ेगी। अदालत में मौजूद चार अधिवक्ताओं ने अपनी ओर से 15 हजार रुपये जुटाकर समझौते का रास्ता साफ किया।
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पति ने 15 हजार रुपये जुटाने में जताई असमर्थता
यह मामला पत्नी की उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें उसने पति की तलाक याचिका को मूनक की पारिवारिक अदालत से लुधियाना स्थानांतरित करने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान दोनों पक्ष वैवाहिक विवाद खत्म करने पर सहमत हुए। अदालत को बताया गया कि पति-पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ते के तौर पर तीन लाख रुपये देने को तैयार है। वह फर्नीचर भी वापस करने के लिए सहमत था। बातचीत के दौरान पत्नी ने बताया कि उसके कुछ सोने के आभूषण अभी पति के पास हैं। उन्हें लौटाया नहीं गया था। दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की बातचीत के बाद पत्नी 3.15 लाख रुपये में पूर्ण और अंतिम समझौते के लिए तैयार हो गई। हालांकि, पति ने अतिरिक्त 15 हजार रुपये देने में असमर्थता जताई। उसने बताया कि तीन लाख रुपये की व्यवस्था भी उसे उधार लेकर करनी होगी।
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चार वकीलों ने अपने जेब से जुटाए 15 हजार
इसके बाद अदालत में मौजूद अधिवक्ताओं ने इस मामले में पहल की। अधिवक्ता सचिन जैन ने पांच हजार रुपये देने की पेशकश की। उन्होंने बताया कि वह सत्य फाउंडेशन से जुड़े हैं, जो जरूरतमंदों और वृद्धाश्रमों की मदद करती है। अधिवक्ता राहुल राठौर ने भी पांच हजार रुपये का योगदान दिया। चंद्रकांत ठाकुर ने 2500 रुपये और राज कुमार ने भी 2500 रुपये देने की पेशकश की। इस तरह चारों अधिवक्ताओं ने मिलकर 15 हजार रुपये की कमी पूरी कर दी।

यह रकम डिजिटल माध्यम से पति को भेजी गई और उसी दिन पत्नी को हस्तांतरित कर दी गई। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अधिवक्ताओं का यह योगदान पूरी तरह स्वैच्छिक था। इसका उद्देश्य केवल दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने में मदद करना था। अदालत ने समझौते की शर्तों को लिखित रूप में दर्ज कर रिकॉर्ड पर ले लिया।

याचिका का निपटारा
पत्नी ने अपनी स्थानांतरण याचिका पर आगे सुनवाई नहीं करने की बात कही। हाईकोर्ट ने याचिका को आगे नहीं चलाने के आधार पर खारिज कर दिया। अदालत ने समझौते की प्रति मूनक की पारिवारिक अदालत को भेजने का निर्देश दिया। पति की हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक याचिका वहां लंबित है। अदालत ने दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं और रकम जुटाने वाले चारों वकीलों की पहल की सराहना की।
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