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ग्राउंड रिपोर्टः पंजाब की वो सीट, यहां जिस पार्टी का सांसद बना, केंद्र में सरकार भी उसी की बनी

Sat, 18 May 2019 03:57 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, श्री आनंदपुर साहिब (पंजाब)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, श्री आनंदपुर साहिब (पंजाब) Published by: ajay kumar Updated Sat, 18 May 2019 03:57 PM IST
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Lok sabha elections 2019, Ground Report of Shri Anandpur Sahib Lok Sabha seat
लोकसभा चुनाव 2019 - फोटो : अमर उजाला

श्री आनंदपुर साहिब 2009 में पहली बार लोकसभा क्षेत्र बना। इसके पहले इस क्षेत्र के विधानसभा हलके होशियारपुर और रोपड़ सीट के साथ थे। आनंदपुर साहिब में चार जिले रोपड़, शहीद भगत सिंह नगर, मोहाली और होशियारपुर के नौ विधान सभा हलके पड़ते हैं।

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इनमें से पांच सीटों पर कांग्रेस, तीन सीटों पर आम आदमी पार्टी और एक सीट पर अकाली दल के विधायक हैं। यह माना जाता है कि श्री आनंदपुर साहिब सीट से जिस पार्टी का प्रत्याशी चुनाव जीतता है राज्य और केंद्र में उसी की सरकार बनती है।
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2009 में इस सीट से पहली बार हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रवनीत सिंह बिट्टू ने अकाली दल के सीनियर नेता डॉ. दलजीत सिंह चीमा को मात दी थी और केंद्र में कांग्रेस सरकार बनी। 2014 में इस सीट से कांग्रेस ने सीनियर नेता अंबिका सोनी को चुनाव मैदान में उतारा।
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इन चुनावों में हिम्मत सिंह शेरगिल ने तीन लाख वोट लेकर कांग्रेस का गणित बिगाड़ दिया और अकाली दल के प्रत्याशी प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा चुनाव जीत गए और केंद्र में अकाली दल की भाईवाल भाजपा की सरकार बनी।

इस बार कांग्रेस ने पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी को चुनाव मैदान में उतारा है। अकाली दल ने मौजूदा सांसद प्रो. चंदूमाजरा पर ही दांव लगाया है। आम आदमी पार्टी ने इस बार नरिंदर सिंह शेरगिल को चुनाव मैदान में उतारा है।

इस बार अकाली दल और कांग्रेस में मुकाबला कड़ा देखा जा रहा है। आम आदमी पार्टी के रोपड़ से विधायक अमरजीत सिंह संदोआ के कांग्रेस में शामिल होने के कारण भी आप का जनाधार लोगों में कम हुआ है। केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी के कारण कांग्रेस के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल बनी हुई है। 

रोपड़ विधानसभा हलके में मनीष तिवारी को पहले से ही अंदरूनी गुटबाजी का सामना करना पड़ रहा था लेकिन विधायक संदोआ के कांग्रेस में शामिल होने के बाद यह गुटबाजी और बढ़ती दिखाई दी है। हलके में चुनाव प्रचार के दौरान दिए अपने विवादित बयान के कारण भी मनीष तिवारी चर्चा में रहे हैं। सांसद प्रो. चंदूमाजरा अपने किए कामों के आधार पर दोबारा चुनाव जीतने का दावा ठोक रहे हैं। 

चंदूमाजरा इस बार चुनाव प्रचार के दौरान बादलों का कम प्रधान मंत्री मोदी का नाम ज्यादा ले रहे हैं जबकि मनीष तिवारी राहुल गांधी का नाम कम लेकर कैप्टन अमरिंदर सिंह का नाम ज्यादा ले रहे हैं। इसके अलावा पीडीए और बसपा गठबंधन के प्रत्याशी विक्रम सिंह सोढ़ी भी चुनाव मैदान में है।

अकाली प्रत्याशी प्रो. चंदूमाजरा अपने पिछले कार्यकाल के दौरान किए गए कामों के आधार पर लोगों से वोट मांग रहे हैं तो कांग्रेस प्रत्याशी मनीष तिवारी मौजूदा केंद्र सरकार की नाकामियों को गिनवा रहे हैं। दोनो के भाषण में हलके के मुद्दे गायब हैं।

श्री आनंदपुर साहिब
कुल मतदाता : 16 लाख 89 हजार 933
पुरुष : 8, 80, 778
महिला : 8,09,113 

मनीष तिवारी- कांग्रेस
मजबूती- पूर्व केन्द्रीय मंत्री तथा सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं। लोगों को उमीद है कि अगर यह जीतते है और केन्द्र में कांग्रेस सरकार बनी तो फिर से मंत्री बन सकते हैं।


कमजोरी- पंजाब के खिलाफ वादा खिलाफी का प्रचार। आम लोगों और हलके में दूसरी कतार से नीचे वाले कांग्रेसियों से मेलजोल में कमी होना। बाहरी उम्मीदवार होने के लग रहे आरोप


प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा- अकाली दल
मजबूती- मोदी लहर और हलके में करवाए कई बड़े कामों का फायदा मिल सकता है। प्रचार के लिए पूरे परिवार और रिशतेदारों द्वारा संभाली कमान।


कमोजरी- गढ़शंकर से आनंदपुर साहिब सड़क का न बनना, पांच साल में हलके के गांवों में न पहुंच पाना, गोद लिए गांव लोधीपुर में विकास न होना, अकाली दल के खिलाफ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबियों का प्रचार।


नरिंदर सिंह शेरगिल-आम आदमी पार्टी
मजबूती- पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी को पड़ी तीन लाख वोट, मोहाली से लड़े विधान सभा चुनाव में दूसरे नंबर पर रहना, बेदाग छवि।
 कमजोरी- पूरे हलके के लोगों तक पहुंच नहीं, विधायक अमरजीत सिंह संदोआ का पार्टी को छोड़ना, पार्टी स्तर पर पूरे हलके में मजबूती न मिलना।
 

सोढी विक्रम सिंह-पीडीए
मजबूती-सिख धर्म के छठे गुरु के वंशज, बसपा का वोट बैंक।
कमजोरी- प्रचार में कमी, गठबंधन का हलके में अकाली दल व कांग्रेस के मुकाबले कम जनाधार, बसपा के अलावा गठबंधन के बाकी दलों का जनाधार कम होना।

 

बीरदविंदर सिंह-अकाली दल टकसाली
मजबूती- बेअदबियों के रोष वाला वोट बैंक मिल सकता है, जत्थेदार उजागर सिंह बढाली का खरड़ और मोहाली में जनाधार 
कमजोरी- प्रचार में पीछे होना, कोई बड़ी रैली न करना, हलके के मुद्दों को लेकर लोगों में न पहुंच पाना।

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