{"_id":"6ad292950b34a7351705944e","slug":"leaving-a-child-alone-for-even-a-moment-could-have-serious-life-altering-consequences-chandigarh-news-c-16-pkl1049-1151709-2026-10-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"Chandigarh News: बच्चा एक पल अकेला छूटा, तो जिंदगी पर पड़ सकता है भारी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Chandigarh News: बच्चा एक पल अकेला छूटा, तो जिंदगी पर पड़ सकता है भारी
विज्ञापन
चंडीगढ़। घर में खाना बनाते समय या किसी जरूरी काम के लिए छोटे बच्चे को कुछ मिनट अकेला छोड़ना भारी पड़ सकता है। बिस्तर से गिरने, सीढ़ियों से फिसलने, बालकनी या छत से नीचे आने और दोपहिया वाहन पर असुरक्षित सफर करने जैसी घटनाएं बच्चों को गंभीर चोट पहुंचा सकती हैं। सिर पर लगी चोट जानलेवा भी हो सकती है और उसका असर लंबे समय तक रह सकता है। ट्रॉमा डे के अवसर पर पीजीआई की एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष प्रो. काजल जैन ने बच्चों को हादसों से बचाने और सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को समय पर सही मदद देने के लिए जागरूकता को जरूरी बताया।
प्रो. काजल जैन के अनुसार, गंभीर सिर की चोट के साथ पीजीआई पहुंचे चार साल से कम उम्र के 50 बच्चों पर किए गए अध्ययन में 24 बच्चे ऊंचाई से गिरने, 22 सड़क दुर्घटनाओं और चार अन्य दुर्घटनाओं के कारण अस्पताल पहुंचे थे। इनमें 50 प्रतिशत बच्चों को आईसीयू में भर्ती करना पड़ा, जबकि 14 बच्चों की सर्जरी हुई। पीजीआई से घर जाने के बाद तीन महीने के भीतर 17 बच्चों की मौत हो गई। ये आंकड़े छोटे बच्चों में गंभीर चोटों के खतरनाक परिणामों को सामने रखते हैं।
घर में इन सावधानियों का रखें ध्यान
प्रो. जैन ने कहा कि छोटे बच्चों को बिस्तर, सीढ़ियों, बालकनी और छत के पास अकेला छोड़ने से बचना चाहिए। घर में खतरनाक जगहों तक बच्चों की पहुंच रोकने के साथ उनकी निगरानी जरूरी है। बाइक की पेट्रोल टंकी पर बच्चे को बैठाकर ले जाना या दोपहिया वाहन पर असुरक्षित तरीके से सफर कराना गंभीर हादसे का कारण बन सकता है। कार में बच्चे की उम्र और आकार के अनुसार उपयुक्त चाइल्ड सीट का इस्तेमाल करना चाहिए। सिर पर चोट लगने के बाद बच्चा सामान्य दिखे, तब भी लक्षणों को नजरअंदाज न करें और चिकित्सकीय सलाह लें।
विज्ञापन
घायल को गलत तरीके से पहुंचाने से बढ़ सकता है खतरा
प्रो. जैन के मुताबिक, सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने से पहले दी गई मदद भी उसकी जान बचाने में अहम है। पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ से पीजीआई रेफर होने वाले ट्रॉमा मरीजों में पंजाब से सबसे ज्यादा आते हैं। हालांकि, घायल को शुरुआती मदद देने और सुरक्षित तरीके से अस्पताल पहुंचाने की जानकारी अब भी सीमित है। रास्ते में की गई गलतियां उसकी स्थिति बिगाड़ सकती हैं।
2018 से पुलिस और स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण
इसी उद्देश्य से पीजीआई का ट्रॉमा एनेस्थीसिया ग्रुप 2018 से इमीडिएट ट्रॉमा लाइफ सपोर्ट कार्यशाला आयोजित कर रहा है। इसमें देशभर के विशेषज्ञ पुलिसकर्मियों और स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण देते हैं। प्रो. जैन के अनुसार, पहले जानकारी के अभाव में ट्रॉमा सेंटर पहुंचने वाले सड़क दुर्घटना के मामलों में 45 से 50 प्रतिशत तक नुकसान होने की बात सामने आती थी। अब यह घटकर 30 से 40 प्रतिशत रह गया है।
विज्ञापन
प्रो. काजल जैन के अनुसार, गंभीर सिर की चोट के साथ पीजीआई पहुंचे चार साल से कम उम्र के 50 बच्चों पर किए गए अध्ययन में 24 बच्चे ऊंचाई से गिरने, 22 सड़क दुर्घटनाओं और चार अन्य दुर्घटनाओं के कारण अस्पताल पहुंचे थे। इनमें 50 प्रतिशत बच्चों को आईसीयू में भर्ती करना पड़ा, जबकि 14 बच्चों की सर्जरी हुई। पीजीआई से घर जाने के बाद तीन महीने के भीतर 17 बच्चों की मौत हो गई। ये आंकड़े छोटे बच्चों में गंभीर चोटों के खतरनाक परिणामों को सामने रखते हैं।
विज्ञापन
घर में इन सावधानियों का रखें ध्यान
प्रो. जैन ने कहा कि छोटे बच्चों को बिस्तर, सीढ़ियों, बालकनी और छत के पास अकेला छोड़ने से बचना चाहिए। घर में खतरनाक जगहों तक बच्चों की पहुंच रोकने के साथ उनकी निगरानी जरूरी है। बाइक की पेट्रोल टंकी पर बच्चे को बैठाकर ले जाना या दोपहिया वाहन पर असुरक्षित तरीके से सफर कराना गंभीर हादसे का कारण बन सकता है। कार में बच्चे की उम्र और आकार के अनुसार उपयुक्त चाइल्ड सीट का इस्तेमाल करना चाहिए। सिर पर चोट लगने के बाद बच्चा सामान्य दिखे, तब भी लक्षणों को नजरअंदाज न करें और चिकित्सकीय सलाह लें।
विज्ञापन
घायल को गलत तरीके से पहुंचाने से बढ़ सकता है खतरा
प्रो. जैन के मुताबिक, सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने से पहले दी गई मदद भी उसकी जान बचाने में अहम है। पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ से पीजीआई रेफर होने वाले ट्रॉमा मरीजों में पंजाब से सबसे ज्यादा आते हैं। हालांकि, घायल को शुरुआती मदद देने और सुरक्षित तरीके से अस्पताल पहुंचाने की जानकारी अब भी सीमित है। रास्ते में की गई गलतियां उसकी स्थिति बिगाड़ सकती हैं।
2018 से पुलिस और स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण
इसी उद्देश्य से पीजीआई का ट्रॉमा एनेस्थीसिया ग्रुप 2018 से इमीडिएट ट्रॉमा लाइफ सपोर्ट कार्यशाला आयोजित कर रहा है। इसमें देशभर के विशेषज्ञ पुलिसकर्मियों और स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण देते हैं। प्रो. जैन के अनुसार, पहले जानकारी के अभाव में ट्रॉमा सेंटर पहुंचने वाले सड़क दुर्घटना के मामलों में 45 से 50 प्रतिशत तक नुकसान होने की बात सामने आती थी। अब यह घटकर 30 से 40 प्रतिशत रह गया है।