16 राज्यों की 30 कवयित्रियां अमर उजाला से जुड़ीं, बोलीं- हिंदी हैं हम, वतन है हिंदुस्तान हमारा
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‘हिंदी भावों को व्यक्त करने का सरल और सशक्त माध्यम है। हिंदी के विस्तार के लिए जरूरी है कि इसे सरल और सुगम बनाया जाए, कठिन शब्दों से बचा जाए। हिंदी में भारी भरकम शब्दों का प्रयोग न कर इसे हर जन के लिए सुलभ बनाना होगा, तभी यह जन-जन की भाषा बनेगी।’उक्त विचार अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान के तहत शुक्रवार शाम को आयोजित ऑनलाइन विचार गोष्ठी में ‘महिला काव्य मंच’ की कवयित्रियों ने व्यक्त किए।
मंच की महिलाओं ने हिंदी के विस्तार के समर्थन में काव्यात्मक शैली में विचार रखे। 16 राज्यों की 30 कवयित्रियों ने डेढ़ घंटे से ज्यादा समय में स्वरचित गीत, कविता और गजल के जरिये विचार व्यक्त कर हिंदी को रोजगारपरक बनाने का आह्वान किया। कवयित्रियों ने हिंदी हैं हम वतन है हिंदुस्तान हमारा... का नारा देते हुए गीत और कविता के जरिये हिंदी के वैश्विक उत्थान को दर्शाया। महिला काव्य मंच के संस्थापक नरेश नाज ने हिंदी के प्रचार-प्रचार के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता जताई। विचार गोष्ठी में हरियाणा, उत्तर-प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों की कवयित्रियों ने भाग लिया।
2017 में किया महिला काव्य मंच का गठन
महिला काव्य मंच की 28 राज्यों और 15 देशों में शाखाएं हैं। सेवानिवृत्त आईबी अधिकारी नरेश नाज ने इस मंच का गठन 2017 में किया था। सभी महिला सदस्य बतौर शौकिया काव्य रचना करती हैं। मंच की राष्ट्रीय अध्यक्ष पटियाला निवासी मधु मधुमन हैं। उपाध्यक्ष रोहतक निवासी वीना कौशिक ने बताया कि मंच का उद्देश्य कविता लिखने वाली महिलाओं को मंच प्रदान करना है। मंच का ध्येय वाक्य ही ‘मन से मंच तक’ है।
इन्होंने रखे विचार
नरेश नाज (पंजाब), मधु मधुमन (पंजाब), वंदना मलिक (हरियाणा), डॉ. अर्चना पाण्डेय (तेलंगाना), राशि श्रीवास्तव (चंडीगढ़), बबीता ओबेराय (हिमाचल), बेनु सतीशकांत (पंजाब), डॉ. अदिति गुलेरी (हिमाचल), डॉ. विनय गौड़ (हरियाणा), उर्वशी अग्रवाल उर्वी (दिल्ली), बीना कौशिक (हरियाणा), डॉ. ज्योतिराज (हरियाणा), डॉ. प्रीति खरे (मध्य प्रदेश), डॉ. ज्योत्सना सिंह (मध्यप्रदेश), डॉ. रुनु बरुवा (असम), डॉ. कमल प्रभा कपानी (उड़ीसा), सुमन पाल (जम्मू कश्मीर), डॉ. पूनम गुप्त (पंजाब), डॉ. मंजू रुस्तगी, ममता सिंह (कर्नाटक), सारिका भूषण (झारखंड), शारदा मित्तल (चंडीगढ़), मोना बग्गा (झारखंड), सौम्या दुआ (उत्तराखंड), ममता किरण (दिल्ली), मनीबेन द्विवेदी (उत्तर प्रदेश), सुमिता धर बासु ठाकुर (त्रिपुरा), आरती सिंह (पश्चिम बंगाल), डॉ. सुमन दहिया (राजस्थान), ऋतु कौशिक (हरियाणा) और शालू गुप्ता (हरियाणा)।
कुछ कवयित्रियों की कविताएं
(1) जब तक मां पेट नहीं भरेगी
आया के भरोसे पलेंगे हम
तब तक कैसे जागेगी मातृ भक्ति
कैसे राष्ट्र भक्त बनेंगे हम
- डा. सुमन दहिया, जयपुर
(2) हिंद की हिंदी
माथे की बिंदी
जो लिखा जाता
वही पढ़ा जाता
यह हिंद का ताज है,
यह हिंद का मान है
- आरती सिंह
(3) नजरें सहानुभूति की मुझ पर न डालिए
बस रस्म निभाने की रस्म मत निभाइए
मेरे ही बोल थे जो कहा पहली बार मां
इस बात को न दिल से कभी भी भुलाइए
- ममता किरण, संरक्षक, दिल्ली इकाई।
(4) जुबान मेरे देश की जुबान बड़ी प्यारी है
मेरी हिंदी की शोभा सारे जग में न्यारी है
- वंदना हिना मलिक, महासचिव, हरियाणा
(5) हमको अपनी प्यारी भाषा हिंदी से तो प्यार है
हिंदी ही तो कोमल मन के भावों का उद्गार है
हिंदी में हम सभी है करते निज हृदय की अभिव्यक्ति
हिंदी के सुंदर शब्दों में करते व्यक्त विचार हैं
- मणि बेन द्विवेदी, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
(6) मैं शबरी हूं राम की चखती रहती बेर
तकती रहती रास्ता हुई कहां पर देर
‘उर्वी’ के मस्तक पे बिंदी खूब सजे
साड़ी सा परिधान हमारी हिंदी है
- डॉ. उर्वशी, ‘उर्वी’
(7) गर हिंदी की अपनी संतान
करे ना हिन्दी का मान सम्मान
हो नहीं सकता तब तक देश
जाति और धर्म का कल्याण
- डॉ अदिति गुलेरी
(8) क्या डालेगा फूट यह घर कबीर का
फू ट डाल ही नहीं सकता रसखान से मीरा का
तकरार नहीं हो सकती तुलसी से मीर की
राम-रहीम में भेद नहीं करा सकता जमीर भी।
- डॉ. कमल प्रभा कपानी