ये साहित्यकार मानते हैं ब्यूरोक्रेट्स को निकम्मा

रवि अटवाल Updated Mon, 25 Nov 2013 05:07 PM IST
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हिंदी साहित्य को पचास साल दे चुके गोविंद मिश्रा खुद भी आईआरएस ऑफिसर रह चुके हैं, लेकिन वे ब्यूरोक्रेट्स को निकम्मा कहते हैं। वे कहते हैं कि ब्यूरोक्रेट्स को जो करना चाहिए, वे नहीं करते हैं।
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इन्हें अपने पद को लेकर सबसे ज्यादा घमंड रहता है। उन्होंने अपने नए उपन्यास ‘अरण्य-तंत्र’ में ब्यूरोक्रेट्स को अलग-अलग जानवरों तक की संज्ञा दी है। खुद को उन्होंने उपन्यास में गधा कहा है। इस उपन्यास में उन्होंने प्रांतों की ब्यूरोक्रेसी को टेनिस कोर्ट पर उजागर किया है।
सुखना लेक पर लिट्राटी फेस्ट के दौरान उन्होंने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि खेल ही एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिए आदमी के भीतर की प्रवृत्तियां बाहर आ जाती हैं।
उन्होंने बताया कि किस प्रकार टेनिस खेलते-खेलते ब्यूरोक्रेेट्स का घमंडी रवैया और हठ बाहर निकलता है। मिश्रा कहते हैं कि इस प्रकार के विषय पर शायद ही कोई रचना हुई हो।

छुट्टी लेकर पूरा करता था उपन्यास
मिश्रा कहते हैं, आज के लेखन में बहुत बदलाव आया है। अब लेखक भावनात्मक रचना कम करते हैं और बुद्धि पर ज्यादा जोर देते हैं। इससे उनकी रचनाओं का प्रभाव कम होने लगा है।

अब लेखक खुद को अलग दिखाने की कोशिश में जल्दबाजी कर जाते हैं। अपनी बात करते हुए मिश्रा ने बताया कि मैं अपने उपन्यास को पूरा वक्त देता था लिखने में।

साल भर छुट्टियां नहीं लेता था और फिर एक साथ दफ्तर से छुट्टी लेकर पचमढ़ी (मध्यप्रदेश) जाकर अपना उपन्यास पूरा करता था।

प्रकृति तय करती है आपका भविष्य
गोविंद मिश्रा का कहना है कि यह आप नहीं बल्कि प्रकृति तय करती है कि आप क्या बनोगे? मैंने 14 साल की उम्र में लिखना शुरू कर दिया था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं लेखक बनूंगा।

लेकिन मुझे कभी ऐसा अहसास नहीं हुआ कि मैं लेखन से दूर हुआ हूं। जब भी कभी लिखने की कोशिश की, हिंदी स्वाभाविक तरीके से मेरे पास चली आई।
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