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लोकसभा चुनाव 2019: चंडीगढ़ में बीजेपी के लिए सबसे बड़ा सवाल- किरण खेर, टंडन या कोई और

Mon, 18 Mar 2019 03:25 PM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Mon, 18 Mar 2019 03:25 PM IST
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Lok Sabha Elections 2019, Who will be bjp candidate from chandigarh, kirron kher vs sanjay tandon
Kirron Kher - फोटो : अमर उजाला
इस समय बड़ा सवाल यह उठा रहा है कि चंडीगढ़ में भाजपा से उम्मीदवार कौन होगा? पार्टी के भीतर और पूरे शहर में सांसद किरण खेर और पार्टी प्रदेश अध्यक्ष संजय टंडन के नाम पर ही चर्चा चल रही है। अभी तक तीसरा नाम सामने नहीं आया है, लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि यदि किरण खेर और संजय टंडन के नाम पर सहमति नहीं बनी, तो पार्टी किसी तीसरे चेहरे पर विचार कर सकती है।
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साल 2014 में पार्टी ने इसी रणनीति पर काम किया था। तीन दावेदारों की लड़ाई और गुटबाजी खत्म करने के लिए पार्टी ने किरण खेर को मैदान में उतारा था। पिछले लोकसभा चुनाव में संजय टंडन, पूर्व सांसद सतपाल जैन व पूर्व केंद्रीय मंत्री (मौजूदा समय में आप के प्रत्याशी) हरमोहन धवन के बीच टिकट की लड़ाई थी। पार्टी को डर था कि यदि तीनों में किसी को एक टिकट दिया गया तो गुटबाजी कैंसर में तब्दील हो जाएगी।
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इस स्थिति में पार्टी और प्रत्याशी दोनों को नुकसान झेलना पड़ सकता है। ऐसे में किसी तीसरे चेहरे की रणनीति पर पार्टी को कामयाबी मिली और किरण खेर अच्छे मार्जिन से जीतकर संसद पहुंच गईं। तब पार्टी भले ही यह सीट जीत गई हो, मगर गुटबाजी से उसे आज भी जूझना पड़ रहा है। इस सीट पर जीत की पहली शर्त गुटबाजी को पार करना होगा, जो पार्टी के लिए एक चुनौती है।
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यही वजह है कि टिकट के दोनों प्रतिद्वंद्वियों को अब तक इशारा भी नहीं किया गया है कि पार्टी किस के नाम पर विचार करने जा रही है। दोनों ही दावेदार मैदान फतेह करने के लिए जी जान से जुटे हुए हैं।

किरण खेर की राह कितनी आसान, कितनी मुश्किल

साल 2014 के चुनाव में किरण पहली बार मैदान में उतरीं और कांग्रेस के कद्दावर नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल को करीब 70 हजार वोटों से हराया। अच्छे मार्जिन से बंसल को हराने के बाद किरण की संसद में अच्छी पैठ बनी। संसद में उनकी बेहतरीन उपस्थिति रही। कई गंभीर मुद्दों पर वे बहस का हिस्सा भी बनीं। सवाल भी पूछे, लेकिन वह चंडीगढ़ में पार्टी संगठन के साथ तालमेल बैठाने में असफल रहीं।

जनता दरबार हो या कॉफी विद किरण। दोनों ही कार्यक्रमों से संगठन ने दूरी बनाकर रखी है। संजय टंडन से दूर रहने वाला पार्षदों का एक दल जरूर उनके साथ है। सरकारी नौकरी में आवेदकों की उम्र बढ़ाने का श्रेय उनके खाते में जाता है, लेकिन कितने लोगों को नौकरियां मिलीं, यह अब तक एक सवाल बना हुआ है। एंटी इन्कम्बेंसी के फैक्टर को भी नकारा नहीं जा सकता, जिसका उन्हें नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।

टिकट वितरण में यह बात भी बहुत मायने रखती है कि आपकी पैरवी कौन कर रहा है। केंद्रीय नेतृत्व में किरण खेर की अच्छी पकड़ है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की वह करीबी हैं। सबसे बड़ा फैक्टर जो उनके पक्ष में है वो है फिल्म अभिनेता अनुपम खेर। अनुपम खेर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न सिर्फ देश में बल्कि इंटरनेशनल मंच पर खूब पैरवी की है।

टंडन की राह कितनी आसान, कितनी मुश्किल

संजय टंडन पिछले नौ सालों से प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज हैं, जो इस बात को दर्शाने के लिए काफी है कि वह कितनी मजबूत स्थिति में हैं। इन नौ सालों में उन्होंने पार्टी के संगठन को तैयार किया है। यह उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि कार्यकर्ताओं की भारी-भरकम फौज में भाजपा किसी अन्य पार्टी के मुकाबले काफी आगे खड़ी है। मिलनसार होने के कारण शहर के लोगों के बीच भी उनकी अच्छी पैठ है।

टंडन के पिता स्व. बलराम दास टंडन की गिनती, उन नेताओं में होती है, जिन्होंने जनसंघ की स्थापना की थी। जब उनका निधन हुआ तो उस वक्त वह छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के पद पर थे। संजय टंडन केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु, पीयूष गोयल, धर्मेंद्र प्रधान के अलावा हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल के भी करीबी हैं। आरएसएस में भी उनकी अच्छी पकड़ है। इन सबके बावजूद उनकी राह आसान नहीं।

टिकट की राह में उनकी सबसे बड़ी चुनौती किरण खेर हैं। इससे पार पाना उनके लिए आसान नहीं होगा। उनके लिए एक नकारात्मक बात यह भी है कि वह प्रदेश अध्यक्ष होने के बावजूद गुटबाजी को खत्म करने में कामयाब नहीं रहे। बीजेपी के कुल 20 पार्षद हैं, लेकिन उनके पाले में दस से 11 ही हैं। बाकियों को मनाने या अपने पक्ष में करने में वह असफल रहे हैं।

दो की लड़ाई में कोई तीसरा मार सकता है बाजी

एक सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि संजय टंडन या किरण खेर में से किसी एक को टिकट मिलता है तो क्या दोनों के बीच की खाई भर पाएगी। शायद नहीं। ऐसी स्थिति में पार्टी आलाकमान किसी तीसरे चेहरे पर विचार कर सकती है। जिस तरह से साल 2014 में किया था। उस साल तीन की लड़ाई में चौथे को टिकट मिल गई थी। अभी तक नाम तो सामने नहीं आए हैं, लेकिन सूत्रों ने दावा किया है कि दो से तीन लोग केंद्रीय नेतृत्व के संपर्क में हैं। आखिरी फेज में चुनाव होने के कारण पार्टी का फोकस पहले उन जगहों पर है, जहां पहले चरण में चुनाव होने हैं। बताया जा रहा है कि अप्रैल के पहले हफ्ते में चंडीगढ़ के टिकट पर चर्चा हो सकती है।
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