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Hindi News ›   Chandigarh ›   Kushwant Singh Literature Fest, Discussion on Punjab Drugs Issue

खुशवंत सिंह लिटफेस्टः पंजाब के मौजूदा हालात पर चर्चा

Sun, 12 Oct 2014 11:47 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़/कसौली(सोलन)
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़/कसौली(सोलन) Updated Sun, 12 Oct 2014 11:47 AM IST
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Kushwant Singh Literature Fest, Discussion on Punjab Drugs Issue

खुशवंत सिंह लिटफेस्ट में पंजाब में लगातार बढ़ रही नशे की लत पर चिंता जाहिर की गई। ड्रग्स के जंजाल में फंस रहे पंजाबी युवाओं को साहित्यकारों ने कुरेदा तो वहीं बीच-बीच में हिमाचल का भी जिक्र हुआ।

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लिटफेस्ट के मंच पर साहित्यकार अजय भारद्वाज ने कहा कि पंजाब की एक पीढ़ी को आतंकवाद ने खत्म किया और दूसरी पीढ़ी को ड्रग्स खत्म कर रहा है। पंजाब की खुशियां इस नशे के जाल में बुरी तरह जकड़ चुकी हैं।
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अब हर मां अपने बेटे को लेकर बेचैन है। डॉ. एके बनर्जी ने ‘पंजाब एंड द ड्रग्स मिनेंस’ पर कहा कि ड्रग्स ने उनके बेटे को छीन लिया है। अब वह इस दुनिया में नहीं है लेकिन वे ड्रग्स की चपेट में आए युवाओं को बचाने के लिए प्रयासरत हैं।
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राइटिंग रजाई सिलने की तरह: शोभा डे
उपमन्यु चटर्जी, शोभा डे, गीता हरिहरन व समहिता अरनी ने द आर्ट ऑफ राइटिंग अ शार्ट स्टोरी, केन ईट बी थोट.. विषय पर संवाद किया। शोभा डे ने कहा कि ‘मेरे लिए स्टोरी राइटिंग बड़ी रजाई एक साथ सिलने की तरह है, जिसे बाद में इकट्ठा होना है’। इस दौरान लेखिका शोभा डे ने अपनी नई बुक स्माल बेट्रायल्स का भी विमोचन किया।

इन पर भी हुई जोरदार चर्चा

स्क्वाइन लीडर राना चिना, ब्रियन मक्काल व कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इंडियन वॉइस फ्रॉम द ग्रेट वार विषय पर गहन चर्चा और संवाद किया। ब्रिगेडियर मैकाल ने अपनी बेटी की रचना इंडिया फॉरगॉटन कंट्रीब्यूशन ने वर्ल्ड वार -1 पर चर्चा की।

पूरी नहीं हुई हडाली में दफन होने की इच्छा

Kushwant Singh Literature Fest, Discussion on Punjab Drugs Issue

इसे जन्मभूमि से इश्क कहें या जड़ों की तरफ वापसी की बेपनाह हसरत। खुशवंत सिंह पाकिस्तान के रेगिस्तान की गोद में बसे अपने छोटे से गांव हडाली को कभी भूल नहीं पाए। जिंदगी के अंतिम लम्हों में उन्होंने पाकिस्तान में अपने पैतृक गांव हडाली में दफन होने की इच्छा जाहिर की।

यह इच्छा पूरी तो नहीं हुई, लेकिन उनकी हड्डियों की राख से स्कूल की मरम्मत हुई और वहां पत्थर के बने स्मृति चिन्ह में लिखा गया कि-खुशवंत सिंह की याद में ‘यह वह स्थान है, जहां मेरी जड़े हैं, जिसे मेरे आंसुओं और तकलीफ ने सींचा है’। सदी के महान लेखक खुशवंत सिंह की रूह पाकिस्तान में बसती थी।

खुशवंत सिंह पर लिखी द लिजेंड लिवस ऑन किताब में इस हकीकत को पिरोने वाले पाकिस्तान के लेखक और इतिहासकार फकीर सैय्यद एजाजुद्दीन ने खास बातचीत में कई अनछुए पहलू साझा किए। वह खुशवंत सिंह के तीसरे लिटफेस्ट में शिरकत करने पहुंचे हैं।

पर खुशवंत की राख से पाक में बना स्कूल

Kushwant Singh Literature Fest, Discussion on Punjab Drugs Issue

शुक्रवार देर शाम कसौली क्लब लाइब्रेरी में बातचीत में एजाजुद्दीन ने बताया कि खुशवंत सिंह ने अपनी मौत के पंद्रह दिन पहले भेजे संदेश में लिखा था कि ‘मैं हडाली में जन्मा हूं और जन्म से पाकिस्तानी हूं, मैंने अपने बच्चों को कहा है कि मुझे हडाली में ही दफनाएं’। 20 मार्च 2014 को सदी के महान लेखक की सुनहरी कलम रुक गई।

खुशवंत सिंह की बेटी माला को फोन पर सांत्वना दी। कहा कि क्या तुम उनकी हड्डियों की राख बचाकर रखोगी, मैं उसे पाकिस्तान में लाना चाहता हूं’। राहुल सिंह से बात करने के बाद उन्होंने कहा कि हमने राख का हिस्सा बचाकर रखा है, जब भी दिल्ली आना हो, तो उसे ले जाना। बकौल फकीर सैय्यद एजाजुद्दीन 18 अप्रैल को वह दिल्ली पहुंचे।

बागा अटारी होते हुए वह उनकी हड्डियों की राख ट्रेन के जरिए पाकिस्तान के हडाली ले गए। जहां स्कूल की मरम्मत के सीमेंट में उनकी राख मिलाई और मार्बल स्टोन भी उसी सीमेंट से लगाया।

पूछने पर कि ट्रेन ही क्यों? उन्होंने कहा कि भारत पाक के विभाजन के वक्त ट्रेन टू पाकिस्तान से वह भारत पहुंचे। इसी किताब ने उन्हें शोहरत दिलाई और अब इसी ट्रेन से उनकी अस्थियां वापस पाकिस्तान पहुंचाईं। यह काफी मायने रखता है।

भारत-पाक डोर को मजबूत रखने की कोशिश करते रहे

Kushwant Singh Literature Fest, Discussion on Punjab Drugs Issue

सदी के महान लेखक खुशवंत सिंह ने मरते दम तक दोनों देशों के बीच संबंधों की कमजोर डोर को मजबूत करने की कोशिश जारी रखी। एजाजुद्दीन के मुताबिक पाकिस्तान छोड़ने के बाद खुशवंत सिंह पहली बार 1987 में हडाली आए थे। करीब 500 छात्र गेट टू गेदर में एकत्र हुए। हैडमास्टर मोहम्मद फारूख राणा ने खुशवंत का इस्तकबाल किया और हदाली का बेटा बुलाया था।

इस पर वह गदगद हो उठे थे और ट्रेन टू पाकिस्तान भेंट करते हुए आंखें नम की थीं। लेखक खुशवंत सिंह की आटोबायोग्राफी ट्रूथ लव एंड ए लिटल मैलिस में जिक्र किया गया है कि जब वह पैदा हुए तो उनके पिता सोभा सिंह या दादा सुजान सिंह ने उनके जन्म की तारीख किसी डायरी में दर्ज करने की जहमत नहीं उठाई।

बाद में दिल्ली के माडर्न स्कूल में दाखिले के वक्त उनकी जन्मतिथि 2 फरवरी 1915 दर्ज कराई गई। लेकिन उनकी दादी के मुताबिक वह भादो में पैदा हुए थे। इसलिए खुशवंत अपना जन्म अगस्त महीने में मानते थे। वह खुद को सिंह राशि का मानते थे। एजाजुद्दीन से जब पूछा गया कि पाकिस्तान और भारत बार्डर के बीच टेंशन है।

इस टेंशन के बीच कसौली में पहुंचने तक उन्हें कोई परेशानी तो नहीं आई। वह कुछ देर चुप रहने के बाद मजाकिया अंदाज में बोले - क्यों क्या यहां किसी ने गोली मार दी है? फिर शायराना अंदाज में बोले - फूल को फूल ही रहने दो, कांटे जख्म देते हैं। उनका इशारा था कि इस इवेंट को बार्डर के तनाव से दूर रखो।

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