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Punjab News: पत्रकार भावना गुप्ता को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में दर्ज FIR की रद्द
Thu, 04 Jan 2024 07:33 PM IST
ajay kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: ajay kumar
Updated Thu, 04 Jan 2024 07:33 PM IST
सार
पत्रकार भावना गुप्ता को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने बड़ी राहत दी है। उनके खिलाफ पंजाब में दर्ज केस को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि एजेंसी आरोपों को साबित करने में नाकाम रही है। ऐसे में इस मामले में आपराधिक कार्रवाई जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
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पत्रकार भावना गुप्ता।
- फोटो : @BhawanaKishore
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विस्तार
कवरेज के लिए दिल्ली से पंजाब आई पत्रकार भावना गुप्ता के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट में दर्ज एफआईआर को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। अपने आदेश में हाईकोर्ट ने गुरुवार को एफआईआर की पूरी प्रक्रिया को सवालों के घेरे में लाते हुए कहा कि जब याची शिकायतकर्ता को जानती ही नहीं थी तो कैसे जातिसूचक शब्द कह सकती है। इसके साथ ही अदालत ने कहा कि इस मामले में जांच एजेंसी आरोपों को साबित करने में नाकाम रही है।
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मई 2023 में टीवी रिपोर्टर भावना गुप्ता अपने कैमरामैन मृत्युंजय कुमार और ड्राइवर परमिंदर के साथ दिल्ली से पंजाब सरकार के एक कार्यक्रम को कवर पंजाब आ रही थीं। इस दौरान उनकी कार का एक्सीडेंट हो गया और लापरवाही से वाहन चलाने समेत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्जकर तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया। इस मामले में सभी को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी और एफआईआर रद्द करने की मांग को लेकर याचिका विचाराधीन थी।
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इस याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए जस्टिस अनूप चितकारा ने कहा कि याचिकाकर्ता को पीड़ित की जाति के बारे में कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं थी। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि आरोपी ने पहचान पता होते हुए जातिगत टिप्पणी की होगी। एससी/एसटी एक्ट में जाति सूचक शब्द साबित करने का दायित्व शिकायतकर्ता पर होता है। न तो राज्य और न ही शिकायतकर्ता ने उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता को पीड़ित की जाति के बारे में पता था और फिर उनकी चुप्पी बहुत कुछ साबित करती है।
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भावना गुप्ता के वकील ने तर्क दिया कि वह शिकायतकर्ता को नहीं जानती और यह दुर्घटना थी, जिसके कारण कथित तौर पर मारपीट हुई। एफआईआर में मौजूद दलीलों को मानना न्याय का उपहास होगा। जातिवादी टिप्पणी करने और एससी/एसटी से संबंधित होने के कारण शिकायतकर्ता को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के आरोप पर अदालत ने कहा कि अधिनियम के तहत अपराध केवल इस तथ्य पर स्थापित नहीं होता है कि सूचना देने वाला अनुसूचित जाति का सदस्य है, जब तक कि अपमानित करने का कोई इरादा न हो। इस मामले में ऐसा नहीं हुआ, ऐसे में याचिकाकर्ताओं को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस मामले में आपराधिक कार्रवाई जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।