Santokh Chaudhary: राजनीतिक रुआब वाले परिवार से आते थे चौधरी, मोदी लहर में भी दो बार हासिल की दमदार जीत
Santokh Chowdhary Political Career: संतोख चौधरी लगातार दूसरी बार सांसद बने थे। वे पूर्व मंत्री रह चुके थे। चौधरी 2014 में अकाली दल के पवन कुमार टीनू को हराने के बाद 16 वीं लोकसभा के लिए चुने गए थे। साल 2004 से लेकर 2010 तक वे पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष रहे।
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आजादी से पहले ही दलितों के लिए एक लंबा चौड़ा आंदोलन खड़ा करने वाले मास्टर गुरबंता सिंह के बेटे चौधरी संतोख सिंह भी अलविदा कह गए। अपने पिता मास्टर गुरबंता सिंह की हमेशा कहानियां सुनाने वाले चौधरी संतोख सिंह पंजाब की दलित राजनीति का मुख्य केंद्र बिंदु थे और यही वजह थी कि दिल्ली की लीडरशिप उन पर काफी विश्वास करती थी।
मास्टर गुरबंता सिंह वह शख्सियत थे, जिनहोंने 1920 के दशक के मध्य में जातिवादी और ग़दर पार्टी के संस्थापक सदस्य मंगू राम मुगोवालिया के साथ मिलकर विज्ञापन-धर्म आंदोलन शुरू किया था और पंजाब के ल्दोआब क्षेत्रों में कई मंडलों की स्थापना की थी, जहां दलित आबादी का बड़ा हिस्सा था।
हालांकि प्रारंभिक वर्षों में, आंदोलन के लिए सिंह की निकटता पंजाब के दलितों के उत्पीड़न और अशिक्षा के कारण थी। लेकिन बाद में वे इस सामाजिक आंदोलन से पूरी तरह जुड़ गए और यह उत्तर भारत में सबसे सफल दलित सुधार आंदोलन बन गया ।
1927 में मास्टर गुरबंता सिंह ने फिर से जालंधर (आरक्षित सीट) से चुनाव लड़ा और सफल हुए। उन्हें मलिक खिजर हयात तिवाना (पंजाब के प्रीमियर) मंत्रालय में संसदीय सचिव बनाया गया था । मास्टर गुरबंता सिंह 1962 में करतारपुर निर्वाचन क्षेत्र से जीते और कैरों के मंत्रिमंडल में और 1972 में ज्ञानी जैल के सिंह कैबिनेट मंत्री के रूप में चुने गए।
धीरे-धीरे पंजाब के सबसे बड़े दलित नेता के रूप में जाने जाने लगे, यहां तक कि रपिब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, जिसकी स्थापना डॉ. अम्बेडकर ने की थी, उनके कद के आगे छोटा हो गया। उनकी सत्ता व विरासत अच्छी तरह से सहेजकर चलने वाले उनके बेटे चौधरी संतोख सिंह व चौधरी जगजीत सिंह ही थे, जिनहोंने पंजाब की दलित सियासत पर अपना वर्चस्व लंबे समय तक कायम रखा।
मास्टर गुरबंता सिंह ने चौधरी संतोख सिंह को शिक्षा दिलाकर पेशे से वकील बनाया लेकिन पिता की सियासत व विरासत को संभालने के लिए चौधरी संतोख सिंह को सक्रिय राजनीति में आना ही पड़ा।
सांसद चौधरी ने 1978 में अपना राजनीतिक सफर पंजाब युवा कांग्रेस नेता के तौर पर शुरू किया।
1978 से 1982 तक वह पंजाब युवा कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष रहे। 1987 से 1995 तक जिला कांग्रेस कमेटी ग्रामीण के अध्यक्ष बने। 1992 में पहली जीत दर्ज करने के बाद पंजाब कांग्रेस विधायक दल के महासचिव के रूप में चुने गए। 1992 से 1995 तक ग्रामीण विकास और पंचायतों के प्रभारी, संसदीय कार्य और विद्युत विभाग के मुख्य संसदीय सचिव बने।
बाद में उन्हें पंजाब सरकार में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण और खाद्य और नागरिक आपूर्तार मंत्री, कैबिनेट मंत्री रहे। वह हमेशा फिल्लौर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते थे और उसी हलके में शनिवार को उनहोंने अंतिम सांस ली।
2014 में उनहोंने जालंधर से लोकसभा चुनाव लड़ा और मोदी लहर को जालंधर में शिकस्त देकर जीत हासिल की। 2019 में भी जब देश में पीएम नरिंदर मोदी की आंधी चल रही थी तब भी चौधरी संतोख सिंह ने जीत हासिल की। चौधरी संतोख सिंह हमेशा दलितों की शिक्षा व उनके लिए सेहत सुविधाओं को लेकर अग्रणी रहते थे।
हमेशा कहते थे कि पिता मास्टर गुरबंता सिंह दलितों को शिक्षित करने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, उनकी राह पर चलते हुए दबे व कुचले हुए लोगों को शिक्षित करना मेरा भी फर्ज है। हमेशा उन लोगों को मास्टर गुरबंता सिंह के किस्से सुनाते थे, जो अपने बच्चों को पढ़ाने से इंकार करते थे।
उनकी पत्नी डॉ. कर्मजीत चौधरी डायरेक्टर उच्च शिक्षा के पद से रिटायर हो चुकी हैं और वह भी चौधरी संतोख सिंह के साथ मिलकर दलितों की शिक्षा के लिए अग्रणी व कंधे से कंधा मिलाकर चलती आ रही हैं।चौधरी संतोख सिंह के बेटे बिक्रमजीत सिंह चौधरी भी फिल्लौर से विधायक हैं, जिनहोंने अपने पिता की सियासी विरासत व उनके विधानसभा हलके को संभाला है।