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मिले आजादी से पहले के यार.. पेक कैंपस हो गया गुलजार

Sun, 16 Feb 2020 01:54 AM IST
Panchkula bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Sun, 16 Feb 2020 01:54 AM IST
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Meet the pre-independence man .. Pek campus becomes Gulzar
एलुमनी मीट
चंडीगढ़। पंजाब इंजीनियर कॉलेज (पेक) में शनिवार को खासी रौनक और चहल पहल थी। रौनक के पीछे खास वजह थी पेक के इतिहास में पहली बार आयोजित एलुमनी मीट की। इस दौरान 1943 से लेकर 2005 बैच के एलुमनी ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में सबसे चर्चित रहे पेक के सबसे पुराने एलुमनी 1943 में ग्रेजुएट 97 वर्षीय बिक्रम सिंह गरेवाल। गरेवाल ने लाहौर स्थित मुगलपुरा इंजीनियरिंग कॉलेज से पासआउट थे। पेक डायरेक्टर धीरज सांघी और अन्य स्टाफ ने एलुमनी का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने एलुमनी को डायमंड, गोल्डन, सिल्वर, कोरल और क्रिस्टल जुबली पूरी करने के लिए बधाई दी।
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डीन एलुमनी डॉ. दिव्या बंसल ने बताया कि ‘ग्लोबल एलुमनी मीट-होमकमिंग-20’ के लिए परिवार के साथ 1000 रजिस्ट्रेशन की गई। पेक की ओर से इतने पुराने एलुमनी से संपर्क कर उनको एक प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए पांच हफ्तों का समय लगा। इस मौके पर हर जगह विभिन्न क्षेत्रों से रिटायर्ड सीनियर सिटीजन युवाओं के साथ अपना तजुर्बा शेयर करते दिखाई रहे थे। वहीं एलुमनी ने अपने क्लासमेट्स के साथ अपने कॉलेज और हॉस्टल के दिनों को याद किया और अपने विभाग का दौरा भी किया। इस मौके पर मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया, यूएस, नेपाल, कनाडा और लंदन आदि जगहों से एलुमनी ने परिवार के साथ कार्यक्रम में हिस्सा लिया। एलुमनी के लिए कई फन गतिविधियों का आयोजन भी करवाया गया।
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97 वर्षीय एलुमनी ने जूनियर्स के साथ सेलिब्रेट किया जन्मदिन
पेक ने अपने सबसे पुराने एलुमनी 1943 में ग्रेजुएट 97 वर्षीय बिक्रम सिंह गरेवाल का स्वागत किया। बिक्रम सिंह ने अपने जूनियर्स और युवा इंजीनियरिंग विद्यार्थियों के साथ जन्मदिवस सेलिब्रेट किया। उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों की यादों को भी साझा किया। बिक्रम सिंह 1971 में पटियाला के चीफ इंजीनियर बने थे और 1981 में सेवानिवृत्त हुए। वह पटियाला में रहते हैं।
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नीलम में ब्लैक में टिकट लेकर देखते थे फिल्म
1970 बैच के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के रणधीर और मैटालर्जी इंजीनियरिंग के रोशन लाल अग्रवाल ने कहा कि वे चंडीगढ़ पेक के छात्रावास में रहते थे। आज के चंडीगढ़ में बहुत ज्यादा बदलाव आ गया है। हमारे समय में सिर्फ नीलम सिनेमा ही होता था। किसी भी फिल्म के लिए टिकट लेना उस समय थोड़ा मुश्किल होता था। उस दौरान हमने नीलम सिनेमा में ब्लैक में टिकटें लेकर फिल्में देखी हैं। इसके बाद हमारे प्रोफेसर की तरफ से इंजीनियरिंग विद्यार्थियों के लिए इंजीनियरिंग कॉलेज स्टूडेंट्स एसोसिएशन बनवा दिया गया था, जिसके माध्यम से हमें सिनेमा की टिकट आसानी से उपलब्ध हो जाती थी।
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