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पंजाब के वोटरों का बदलता रहता है मिजाज
अनिल भारद्वाज/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 06 Apr 2014 01:19 PM IST
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लोकसभा चुनाव में अधिकतर मौकों पर पंजाब के वोटरों की पहली पसंद कांग्रेस विरोधी दल रहे हैं। बीते दस लोकसभा चुनाव की बात करें तो तीन मौकों पर कांग्रेस, जबकि 7 बार इसके विरोधी दलों की बढ़त रही।
वहीं, विधानसभा चुनावों के दौरान प्रदेश के मतदाता हर चुनाव में अपना मन बदलते रहे। केवल 2012 का चुनाव इसका अपवाद रहा। इससे पहले 1977 से 2007 तक एक बार शिअद तो दूसरी बार कांग्रेस की सरकार बनती रही। केवल 2012 ही ऐसा रहा, जब अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार लगातार दूसरी बार सत्ता में आई।
लोकसभा चुनाव का लेखा-जोखा
इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया। शिअद, भारतीय लोकदल और माकपा जीत हासिल करने में कामयाब रहे। 1980 में दृश्य पलटा और कांग्रेस ने शिअद का लगभग सफाया कर दिया। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद 1985 में शिअद ने कांग्रेस से बढ़त ली।
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1989 में शिअद (बादल) ने आम चुनाव का बायकॉट किया, तो अकाली दल मान ने हैरानीजनक जीत दर्ज की। 1992 में एक बार फिर शिअद (बादल) ने चुनाव का बहिष्कार किया और कांग्रेस स्वीप करने में कामयाब रही।
1996 में शिअद ने बसपा से चुनावी समझौता किया और कांग्रेस को पटखनी दी। 1998, 1999 तथा 2004 में अकाली-भाजपा गठबंधन, कांग्रेस से कहीं आगे रहा। फिर 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकाली-भाजपा गठबंधन को पछाड़ने में कामयाबी हासिल की।
विधानसभा चुनाव एक नजर
इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में अकाली-जनता गठबंधन ने कांग्रेस का सफाया करते हुए सरकार बनाई। 1980 में कांग्रेस को बहुमत मिला। फिर 1985 में शिअद को जबरदस्त सफलता हासिल हुई।
1992 में शिअद (बादल) ने विधानसभा चुनाव का बहिष्कार किया और बहुत ही कम मतदान के बीच कांग्रेस भारी बहुमत से सरकार बनाने में सफल रही। 1997 में शिअद को जबरदस्त सफलता मिली, तो 2002 में बादल-टोहड़ा के अलगाव के बीच कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हुई।
2007 में फिर चुनावी परिदृश्य बदला और सरकार अकाली-भाजपा गठबंधन की बन गई। 2012 ने हर बार सरकार बदलने के ट्रेंड को ही बदल दिया तथा फिर से अकाली-भाजपा गठबंधन सत्ता में आ गया।
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वहीं, विधानसभा चुनावों के दौरान प्रदेश के मतदाता हर चुनाव में अपना मन बदलते रहे। केवल 2012 का चुनाव इसका अपवाद रहा। इससे पहले 1977 से 2007 तक एक बार शिअद तो दूसरी बार कांग्रेस की सरकार बनती रही। केवल 2012 ही ऐसा रहा, जब अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार लगातार दूसरी बार सत्ता में आई।
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लोकसभा चुनाव का लेखा-जोखा
इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया। शिअद, भारतीय लोकदल और माकपा जीत हासिल करने में कामयाब रहे। 1980 में दृश्य पलटा और कांग्रेस ने शिअद का लगभग सफाया कर दिया। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद 1985 में शिअद ने कांग्रेस से बढ़त ली।
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1989 में शिअद (बादल) ने आम चुनाव का बायकॉट किया, तो अकाली दल मान ने हैरानीजनक जीत दर्ज की। 1992 में एक बार फिर शिअद (बादल) ने चुनाव का बहिष्कार किया और कांग्रेस स्वीप करने में कामयाब रही।
1996 में शिअद ने बसपा से चुनावी समझौता किया और कांग्रेस को पटखनी दी। 1998, 1999 तथा 2004 में अकाली-भाजपा गठबंधन, कांग्रेस से कहीं आगे रहा। फिर 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकाली-भाजपा गठबंधन को पछाड़ने में कामयाबी हासिल की।
विधानसभा चुनाव एक नजर
इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में अकाली-जनता गठबंधन ने कांग्रेस का सफाया करते हुए सरकार बनाई। 1980 में कांग्रेस को बहुमत मिला। फिर 1985 में शिअद को जबरदस्त सफलता हासिल हुई।
1992 में शिअद (बादल) ने विधानसभा चुनाव का बहिष्कार किया और बहुत ही कम मतदान के बीच कांग्रेस भारी बहुमत से सरकार बनाने में सफल रही। 1997 में शिअद को जबरदस्त सफलता मिली, तो 2002 में बादल-टोहड़ा के अलगाव के बीच कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हुई।
2007 में फिर चुनावी परिदृश्य बदला और सरकार अकाली-भाजपा गठबंधन की बन गई। 2012 ने हर बार सरकार बदलने के ट्रेंड को ही बदल दिया तथा फिर से अकाली-भाजपा गठबंधन सत्ता में आ गया।