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चुनाव प्रचार से गायब हुए पंजाब-हरियाणा के मुद्दे
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 06 Apr 2014 10:58 AM IST
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हरियाणा में चुनाव प्रचार आठ अप्रैल को समाप्त हो जाएगा। अब तक प्रचार में किसी भी दल ने पंजाब-हरियाणा से जुड़े अंतरराज्यीय मामलों को मुद्दा नहीं बनाया। सतलुज यमुना लिंक नहर, चंडीगढ़ को पंजाब को देने और हिंदी भाषी 107 गांव हरियाणा को देने, हरियाणा का अलग हाईकोर्ट बनाने जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल चुप हैं।
हरियाणा और पंजाब के बीच सबसे बड़ा मसला सतलुज-यमुना लिंक नहर का है। इस नहर के जरिए हरियाणा को अपना बकाया पानी भाखड़ा से मिलना है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2004 के आखिर में फैसला दिया था कि एक साल के भीतर पंजाब सरकार इस नहर को बनाए। अगर पंजाब सरकार नहर नहीं बनाती तो केंद्र अपने पैसे से यह नहर बनाएगा। मगर नहर आज तक नहीं बनी। उलटा, जो नहर बनी थी, वह लगभग खत्म हो चुकी है।
मार्च, 2005 में हरियाणा से इनेलो की सरकार चली गई और तब से कांग्रेस सरकार चली आ रही है। केंद्र में मई, 2004 से यूपीए सरकार चली आ रही है। जब यह फैसला आया था तब पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री थे। उन्होंने पंजाब विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर सारे जल समझौते रद कर दिए।
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कांग्रेस एसवाईएल मुद्दे को सुलझाने के लिए पूरी तरह गंभीर है। पंजाब सरकार के प्रस्ताव पर राष्ट्रपति संदर्भ का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। अंतरराज्यीय मामले 48 साल बाद भी नहीं सुलझे, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
इसके लिए संवेदनशील और गंभीर सरकार की जरूरत है। इन्हें सुलझाने के लिए हम सामूहिक प्रयास करेंगे। इनेलो और अकाली दल मिलकर हरियाणा के हितों पर कुठाराघात कर रहे हैं।
डॉ. अशोक तंवर, अध्यक्ष, हरियाणा प्रदेश कांग्रेस
एसवाईएल नहीं बनने के लिए कांग्रेस सरकार जिम्मेवार है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार केंद्र सरकार ने यह नहर बनानी थी। उसी दिन से कांग्रेस की सरकार केंद्र में है। पंजाब के सीएम प्रकाश सिंह बादल के हाथ में कुछ नहीं है। हजकां विधायक रेणुका बिश्नोई के आरोप निराधार हैं।
अशोक अरोड़ा, अध्यक्ष, इनेलो, हरियाणा
एसवाईएल न बनने के लिए चौटाला और बादल परिवार जिम्मेवार हैं। चौटाला ने बादल के साथ समझौता भी इसी शर्त पर किया है कि वे पंजाब से एसवाईएल का पानी और चंडीगढ़ कभी नहीं मांगेंगे।
रेणुका बिश्नोई, विधायक, हजकां
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हरियाणा और पंजाब के बीच सबसे बड़ा मसला सतलुज-यमुना लिंक नहर का है। इस नहर के जरिए हरियाणा को अपना बकाया पानी भाखड़ा से मिलना है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2004 के आखिर में फैसला दिया था कि एक साल के भीतर पंजाब सरकार इस नहर को बनाए। अगर पंजाब सरकार नहर नहीं बनाती तो केंद्र अपने पैसे से यह नहर बनाएगा। मगर नहर आज तक नहीं बनी। उलटा, जो नहर बनी थी, वह लगभग खत्म हो चुकी है।
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मार्च, 2005 में हरियाणा से इनेलो की सरकार चली गई और तब से कांग्रेस सरकार चली आ रही है। केंद्र में मई, 2004 से यूपीए सरकार चली आ रही है। जब यह फैसला आया था तब पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री थे। उन्होंने पंजाब विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर सारे जल समझौते रद कर दिए।
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कांग्रेस एसवाईएल मुद्दे को सुलझाने के लिए पूरी तरह गंभीर है। पंजाब सरकार के प्रस्ताव पर राष्ट्रपति संदर्भ का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। अंतरराज्यीय मामले 48 साल बाद भी नहीं सुलझे, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
इसके लिए संवेदनशील और गंभीर सरकार की जरूरत है। इन्हें सुलझाने के लिए हम सामूहिक प्रयास करेंगे। इनेलो और अकाली दल मिलकर हरियाणा के हितों पर कुठाराघात कर रहे हैं।
डॉ. अशोक तंवर, अध्यक्ष, हरियाणा प्रदेश कांग्रेस
एसवाईएल नहीं बनने के लिए कांग्रेस सरकार जिम्मेवार है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार केंद्र सरकार ने यह नहर बनानी थी। उसी दिन से कांग्रेस की सरकार केंद्र में है। पंजाब के सीएम प्रकाश सिंह बादल के हाथ में कुछ नहीं है। हजकां विधायक रेणुका बिश्नोई के आरोप निराधार हैं।
अशोक अरोड़ा, अध्यक्ष, इनेलो, हरियाणा
एसवाईएल न बनने के लिए चौटाला और बादल परिवार जिम्मेवार हैं। चौटाला ने बादल के साथ समझौता भी इसी शर्त पर किया है कि वे पंजाब से एसवाईएल का पानी और चंडीगढ़ कभी नहीं मांगेंगे।
रेणुका बिश्नोई, विधायक, हजकां