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रक्षा मंत्रालय नहीं मान रहा आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल के फैसले
अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 13 Dec 2013 01:54 AM IST
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आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) के फैसले को रक्षा मंत्रालय कोई तवज्जो नहीं दे रहा। इससे तीनों सेनाओं के प्रताड़ित फौजियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इससे ट्रिब्यूनल की ताकत बढ़ाने की मांग पकड़ने लगी है। चंडीगढ़ एएफटी बार एसोसिएशन के पूर्व प्रेसिडेंट मेजर नवदीप सिंह ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर एएफटी के अधिकार क्षेत्र के विस्तार की मांग की है।
याचिका के तहत एएफटी के पास अपने फैसले को लागू कराने की पावर भी होनी चाहिए। चीफ जस्टिस संजय किशन कौल एवं जस्टिस एजी मसीह पर आधारित खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने रक्षा मंत्रालय, हरियाणा, चंडीगढ़ प्रशासन और आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी।
इससे पहले भी एडवोकेट मेजर नवदीप सिंह की एक जनहित याचिका पर ट्रिब्यूनल के संबंध में हाईकोर्ट ने एतिहासिक फैसला दिया था। एएफटी की कार्य पद्धति संचालित करने की बागडोर रक्षा मंत्रालय के पास थी। इस प्रक्रिया को मेजर सिंह ने हाईकोर्ट में चैलेंज किया और हाईकोर्ट ने इसे रक्षा मंत्रालय से हटाकर कानून मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में सौंप दिया था। जनहित याचिका में बताया गया कि ट्रिब्यूनल के कई फैसलों को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा हुआ है। इसके बावजूद उन फैसलों को रक्षा मंत्रालय ने मानने से इनकार कर दिया है।
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एएफटी के पास अभी इतने अधिकार नहीं है कि वे अपने फैसलों को मनवा सके। याचिका में बताया गया है कि एएफटी के करीब तीन हजार से ज्यादा ऐसे केस हैं, जिन्हें गवर्नमेंट पॉलिसी के विरुद्ध बताकर अनुपालन करने से मना कर दिया। इससे उन फौजियों को सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ रही है, जो ट्रिब्यूनल से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इंसाफ के लिए चक्कर लगाते रहे। याचिका के मुताबिक एएफटी के ज्यूडिशियल मेंबर्स को घर मुहैया नहीं करवाए जा रहे। इससे ज्यूडिशियल मेंबर्स को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जिस प्रकार से हाईकोर्ट के जज को घर मुहैया करवाए जाते हैं, ठीक उसी प्रकार उन्हें भी उपलब्ध कराना होगा। यहां तक एएफटी के सरकारी वकीलों को समय पर सेंट्रल गवर्नमेंट की ओर से रुपया मुहैया नहीं कराया जाता।
सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसलों को माना, लेकिन मंत्रालय ने नहीं
1. बिग्रेडियर एके भूटानी बनाम यूओआई : बार्डर पर तैनात आर्मी आफिसर को काउंटर-इन्सरजेंसी अलाउंस देने का मामला
2. कर्नल संजीव सहगल बनाम यूओआई : आर्मी मेडिकल कोर को कैरियर प्रोग्रेसन स्कीम का मामला
3. बिग्रेडियर टीएस सेखो बनाम यूओआई : विदेश दौरे के दौरान मेडिकल इमरजेंसी में मेडिकल की अदायगी के संबंध में
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याचिका के तहत एएफटी के पास अपने फैसले को लागू कराने की पावर भी होनी चाहिए। चीफ जस्टिस संजय किशन कौल एवं जस्टिस एजी मसीह पर आधारित खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने रक्षा मंत्रालय, हरियाणा, चंडीगढ़ प्रशासन और आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी।
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इससे पहले भी एडवोकेट मेजर नवदीप सिंह की एक जनहित याचिका पर ट्रिब्यूनल के संबंध में हाईकोर्ट ने एतिहासिक फैसला दिया था। एएफटी की कार्य पद्धति संचालित करने की बागडोर रक्षा मंत्रालय के पास थी। इस प्रक्रिया को मेजर सिंह ने हाईकोर्ट में चैलेंज किया और हाईकोर्ट ने इसे रक्षा मंत्रालय से हटाकर कानून मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में सौंप दिया था। जनहित याचिका में बताया गया कि ट्रिब्यूनल के कई फैसलों को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा हुआ है। इसके बावजूद उन फैसलों को रक्षा मंत्रालय ने मानने से इनकार कर दिया है।
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एएफटी के पास अभी इतने अधिकार नहीं है कि वे अपने फैसलों को मनवा सके। याचिका में बताया गया है कि एएफटी के करीब तीन हजार से ज्यादा ऐसे केस हैं, जिन्हें गवर्नमेंट पॉलिसी के विरुद्ध बताकर अनुपालन करने से मना कर दिया। इससे उन फौजियों को सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ रही है, जो ट्रिब्यूनल से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इंसाफ के लिए चक्कर लगाते रहे। याचिका के मुताबिक एएफटी के ज्यूडिशियल मेंबर्स को घर मुहैया नहीं करवाए जा रहे। इससे ज्यूडिशियल मेंबर्स को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जिस प्रकार से हाईकोर्ट के जज को घर मुहैया करवाए जाते हैं, ठीक उसी प्रकार उन्हें भी उपलब्ध कराना होगा। यहां तक एएफटी के सरकारी वकीलों को समय पर सेंट्रल गवर्नमेंट की ओर से रुपया मुहैया नहीं कराया जाता।
सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसलों को माना, लेकिन मंत्रालय ने नहीं
1. बिग्रेडियर एके भूटानी बनाम यूओआई : बार्डर पर तैनात आर्मी आफिसर को काउंटर-इन्सरजेंसी अलाउंस देने का मामला
2. कर्नल संजीव सहगल बनाम यूओआई : आर्मी मेडिकल कोर को कैरियर प्रोग्रेसन स्कीम का मामला
3. बिग्रेडियर टीएस सेखो बनाम यूओआई : विदेश दौरे के दौरान मेडिकल इमरजेंसी में मेडिकल की अदायगी के संबंध में