सर्वेक्षण में खुलासा: मैक्लोडगंज, अल्मोड़ा और उत्तरकाशी में भी हो सकते हैं जोशीमठ जैसे हालात
सुनील कुमार ने बताया कि एक्टिव फाल्ट जोन या सिस्मिक जोन में शामिल इन तीनों ही शहरों में ड्रेनेज सिस्टम ठीक न होने के कारण पानी मिट्टी में एकत्र होकर लुब्रिकेंट लेयर बना रहा है, जिसके कारण पहाड़ धंस रहे हैं।
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मैक्लोडगंज, अल्मोड़ा और उत्तरकाशी में जोशीमठ जैसे हालात बन सकते हैं। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की टीम ने इन क्ष्रेत्रों का सर्वे कर यह आशंका जताई है। टीम ने इन तीनों ही क्षेत्रों में सोक पिट का पानी बहाव की बजाय सीधे मिट्टी में संचयित होने को इसका मुख्य कारण बताया है। वहीं प्रारंभिक रिपोर्ट में यह भी बात सामने आई है कि इन शहरों में प्रॉपर ड्रेनेज सिस्टम न होना भी खतरा उत्पन्न कर रहा है। यह जानकारी केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के अध्यक्ष सुनील कुमार ने गुरुवार को राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण और प्रबंधन कार्यक्रम पर आयोजित कार्यशाला में दी।
उन्होंने बताया कि जोशीमठ में जिन कारणों से हालात खराब हुए हैं उसमें मुख्य रूप से ऐसे ही कारण जिम्मेदार हैं। उस घटना के बाद बोर्ड ने देश के अन्य ऐसे क्षेत्रों का सर्वेक्षण शुरू किया है, जिसमें मुख्य रूप से मैक्लोडगंज, अल्मोड़ा और उत्तरकाशी शामिल है। इन तीनों ही जगहों पर जमीन धंसने, पहाड़ दरकने और प्राकृतिक आपदा उत्पन्न होने के आसार नजर आ रहे हैं। इसकी प्रारंभिक रिपोर्ट को केंद्र को सौंप दिया गया है। उन्होंने बताया कि अगर इन जगहों पर तत्काल कारणों पर काबू पाने का प्रयास नहीं हुआ तो स्थिति बेकाबू होते देर नहीं लगेगी।
सुनील कुमार ने बताया कि एक्टिव फाल्ट जोन या सिस्मिक जोन में शामिल इन तीनों ही शहरों में ड्रेनेज सिस्टम ठीक न होने के कारण पानी मिट्टी में एकत्र होकर लुब्रिकेंट लेयर बना रहा है, जिसके कारण पहाड़ धंस रहे हैं। इस स्थिति को ध्यान में रखकर ही सिस्मिक जोन में आबादी को न बसाने का मानक तय किया गया है। जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है वैसे-वैसे उन क्षेत्रों की प्राकृतिक स्थिति में तेजी से बदलाव आपदा का कारण बनकर सामने आ रहा है।
आप भी जान लें सिस्मिक जोन
जिन जगहों पर भूकंप आने की आशंका बहुत ज्यादा होती है, उन्हें सिस्मिक जोन कहा जाता है। वैज्ञानिकों इन्हें उच्च जोखिम वाले भूकंपीय क्षेत्र कहते है। इसमें भौगोलिक स्थिति को देखते हुए भूकंप की दृष्टि से खतरनाक और कम खतरनाक जोन में इलाकों को बांटा जाता है। भारत के भूकंपीय इतिहास को देखते हुए इसे 2 से लेकर 5 तक के जोन में बांटा गया है। सिस्मिक जोन में सबसे खतरनाक जोन 5 है, इसके अंतर्गत आने वाली जगहों पर नौ से ज्यादा की तीव्रता का भूकंप आने की आशंका रहती है। वहीं, जोन 2 के इलाकों में सबसे कम तीव्रता का भूकंप आने की संभावना होती है।
इन सिस्मिक जोन में है भारत के राज्य
सिस्मिक जोन 5 में हिमालय की पर्वतश्रृंखला से लगते राज्यों जैसे जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पूर्वोत्तर भारत के साथ गुजरात के कच्छ का कुछ हिस्सा, बिहार का उत्तरी हिस्सा और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कुछ हिस्से शामिल हैं। सिस्मिक जोन 4 में दिल्ली, एनसीआर, जम्मू कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश का कुछ हिस्सा, यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल का उत्तरी इलाका, गुजरात का कुछ इलाका, महाराष्ट्र और राजस्थान का हिस्सा आता है। सिस्मिक जोन 3 में केरल, गोवा, लक्षदीप, यूपी, गुजरात, पश्चिम बंगाल का बचा हुआ हिस्सा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक के इलाके शामिल हैं। सिस्मिक जोन 2 में भारत का बचा हुए करीब 40 फीसदी हिस्सा आता है। सिस्मिक जोन 5 में भारत का करीब 11 फीसदी भू-भाग, सिस्मिक जोन 4 में 18 फीसदी, सिस्मिक जोन 3 में 30 फीसदी और बाकी का हिस्सा सिस्मिक जोन 2 में आता है।
ये इलाके हैं खतरे की जद में
सिस्मिक जोन 5 यानी अति संवेदनशील या सबसे खतरनाक जोन की बात करें, तो इसमें उत्तराखंड के 5 जिले आते हैं। जो रुद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी हैं। वहीं, सिस्मिक जोन 4 में ऊधमसिंहनगर, नैनीताल, चंपावत, हरिद्वार, पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा जिला शामिल है। वहीं, देहरादून और टिहरी का हिस्सा दोनों जोन में शामिल है। गौर करें तो उत्तराखंड के लगभग सभी जिलों में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा रहता है। वहीं, मानवजनित गतिविधियों के कारण यहां तेजी से बदलाव हो रहा है।
इंडियन प्लेट्स महत्वपूर्ण
भारतीय प्लेट या इंडियन प्लेट ईस्टर्न हेमिस्फीयर (Eastern Hemisphere) में भूमध्य रेखा पर फैली एक छोटी टेक्टोनिक प्लेट है। इसमें लगातार बदलाव होता है। मौजूदा समय में यह चाइना प्लेट के नीचे जा रही है। यह प्रक्रिया सामान्य तौर पर होती रहती है। लेकिन उसके नीचे जाने की रफ्तार का तेज होना खतरे की तरफ संकेत कर रहा है। सुनील कुमार ने बताया कि जोशी मठ के मौजूदा हालात के लिए ये कारण भी जिम्मेदार हैं।