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यहां के फौजी ने दी शहीद की विधवा को लाइफलाइन

Sat, 04 Jan 2014 10:52 AM IST
आशीष वर्मा
आशीष वर्मा Updated Sat, 04 Jan 2014 10:52 AM IST
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lifeline to a widow by a Martyr
चाहे जंग का मैदान हो या समाजसेवा, भारतीय सेना के जवान कहीं कम नहीं। इसकी जीती जागती मिसाल है चंडीगढ़ के रिटायर्ड कर्नल सीजेएस खैरा।
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साल 1988 में श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ चले ऑपरेशन पवन में चंदौली (उत्तराखंड) निवासी राइफलमैन महिपाल सिंह शहीद हो गए थे। उस समय महिपाल की पत्नी मुन्नी देवी 20 वर्ष की थी।

गांव में होने के कारण उसे आर्मी से मिलने वाली सुविधाओं के बारे में जानकारी नहीं थी। दस साल पहले ही मुन्नी को किडनी की बीमारी का पता चला। लेकिन उनका कोई भी कार्ड नहीं बना था जिससे वे आर्मी के हास्पिटल का फायदा उठा सकती।
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धीरे-धीरे बीमारी इतनी बढ़ गई कि दोनों किडनियां खराब हो गई। अब किडनी का ट्रांसप्लांट कराना जरूरी हो गया था। पिछले चार साल से उनके भाई इलाज का खर्चा उठा रहे थे।
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लेकिन दवा आदि में रुपया खर्च होने के बाद अब भाई के पास भी कुछ नहीं बचा था। दोनों भाई-बहन दर-दर की ठोकरे खाने को मजबूर थे।

ऐसे चला मदद का सिलसिला :
कुछ समय पहले इसकी सूचना चंडीगढ़ की एक्स सर्विसमैन ज्वाइंट एक्शन फ्रंट (साझा मोर्चा) को मिली। मोर्चा के जनरल सेक्रेटरी कर्नल सीजेएस खैरा ने इस पूरे घटनाक्रम को अपने ब्लॉग में लिखा।

साथ ही उन्होंने इस घटनाक्रम की एक मेल ईसीएचएस के मैनेजिंग डायरेक्टर मेजर जनरल जे जार्ज को की। उन्होंने आर्मी हेडक्वार्टर में स्थित वेटरन ग्रीवंसेज सेल को भी मेल किया।

ब्लॉग पढ़ने के बाद बंगलूरू के कर्नल एसएस राजन ने 15वीं कोर के एक्स जीओसी आटा हसन को पत्र लिखकर मदद के लिए आगे आने को कहा। दरअसल शहीद महिपाल गढ़वाल कोर के राइफल मैन थे और आटा हसन भी उसी कोर से संबंधित थे।


हसन ने गढ़वाल ट्रेनिंग सेंटर को पत्र लिखकर जल्द से जल्द कागज की कार्रवाई करने को भी कहा। आर्मी हेडक्वार्टर को इतने ज्यादा आग्रह मिलने का असर यह हुआ कि उन्होंने इस संबंध में फौरन जरूरी कदम उठाए।

ईसीएचएस की ओर से भी कार्रवाई तेज हो गई। कागज पूरे करने के लिए एक अधिकारी भी नियुक्त किया गया। मात्र एक हफ्ते के अंदर सारा काम हो गया।

अब शहीद की विधवा का इलाज आर्मी हास्पिटल में मुफ्त में हो सकेगा। शनिवार को उन्हें देहरादून के आर्मी हास्पिटल में भर्ती कर दिया गया जाएगा।
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