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लोकसभा 2019: हरियाणा में गठबंधन के ‘मोहरे’ बिगाड़ते रहे हैं विरोधियों की चाल, जीते भी हारे भी

Sun, 14 Apr 2019 03:33 PM IST
खुशबू गोयल मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Sun, 14 Apr 2019 03:33 PM IST
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Lok Sabha Elections 2019, Political Alliances in Haryana May Affect Results
सांकेतिक तस्वीर
हरियाणा लोकसभा चुनाव में हमेशा से ही ‘गठबंधन’ की सियासत ने कई बार चुनावी समीकरणों को बिगाड़ा है और इस बार भी कुछ ऐसा हो सकता है। गठबंधन के ‘मोहरों’ ने चुनावी ताल ठोकते हुए न केवल विरोधियों के गणित को प्रभावित किया है, बल्कि कई बार जीत भी मिली है। देश की सियासत में अपना खास दखल रखने वाले हरियाणा प्रदेश में एक बार फिर गठबंधन के मोहरे अपनी चाल चलते नजर आएंगे। इस बार छह राजनीतिक दल तीन गठजोड़ के साथ चुनाव लड़ेंगे। हर सीट के जातिगत, सामाजिक और सियासी समीकरणों को देखते हुए इन दलों ने ये गठजोड़ किया है, ताकि विरोधियों को मात देते हुए जीत हासिल की जा सकें।
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पहला गठबंधन, भाजपा के बागी विधायक राजकुमार सैनी ने अपनी नई पार्टी लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी (लोसुपा) बनाने के बाद बहुजन समाज पार्टी से किया है। दरअसल, इसी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पहले बसपा का ‘हाथी’ इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) का साथी था। लेकिन करीब छह माह पूर्व इनेलो के टूटने और जननायक जनता पार्टी (जजपा) के उदय के बाद बसपा ने भी कुनबे में दरार का हवाला देते हुए इनेलो से अपना नाता तोड़ दिया। उसके बाद बसपा प्रदेश में लोसुपा के साथ हो गई। लोसुपा-बसपा गठबंधन ने अभी तक अपने 8 लोकसभा प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं।
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दूसरा गठबंधन, जजपा और आम आदमी पार्टी (आप) के बीच हुआ है। दरअसल, आप इस गठबंधन को प्रदेश में कांग्रेस के साथ ‘महागठबंधन’ में तबदील करने को प्रयासरत थी। कांग्रेस व आप हाईकमान स्तर पर इसकी बातचीत भी चल रही थी। लेकिन इसके लिए न तो प्रदेश के दिग्गज कांग्रेसी नेता माने और न ही जजपा के नेता। लिहाजा आप और जजपा का गठबंधन हो गया।

भाजपा और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) हरियाणा के बीच भी समर्थन की बात तय हो गई। शिअद इस लोकसभा में बिना प्रत्याशी उतारे हर सीट पर भाजपा को समर्थन देगा, लेकिन इसके बदले उन्होंने विधानसभा भाजपा से कम से कम 15 सीटों की मांग की है। इस तरह छह सियासी दलों के ये तीन गठजोड़ लोकसभा चुनाव में अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस जिसने आज तक हरियाणा में कभी गठबंधन नहीं किया, वे इस बार फिर अपने ही दम पर जीत के लिए जद्दोजहद करेगी।

हरियाणा में ऐसा रहा गठबंधन की सियासत का असर

- देश में इमरजेंसी के बाद सन 1977 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा में भारतीय लोकदल एवं जनता पार्टी ने मिलकर चुनाव लड़ा। इस गठबंधन में छोटे-बड़े सात राजनीतिक दल शामिल थे। सभी 10 सीटों पर इस गठबंधन के मोहरों ने जीत दर्ज की।
- सन 1980 में फिर से जनता पार्टी की हरियाणा में 5 सीट आई। 5 सीट कांग्रेस ने जीती
- सन 1984 में जनता पार्टी गठबंधन को एक सीट नहीं मिली। 10 सीटें कांग्रेस ने जीती
- सन 1989 में जनता दल ने फिर से 5 सीटें जीती।
- 1996 के लोकसभा चुनाव में पूर्व सीएम बंसीलाल की हरियाणा विकास पार्टी (हविपा) और भाजपा का गठबंधन हुआ। 4 सीट भाजपा और 3 सीट हविपा के खाते में आई।
- सन 1998 के  चुनाव में हरियाणा लोकदल (राष्ट्रीय) और बसपा का व हविपा और भाजपा का गठबंधन था। लोकदल ने 4 सीट जीती और बसपा ने 1 । जबकि भाजपा और हविपा ने 1-1 सीट पर जीत दर्ज की।
- सन 1999 में इनेलो और भाजपा के गठबंधन ने चुनाव लड़ा और सभी 10 सीटें जीती।
- दस साल बाद 2009 में भाजपा-इनेलो ने फिर गठबंधन किया, लेकिन एक भी सीट पर जीत नहीं मिली।
- 2014 में भाजपा ने पूर्व सीएम भजनलाल की हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) से गठबंधन किया। भाजपा अपने हिस्से की 8 में से 7 सीटें जीती। हजकां अपनी दोनों सीटें हार गई।
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