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सर छोटू राम के नाती बीरेंद्र सिंह को भाजपा के दामन में मिले फूल ही फूल, शानदार राजनीतिक करियर

Mon, 15 Apr 2019 10:56 AM IST
खुशबू गोयल यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Mon, 15 Apr 2019 10:56 AM IST
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Lok Sabha Elections 2019, BJP Candidate Brijender Singh Father Birender Singh Political Career
बीरेंद्र सिंह - फोटो : file photo
ट्रेजडी किंग के नाम से मशहूर कद्दावर जाट नेता और सर छोटू राम के नाती चौधरी बीरेंद्र सिंह ने अपनी अगली पीढ़ी को आखिरकार हरियाणा की सक्रिय राजनीति में उतार ही दिया। आईएएस बेटे बृजेंद्र सिंह को राजनीति में लाने की तैयारी बीरेंद्र सिंह लंबे समय से कर रहे थे, लेकिन उन्होंने मौका 2019 के आम चुनाव का चुना और हिसार से बेटे को चुनावी रण में उतार दिया।
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बीरेंद्र के लिए बेटे को जिताकर संसद में भेजना किसी चुनौती से कम नहीं है, क्योंकि उन्होंने बेटे को देवीलाल और भजन लाल के गढ़ में चक्रव्यूह भेदने के लिए भेजा है तो संघर्ष करना ही होगा। कांग्रेस के साथ बीरेंद्र सिंह 42 साल तक रहे और उन्हें वहां ट्रेजडी किंग का खिताब मिला। लेकिन बीरेंद्र को भाजपा के दामन में फूल ही फूल मिले हैं।
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अगस्त 2014 में भाजपा ज्वॉइन करने के बाद बीरेंद्र सिंह राज्यसभा से संसद पहुंचे और केंद्रीय मंत्री का पद भी पाया। 2014 के विधानसभा चुनाव में जींद के उचाना कलां से पत्नी प्रेमलता के लिए टिकट पाया और उन्हें विधायक भी बनवाया। अब बारी बेटे की थी, जिसके लिए टिकट पाने में भी बीरेंद्र सिंह सफल हो गए।
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कांग्रेस में रहते बीरेंद्र सिंह की हरियाणा का सीएम व केंद्र में मंत्री बनने की हसरत पूरी नहीं हो सकी। हरियाणा के पूर्व वित्त मंत्री बीरेंद्र सिंह वैसे तो रिश्ते में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के भाई हैं, लेकिन दोनों में छत्तीस का राजनीतिक आंकड़ा है। हुड्डा विरोध के चलते ही उन्होंने 2014 में भाजपा का दामन थामा था। बीरेंद्र पांच बार हरियाणा विधानसभा में भी  पहुंचे हैं।

किस्मत ने तीन बार दी दगा

बीरेंद्र सिंह तत्कालीन यूपीए सरकार में कैबिनेट मंत्री बनते-बनते रह गए थे। उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शपथ लेने के लिए न्योता तक दे दिया था, लेकिन, अंतिम समय में उनका पत्ता कट गया और चंडीगढ़ से सांसद पवन बंसल रेल मंत्री बन गए थे। बीरेंद्र सिंह आज तक इसके लिए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को जिम्मेदार ठहराते हैं।

इससे पहले बीरेंद्र सिंह दो बार हरियाणा के सीएम बनने से भी रह गए। एक बार 2005 में और उससे पहले स्वर्गीय राजीव गांधी की मृत्यु से ठीक पहले। अगर राजीव की मृत्यु न हुई होती तो शायद बीरेंद्र का सीएम बनने का सपना पूरा हो गया होता। सीएम बनने की टीस आज भी बीरेंद्र सिंह की जुबान पर कई बार आ जाती है।

अमित शाह ने न ट्रेजडी होने दी न कॉमेडी
भाजपा ज्वॉइन करने पर बीरेंद्र को अमित शाह ने भरोसा दिया था कि चौधरी साहब, न तो आप पॉलिटिकल ट्रेजडी किंग रहेंगे और न ही कॉमेडी किंग। इसे शाह ने बखूबी निभाया भी। बीरेंद्र को केंद्र में मंत्री पद दिया, पत्नी को विधायकी और अब बेटे को लोकसभा टिकट। यही नहीं चुनाव में शाह ने बीरेंद्र का उनकी योग्यता अनुसार सदुपयोग भी किया।
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